हेमकुण्ड बद्रीनाथ केदारनाथ यात्रा वृतान्त
भाग ६
कुइक रिकैप - हम निकले है 9 दिनी बद्रीनाथ हेमकुण्ड यात्रा पर आज जून ११, २०१९ है आज हमारी यात्रा का पांचवां दिन है, परसों रात हम केदारनाथ में थे और रात में ही दर्शन कर कल सुबह चोपटा की खुबसूरत वादियों बुग्यालों से होते हुए जोशीमठ से ६ किलोमीटर पहले एक होटल में रत में रुक गए थे और यहाँ तक पहुँचने के लिए किन मंजिलो से होकर गुजरे जानने के लिए इस पेज https://chandersantani.blogspot.com/?m=1 पर विसिट कर पढ़ सकते हैं.
तो आज हमारा लक्ष्य था बद्रीनाथ महाराज के दर्शन, पिंडदान, भारत के अंतिम गाँव माना और उसके पास स्थित कई दर्शनीय स्थलों का भ्रमण कर शाम तक गोविन्दघाट आ जाना जहाँ से हमें कल हेमकुण्ड साहिब की यात्रा करनी थी. सो कुल ८२ किलोमीटर मोटर से चलना था हमें और कुछ छः एक किलोमीटर की ट्रेकिंग करनी थी लेकिन
सोचने से कहां मिलते हैं तमन्ना के शहर
चलने की जिद भी जरूरी है मंजिलों के लिए।
इसलिए चल पड़े सुबह सवेरे छः बजे अगली मंजिल के लिए, नाश्ता कहीं बीच में रुकके करेंगे ऐसा निश्चय हुआ, क्योंकि यात्रा से पहले की गयी रिसर्च में पढ़ा था कि गोबिन्द्घाट से आगे कहीं पान्डूकेश्वर से बद्रीनाथ के लिए कुछ गेट सिस्टम बना के रखा है क्योंकि रास्ता सिंगल और ख़राब है एक तरफ से ही गाड़ियाँ छोड़ी जाती है, और पहला गेट लगभग सुबह 6 बजे और फिर क्रमशः 9 बजे, 11:30 बजे, 2 बजे और अंतिम गेट लगभग 4 बजे खोला जाता है और लगभग ऐसा ही बद्रीनाथ से जोशिमठ आते समय भी होता है. अतः हम 9 बजेका लक्ष्य लेकर निकले.
कमरे से बाहर निकले तो सामने एक बड़ा दालान था पीछे खूब अच्छे नज़ारे थे, कुछ ही दूर अलकनंदा कल कल कर बह रही थी नीचे घाटी में एक बहुत बड़ा हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट था, कहने का मतलब जोशीमठ और पीपलकोटी के भीड़ से बचके यहाँ स्टे किया जा सकता है पार्किंग के लिए भी काफी अच्छी जगह थी
कुछ ही देर में हम, गाड़ी में इंधन भर, जोशीमठ में अलकनंदा पर बने एक बड़े पुल को क्रॉस कर विष्णु प्रयाग पहुँच गए और यहाँ अलकनंदा और धोलिगंगा नदी का संगम था. भगवान बद्रीनाथ के दर्शन के लिए हरिद्वार से आने वाले हर यात्री के रास्ते मे माँ अलकनंदा के पाँच प्रयाग आते हैं जहाँ माँ अलकनंदा का संगम भागीरथी (देवप्रयाग), मंदाकिनी (रुद्रप्रयाग), पिंडर (कर्णप्रयाग), नंदाकिनी (नंदप्रयाग) और धौलीगंगा (विष्णुप्रयाग) से होता है. अलकनंदा व धौलीगंगा का सुंदर संगम स्थल है. संगम से आगे का रास्ता हैरान कर देने वाली खूबसूरत उँची उँची पहाड़ी चट्टानों से होता हुआ जाता है और अलकनंदा भी यहाँ इन विशाल चट्टानों के बीच एक छोटी सी धारा के समान प्रतीत होती है. थोड़ी देर में हम गोविन्द घाट से गुजरे जहाँ से हमको कल हेमकुण्ड साहिब की यात्रा करनी थी, औरअभी दो किलोमीटर ही चले थे की पान्डूकेश्वर पहुँच गए और अभी ८ भी नहीं बजे थे, वहां पर एक पुलिस चौकी और बैरियर सी बनी थी पर कोई बन्द गेट जैसा कुछ नहीं था, उ सो कार से उतरकर उंघते से सिपाही से पूछा तो अलसाये स्वर में बोला ये कौन से इतिहास की बात करे हो रास्ता तो चोबिसों घंटे खुला रहता है जी, सो मन प्रसन्न हो गया, वापस परिवार के पास गया और निश्चय किया कि अब टारगेट से एडवांस में हैं तो क्यों न यहीं रूककर चाय नास्ता कर लिया जाये, आस पास में नज़र दौड़ाई तो एक साफ सुथरा सा रेस्तौरेंट दिखा, तो भाई ने बोला कि अभी तो नाश्ता तैयार नहीं हुआ है पूरी भाजी बनी है नाश्ते में, सब्जी तैयार है बस आटा गूँथ पुड़ी छान देता हू आप बैठ्ये, आज पिछले दिनों के मुकाबले प्रोग्राम टाइट नहीं था सो हम जम गए, तब तक हम टहलने लगे बाहर ही बड़ा ही खुबसूरत नज़ारा था आस् पास रेस्तौरेंट के बगल में ही थोडा ऊपर की तरफ अच्छे से बंगलो जैसा दिखा तो उत्सुकतावश ऊपर चले गए और वस्तुतः GMVN का हाल ही में तैयार टूरिस्ट रेस्ट हाउस था इतने में नीचे से आवाज़ आई की नास्ता तैयार है, पत्नी खड़े होके और कुछ मदद कर जल्दी ही नास्ता टेबल पर लगवा दिया था, गरम पकोड़े भी तैयार हो गए थे, नाश्ते के बीच हमने विचार विमर्श किया कि क्यों न गोविन्द घाट में शाम को लौट के होटल ढूंढने से अच्छा बगल वाला GMVN का गेस्ट हाउस बुक कर लिया जावे, सभी सहमत हो गए और चूंकि बेटा चाय नहीं पीता मैंने उससे कहा जब तक हम चाय पीते है तुम कमरा बुक करा के आ जाओ, और ये काम भी बढ़िया से हो गया और शाम का टेंशन खत्म.
अब हम चल दिए बद्रीनाथ की तरफ, चारो तरफ खुबसूरत नज़ारे थे बगल में में कई जगह ग्लेशियर थे, और कही जगह ग्लेशियर से पानी रिस कर रोडपर झरने जैसा बह रहा जिसको क्रॉस कर हमारी गाड़ी आगे बढ़ रही थे और TOUCHWOOD ज़ूम चार वालों की स्विफ्ट कार ने कहीं भी परेशान नहीं किया था, रास्ता भी बहुत ही अच्छा बना दिया है प्रशासन ने, वर्ना पहले के यात्रियों के संस्मरण पढ़ पढ़ इस रास्ते के बारे में मन में बहुत संशय और भय था. लगभा ८.५५ पर हम अपने गंतव्य पर पहुँच चुके थे और अच्छी सी जगह देख गाडी पार्क कर नहाने के लिए आवश्यक सामान छोटे पिठू बैग में भर चल दिए मंदिर और घाट की और, पार्किंग से रास्ता एक व्यस्त बाज़ार से होकर जा रहा था, मंदिर नदी की उस तरफ था, हम एक छोटा सा पुल क्रॉस कर उस तरफ पहुंचे, घाट पर लाइन से पण्डे बैठ पिंडदान करा रहे थे, देश के राज्य और जिले पंडो के बीच बंटे हुए थे हर पण्डे के पास बड़े बड़े पौथे थे इसमें शहर जिला वार पूर्वजों के नाम दर्ज थे जो पहले कभी यहाँ आये होंगे और पिंडदान किया होगा. चूँकि हम सिन्धी हैं और सिंधियों के लिए लिए अलग पण्डे थे जो सिंध प्रान्त पाकिस्तान के जिलों के हिसाब से बंटे हुए थे हम ने अपने पूर्वजों के जिलों के हिसाब से पंडो को ढूंढा और इन की पोथियों में अपने पूर्वजो के नाम ढूंढने की कोशिश की परन्तु शायद हमारे पूर्वज हरिद्वार तक ही पहुँच पाए होंगे इसलिए हमें कोई रिकॉर्ड नहीं मिला सो हमने कंप्यूटर के इस ज़माने में उनकी पोथियों में अपने पूर्वजो के नाम दर्ज करवा पिंडदान संपन्न करवाया पर इससे पूर्व हमने पवित्र तप्त कुण्ड से जल लेकर नहाया, पानी खौलता हुआ था अतः अन्दर उतरने का साहस नहीं कर पाए. यह सब करते १०.३० बज चुके थे.
नहाने और पिंडदान उपरांत हम मंदिर की और चल दिए दर्शन हेतु वहां पहुंचे तो देखा वहां तो लाइन लगी थे सो चल दिए लाइन में लगने पर लाइन का कोई छोर ही नहीं दिख रहा था, आखिर अनुमानतः एक किलोमीटर चलने के बाद छोर नजर आया, पत्नी और बच्चा तो लाइन में लग गए, मैं आगे पीछे के लोगो को बोल आस पहाड़ियों पर चढ़ PHOTOGRAPHY करने लगा. चार पवित्र धामों में एक बद्रीनाथ धाम अलखनंदा नदी के किनारे तथा नर-नारायण नामक दो पर्वतों के बीच स्थित है। बद्रीनाथ बद्री-नारायण (अर्थात विष्णु)से सम्बंधित एक पवित्र धार्मिक स्थल है। यह स्थान सदैव बर्फ की परतों से ढका रहता है. नर-नारायण पर्वत के मध्य बद्रीनाथ का मंदिर बहुत भव्य है, आकर्षक है। प्रकृति की गोद में बिल्कुल बैठा सा प्रतीत होता है . सो मैं यहाँ नर, नारायण और नीलकंठ पहाड़ो को लोकेट करने की कोशिश करता रहा. नर और नारायण पर्वत तो दिख गए पर नीलकंठ पर्वत चोटी ६५९६ मीटर की ऊंचाई पर है बादलों और धुंध ढकी होने कारण नहीं दिख पा रही थी, बताते है की इस चोटी पर २० दिन की चढ़ाई करके पर्वतरोही पहुँच सकता है. अरे मैं तो खुबसूरत नज़रों में खो गया लाइन तो आगे बढ़ गयी मैं दौड़ के वहां पहुंचा लाइन काफी तेजी से आगे बढ़ रही थी धीरे-धीरे करके हम बाबा बद्री-विशाल; के प्रांगण में पहुँच गए। पंक्ति में लगकर नंबर पर दर्शन किए. व्यवस्थापक सबको जल्दी हटा रहे थे पर हम थोडा पीछे खड़े रहकर अद्भुत मूर्तियों को नैनो में बसाने की कोशिश करते रहे. भावातिरेक में मूर्तियाँ बोलती सी नज़र आती हैं। जब भाव प्रबलतम हो और शरीर बोध अल्प हो जाए तो मूर्ति तो सजीव लगेंगी हीं? ११.३० बजे हम दर्शन कर बाहर प्रांगन में परिक्रमा करने लगे. लगभग १२ बजे हम मंदिर से बाहर आ संकरे बाजार मार्ग को पार कर कार उठा माना, भारत के आखरी गाँव की और चल दिए जो की लगभा चार km दूरी पर है. चीन बार्डर पर ऐसे ही आखरी गाँव हिमाचल प्रदेश में चिट्कुल गाँव और उतराखंड में ही गूंजी गाँव अपनी स्पीति वैली और कैलाश मानसरोवर की यात्राओं के दौरान विजिट कर चुके हैं
माणा (3118 मी) एक छोटा सा गाँव है. ये इलाक़ा भारत-तिब्बत सीमा के पास का है, इसलिए यहाँ सेना के लोगों की उपस्तिथि होना कोई आश्चर्य की बात नही और उनकी वजह से ही माणा तक की ये सड़क काफ़ी चौड़ी व पक्की है. यहाँ से बीआरओ ने माणा पास (5608 मीटर) जो की यहाँ से लगभग 50 किमी दूर भारत-तिब्बत की सीमा पर है, तक भी एक सड़क बनाई है जिसे कुछ समय पूर्व तक ‘विश्व की सर्वाधिक उँचाई पर बनी गाड़ी चलाने योग्य सड़क’ का दर्जा दिया गया था . गाँव के पास ही एक बोर्ड दिखाई देता है जिस पर आसपास घूमी जा सकने वाली जगहों के नाम लिखे हैं इनमे प्रमुख हैं i) उपर की ओर गणेश गुफा (30 मी), व्यास गुफा (150 मी), मुचुकूंद गुफा (3 किमी), देवताल, राक्षस ताल और वशिष्ट ताल (40 किमी) और ii) नीचे की ओर है भीम पुल व सरस्वती धारा (100 मी), अलकनंदा व सरस्वती का संगम – केशव प्रयाग (600 मी), वसुधारा (5 किमी), लक्ष्मीवन (8 किमी), सतोपन्थ (25 किमी) आदि. इस बोर्ड को देखते हुए सबसे पहले हमने प्राचीन व्यास गुफा के दर्शन किए जहाँ बैठकर महर्षि वेद व्यास जी ने महाग्रंथ महाभारत व अन्य पुराणों की रचना की थी. व्यास गुफा की बाहरी दीवारों जिनपर ‘व्यास पोथी’ लिखा हुआ है एक पोथी के समान ही प्रतीत होती हैं, वाकई रोचक स्थान है यह! व्यास गुफा के पास ही एक दुकान बरबस ही आपका ध्यान अपनी और आकर्षित करती है जिस पर लिखा था है ‘भारत की आख़िरी चाय की दुकान’, लोग वहां रुक रुक कर फोटो खिचा रहे थे. आगे गणेश गुफा जो की देखने मे तो एक साधारण सा मंदिर लगता है पर अंदर जाकर गुफा का असली एहसास होता है. भगवान गणेश ने यहीं बैठकर वेदव्यास जी द्वारा कही गयी महाभारत को लिखित रूप दिया था. फिर हम भीम पुल की ओर बढ़ चले. अब तक हमें मालूम था कि सरस्वती नदी अब विलुप्त हो चुकी है और शायद भूमिगत होकर बहती है. लेकिन यहाँ आकर सरस्वती का जो रूप देखने को मिलता है वो बिल्कुल मंत्रमुग्ध कर देने वाला होता है, यहाँ उफनती हुई बह रही थी और आगे जाके यह नदी अलकनंदा में मिल अपन अस्तित्व खो देती है. इसी उफनते रूप से जब द्रोपदी घबराई तो भीम ने दो पत्थरों को मिला पुल बना दिया था. वसुधारा, सतोपंथ के रास्ते पर एक झरना है, यहाँ से ५ km था लेकिन हमारे पास न समय था और न १० km कर ट्रेक करने की हिम्मत क्योंकि हमें कल १४ km का गोविन्द्घाट घांगारिया ट्रेक करना था इसलिए हम वसुधारा की और थोडा बढ़के आस पास के नज़ारे जी भर के निहारे फोटोग्राफी की और वापस चल दिए. कार तक वापस पहुँचने के लिए भी हमें करीब २-३ km तो चलना ही था. हमने आज लंच स्किप किया बीच बीच में SNACKING और फ्रूट, सलाद लेते रहे. कार उठा हम सीधे पान्डूकेश्वर की और चल दिए और लगभग ५ बजे हम होटल पहुँच गए.
GMVN का पान्डूकेश्वर गेस्ट हाउस, एक बहुत ही अच्छी लोकेशन पर स्थित है इसके कमरे बड़े शानदार और हर कमरे की बालकनी से शानदार नज़ारे दिखाई देते है, हम आते से ही बालकनी में जम गए चाय मंगवाई और खारी बिस्कुट के साथ आनंद लिया, और वहीँ बैठे बैठे निश्चित हुआ कि फ्रेश होने के बाद हम गोविन्दघाट जाके गुरूद्वारे में माथा भी टेकेंगे और पार्किंग सुविधा आदि का जायजा भी लेंगे, सो फ्रेश होने के बाद करीब ८.३० बजे निकलने से पहले हमने सामान को ठीक किया, अगली दो दिन और रात के लिए आवश्यक सामान और गरम कपडे तीन अलग पिठुओं में भरा और बाकी सामान पैक कर दिया, ये बहुत ही आवश्यक कार्य था क्योंकि अगले तीन दिन ट्रेक ही ट्रेक था
इसके बाद हम हम कार लेके गोबिंदघाट पहुंचे, गुरुद्वारा नीचे घाटी में नदी किनारे बना हुआ है यहाँ तक पहुँचने के लिए अत्यंत ही steep और घुमावदार रोड है सो सावधानी से नीचे उतारें और चढ़ने के टाइम भी आपका एक कुशल ड्राईवर होना आवश्यक है क्योंकि एक तो तीखी चढ़ाई और वो सीधे हाईवे पर मिलती है तो हाईवे पर आने वाले वाहनों से आपको सावधान रहना पड़ेगा. हमने वहां पहुँच कर पार्किंग का पूछा जो की 100 रूपये प्रतिदिन पर उपलब्ध थी लेकिन आपको चाबी छोड़ के जाना होगा, अब हम गुरूद्वारे की और बढ़े और वहां का हाल चौकाने वाला था कमरों और बिस्तरों के लिए लम्बी लाइन लगी थे, लोग जगह जगह गलियारों में सो रहे थे, गुरूद्वारे के मुख्य हाल के बाहर भी बिस्तर बिछे थे, मतलब लोगों का विशाल समुद्र. हम माथा टेक थोड़ी देर कीर्तन सुन लंगर हाल में गए लंगर छक बाहर आ गए. यहाँ भी एटीएम खंगाला तो कैश गायब था, पता पड़ा की कैश के लिए जोशीमठ जाना पड़ेगा और वो हम रात को करना नहीं चाहिते थे,यहाँ भी एक दुकानदार कार्ड स्वैप कर कैश दे रहा था पर कीमत बड़ी थी १०००० पर १०००. हम वापिस पान्डूकेश्वर चल दिए और जल्दी सो गए क्योंकि अगले तीन दिन एक ५० पार जोड़े के दम ख़म की टेस्टिंग के थे, और हमारे साथ २० साल वृद्ध भी था जो mbbs एंट्रेंस की तैयारी और बाद में MBBS पढाई के चलते अपनी फिटनेस दांव पर लगा चूका था.
एक और तमन्ना के शहर के लिए एक और जिद के साथ
मिलेगे अगले भाग में. शुभ रात्री





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