कैलाश मानसरोवर, शून्य से शून्य की यात्रा – एक संस्मरण
कैलाश मानसरोवर यात्रा – 2018, एक संस्मरण
उच्चीकरण(Acclimatization):
दिन 1 (नई दिल्ली)
दिन 2 (नई दिल्ली):
मेडिकल परीक्षा से गुजरने वाले सभी यत्रियों को आईटीबीपी की मेडिकल टीम द्वारा मेडिकल समीक्षा के लिए नई दिल्ली के आईटीबीपी अस्पताल में रिपोर्ट करना पड़ता है। आईटीबीपी, निर्धारित चिकित्सा संस्थान द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों के आधार पर चिकित्सा समीक्षा करता है और यत्रियों की फिटनेस निर्धारित करने का उनका निर्णय अंतिम है। इस समीक्षा में फिट घोषित किए गए यात्रियों की ही कुमाऊं मंडल विकास निगम(केएमवीएन) द्वारा वीसा आदि की कार्यवाही की जाती है । यहाँ पर आईटीबीपी के अधिकारी भी आपको यात्रा मार्ग के बारे में ली जाने वाली सावधानियों के बारे में बताते हैं। यहाँ पर हम दल के लोगों ने अलग कमेटियाँ बनाई, जैसे की फूड कमेटी, वित्तीय कमेटी आदि।
व्यायाम के बाद सब नहा धो, नाश्ता कर बस में सवार हो गए अगले पड़ाव के लिए।अल्मोड़ा शहर से कुछ ही दूरी पर यात्री गोलु देवता का दर्शन करने को रुके। इस स्थानकि ये मानता है कि अपनी फरियाद गोलु देवता को चिठी में लिख मंदिर परिसर में टांग दो और जब फरियाद का समाधान हो जाये तो एक घंटी चढ़ा के गोलु देवता का आभार प्रकट करो। वहाँ लाखों कि संख्या में घाटियां बंधी थी जो कि इस बात का सबूत थी कि गोलु देवता सबकी फरियाद सुनता है।
गोलु देवता के दर्शन कर भजन गाते गुनगुनाते दोपहर के भोजन तक हम केएमवीएन के पिथोरागढ़ स्थित गेस्ट हाउस में पहुँच गए। आज का बाकी दिन लास्ट मिनट कि ख़रीदारी आदि के लिए फ्री था, शाम को पर्यटक आवास गृह के प्रबंधक दिनेश गुरुरानी की पहल पर मानसरोवर यात्रा वाटिका में धरती के नाम एक पौधा कार्यक्रम के तहत पौधरोपण किया गया, यह एक अच्छी पहल है हमसे पहले के 17 यात्री जत्थों द्वारा लगाए पौधे वहाँ लहलहा रहे थे। बाकी शाम यात्रियों ने अपना-अपना सामान पुनरव्यवस्थित करते हुए गुजारा क्योंकि निर्देश दिया गया थे की helicopter पर केवल पंद्रह किलो वजन की अनुमति रहेगी सो सबने अपने अपने अतरिक्त सामान को पैक कर वहीं पर्यटक आवास गृह में छोड़ा और सारे वजनी कपड़े अपने शरीर पर धारण कर लिए क्योंकि इंसान के वजन की कोई अधिकतम सीमा निर्धारित नहीं थी।
यहाँ ये बता दें कि वर्ष 2018 मे भीषण वर्षा के कारण धरचूला से बूढ़ी और बूढ़ी से गूंजी तक का ट्रेक पूरी तरह से तहस नहस हो गया था, यह दूरी 71 किलोमीटर (40 किमी जीप द्वारा और 29 पैदल) जो कि हमें छठे और सातवें दिन में क्रमशः 12 और 17 किमी पैदल चल कर करनी थी स्थगित कर दी गयी थी और अब हमें यह दूरी धरचूला के बजाय धरचूला लगभग100 किमी पहले ही पिथौरागढ़ से वायुसेना के हेलीकाप्टर द्वारा करनी थी, सो अब हमारा अगला पड़ाव अब पिथौरागढ़ था।
दिन 6
पिथौरागढ़(4967 फिट) से गूंजी (10500 फिट)
कुल 159 km (140 किमी रोड बस से 29 किमी पैदल)
सुबह भोलेनाथ की कृपा से मौसम साफ था और हेलीकाप्टर निर्धारित समय पर उड़ान भर हमें दो दिन और 29 किम की बेहद खतरनाक लेकिन बहुत ही खूबसूरत ट्रेकिंग से बचाते हुए केवल 35 मिनट में सीधे गूंजी पहुंचा दिया। ये भी हमारी बेच पर भोले की कृपा थी की मौसम साफ़ था नहीं तो हमारे से पहिले वाले जत्थे तो तीन तीन दिन रोज़ तैयार होके एयरपोर्ट आते और मौसम साफ़ न होने के कारण वापिस होटल। सेना के हेलीकाप्टर में बैठकर हमें खुद भी सैनिक होने का जैसा अहसास हुआ और गर्व भी महसूस हुआ। हेलीकाप्टर की खिड़की से हम दम साधे खूबसूरत नजरों को हसरत भरी निगाहों से देखते रहे और सोचते रहे की इन वादियों और झरनो को हम छू न पाये, खैर अभी आगे और भी मंज़िलें हैं। वहाँ पहुँचते ही हम ITBT के कैम्प से गुजरते kmvn के इगल्लू स्टाइल में बने खूबसूरत कैंप में पहुंचे वहाँ हमारा गरम गरम नाश्ते और चाय के साथ स्वागत हुआ और हम सब अपना सामान रख खूबसूरत नज़ारे देखने बाहर खुले में आ गए, और हमें तुरंत ही 10500 फिट पे पहुँच जाने का अहसास हुआ, तीखी ठंडक और दो कदम चलने में दम फूल रहा था। दोपहर में कुछ आराम, शाम को एक दो किमी की गूंजी गाँव की वॉक हमारे ग्रुप के सबसे प्यारे और बुजुर्ग छतीसगढ़ी कपुरचंदजी अग्रवाल के साथ। उसी शाम आईटीबीटी के कैंप प्रभारी और डॉक्टर द्वारा यात्रा के आगे के हिस्से की ब्रीफ़ दी और एक जरूरी सलाह की हमेशा जाकेट की चेन ऊपर और सर और कान ढके, नहीं तो तो कब ठंड आपको जकड़ लेगी आपको पता ही न चलेगा और आगे की आपकी यात्रा दुखद बना देगी। कुछ देर बाद ITBT के कैम्प में बने सुंदर मंदिर के अंदर आईटीबीटी के जवानो के साथ सुंदर भजन कीर्तन हुआ। और उसके बाद गरमा गरम भोजन और फिर रात्री में विश्राम
दिन 7 (गूंजी से नाबी 3 किमी)
इस छोटे से गाँव में यात्रियों को तीन दिन रुकाने के पीछे एक ही उदेश्य है उच्चीकरण(Acclimatization) यानि धीरे धीरे अपने आपको ऊंचाई वाले क्षेत्रों के उच्च दबाव वाले वातावरण में ढालना, लेकिन तीन दिन में शायद यात्री उकता न जाएँ इस कारण सामान्य यात्रा कार्यक्रम को थोड़ा सा संशोधित किया गया है, साथ ही साथ कुमाऊँनी जीवन शैली और उनकी संस्कृति, लोक संगीत और व्यंजनों को पेश करने के उद्देश्य के साथ सभी केएमवाई यात्रियों के लिए एक होमस्टे अनुभव को शामिल किया गया। हम सब छह बजे ही सब यात्री गुंजी से 3 किलोमीटर दूर एक गाँव नबी में गए जहां हमारे आगमन पर, हमारा पारंपरिक स्वागत किया गया और कुमाउनी व्यंजनों और लोक नृत्य और संगीत के समूह के साथ। आज हमें यहीं इनके गाँव में इनके घरों में रहना है, गाँव प्रधान श्रीमति सनम नाबयाल, एक फुर्ती भरी युवती प्यारी मुस्कान के साथ सब यात्रियों की सुख सुवधाओं का ध्यान रख रही थी। सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक कई तरह के लोकल व्यंजन परोसे गए। शाम को एक बहुत ही मोहक सांस्कृतिक समारोह का आयोजन किया गया था, इसमे हमारे दल के सदस्यों ने भी अपनी प्रस्तुतिया दी। कुछ सदस्यों ने इनके पारंपरिक परिधानो को भी धारण किया। इतनी ठंड के बावजूद इनके घर के अंदर घर की बनावट और लोकल सामग्री के चलते आरामदायक गर्माहट थी या ये हो सकता है ये इनके स्वागत भरे व्यवहार की गर्माहट हो। रात को पास ही बहने वाली नदी की कलकल के बीच कब आँख लगी पता ही न चला। गाँव वाले के साथ नृत्य की झलकी इस लिंक पर देखी जा सकती है
दिन 8 (गूंजी में आराम का दिन)
हम चारों ओर की ऊँची चोटियों के मंत्रमुग्ध करने वाले दृश्यों के साथ जागे. चूंकि आसमान साफ था अपी पर्वत और इसके आस-पास की पर्वत श्रृंखला के चारों ओर सुनहरे रंग के आभा मण्डल के साथ हमारे सामने था। नाश्ते के बाद नाबी होम स्टे से नाबी गाँव वासियों ने आगे की यात्रा की लिए शुभकामनाओं के साथ भावभीनी विदाई दी, हम होम स्टे टीम के स्वागत सत्कार से अभिभूत थे। गूंजी गाँव की गलियों से गुजरते हम शीघ्र केएमवीएन के गेस्ट हाउस वापस पहुँच गए। संध्या को आईटीबीपी मेडिकल टीम गूंजी के कैंप में सभी यात्रियों की एक बार फिर चिकित्सा समीक्षा हुई, ITBP द्वारा आगे की बड़ी चुनौतियों के लिए यत्रियों को तैयार करने के लिए एक और ब्रीफिंग की । जिन तीर्थयात्रियों को आगे बढ़ने के लिए अयोग्य घोषित किया जाता है, उन्हें गुंजी से वापस भेज दिया जाता है, अन्य सभी को हरी झंडी दे दी जाती है परंतु हमारा पूरा दल इस परीक्षा में फिट पाया गया अलबत्ता बुजुर्ग और बीपी/ हृदय रोग के इतिहास वाले यात्रियों को घोड़े पर सवारी करने की शर्त पर आगे बढ्ने की अनुमति दी गयी।
अगली सुबह हमारी यात्रा की रवानगी थी, हमने आगे की यात्रा के लिए जरूरी पेकिंग कर अतरिक बोझ वापसी में कलेक्ट करने के लिए यहीं छोड़ दिया, पेकिंग भी दो अलग अलग भागो में की गयी एक भारत की तरफ के लिए और एक चीन की तरफ के लिए।
दिन 9 गूंजी से व्यास गुफा/कालापानी
ट्रेक 10 किमी 3600 मी/11811 फिट
मुंह अंधेर ही हम 5 बजे हम कालापानी, जो की काली नदी का उद्गम स्थल है, के ट्रेक के लिए निकल चुके थे।केएमवीएन के स्टाफ ने ने इतनी सुबह नाश्ता तैयार करके हमारी विदाई की। खूबसूरत नदियां नाले को लांघते हम चलते जा रहे थे। गूंजी से चीन सीमा तक यात्रियों के साथ आगे-पीछे एवं बीच में आईटीबीपी के जवान चल रहे थे। जवानों ने इमरजेंसी के लिये साथ में आक्सीजन सिलेंडर भी रखे हुए थे।
जैसे-जैसे आगे बढ़ते जा रहे थे, हरियाली कम होते जा रही थी। केवल पत्थर, चट्टान ही दिखाई दे रहा था। प्राकृतिक धरोहर को आँखों में भरते हुए काली नदी के किनारे-किनारे आगे बढ़ते जा रहे थे। लगभग ३ घंटे चलने की बाद हम काली नदी के उदगम स्रोत पर बने कालीमाता के मंदिर पर पहुँच गए। काली नदी में बने पुल से नदी पारकर कालापानी पहुंचे। सरोवर के किनारे रास्ते पर चारों ओर रंगीन पेपर की झंडियाँ लगायी हुयीं थीं। छोटे-छोटे पत्थरों को लाल रंगकर उनसे सरोवर के जल में ऊँ लिखा हुआ था।
मंदिर के सामने एक पहाड़ में बहुत ऊँचाई पर एक गुफ़ा थी। जहां पर आईटीबीपी द्वारा पहचान हेतु झण्डा भी लगाया गया है। उक्त सुराख को ‘‘व्यास गुफा” बताया गया। इसी गुफा में महामुनि ब्यास द्वारा वर्षों तपस्या की गयी थी।
हम सभी ने जूते उतारकर, हाथ-मुंह धोकर अंदर प्रवेश किया। एक बड़े से कमरे में सामने दो छोटे कक्ष थे, जिनमें एक में माँ काली की प्रतिमा विद्यमान थी तो दूसरे में भगवान शंकर जी की। मंदिर को सलीके से सजाया हुआ था। रंगीन कालीन बिछा हुआ था। ढोलक मंजीरे और चिमटा इत्यादि रखे हुए थे जिनसे पता चलता था कि यहाँ भी कीर्तन होता रहता है। देखकर मन मंत्र-मुग्ध हो गया। मंदिर के बाहर बड़ा सा कुण्ड बना हुआ है जिसमें मंदिर के अन्दर से पानी बहता हुआ आकर एकत्र होता है। फिर वही पानी बहते हुए आगे जाकर नदी में मिल जाता है यहां से यह नदी काली नदी कहलाती है। बाहर एक अन्य कक्ष में हनुमानजी की प्रतिमा थी। इसी जगह के लिए अब नेपाल ने विवाद खड़ा किया है।
ऊँचे-ऊँचे पर्वत शिखरों से घिरे काली मंदिर में भजनों का संगीत बज रहा था। मंदिर में आईटीबीपी के जवानों द्वारा खास हमारे लिए लंगर की व्यवस्था की थी, भोजन में गरमा गरम पूड़ी सब्जी और खीर की व्यवस्था थी मन तृप्त हो खाना खाया और उसके उपरांत इमीग्रेशन के लिए प्रस्थान किया और फॉर्म भर कर, पासपोर्ट पर इमीग्रेशन करवा कर, कालापानी के केएमवीएन कैंप में आये। जहा बुरासँ के फूलो का शरबत ताज़गी देने के लिए तैयार था। यहीं पर रात्री भोजन और विश्राम की व्यवस्था थी

दिन 10 काला पानी से नबीढ़ांग(ॐ पर्वत)
दूरी 9 किमी ऊंचाई 4260 मी/13976 फुट
एक बार फिर सुबह मुंह अंधेरे हम निकाल पड़े, कालापानी से नबीढ़ांग की दूरी 9 कि.मी है। नवीढांग के रास्ते में हरियाली कम दिखी किन्तु घाटी में रंग-बिरंगी फूल जरूर दिखे। ऊँ पर्वत के दर्शनों का लोभ लिए सभी जल्दी से जल्दी नवींढांग पहुचना चाह रहे थे। नवीढ़ांग के रास्ते में लगभग चारों तरफ पहाड़ी चोटी दिखलाई दे रही थी। जिसके आसपास काफी कोहरा भी था। तभी हमारे घोड़े वाले भैया सचिन ने बताया कि पीछे से एक ट्रक आ रहा है जो कि लीपुलेख से कालापानी के बीच बन रहे रास्ते के मजदूर और मशीन ले जाता है, उसको हम हाथ देके लिफ्ट मांगेंगे, इससे आप जल्दी नबीढ़ांग पहुँच जाएंगे और ॐ पर्वत के दर्शन सुलभ हो जाएंगे क्योंकि जैसे जैसे सूरज ऊपर चढ़ता है ॐ पर्वत पर धुंध छा जाती है, अहोभाग्य कि ट्रक रुक गया और हम भेड़ बकरियों कि तरह ट्रक में लद गए और आधे घंटे मे हम मंज़िल पर थे। यहाँ पर मौसम साफ़ नहीं था। ऊँ पर्वत बादलों में छिपा हुआ था।
हम टकटकी लगाये ऊँ पर्वत के पूरे दर्शनों के अभिलाषा लिए बैठे रहे और लगभग 10.10 पर बादल छटना चालू हो गए और हम ॐ पर्वत के दर्शन पाकर निहाल होते रहे, किचन आ रहे गरम पराठों की खुशबू भी हमें ललचा नहीं पाई और नयन भर नजारों का मज़ा लूटते रहे, खाने को तो पूरा दिन पड़ा था। बाकी का दिन हमने पेकिंग करते गुज़ारा क्योंकि भारत की तरफ ये हमारा आखरी दिन था कल सुबह हमें सीमा पार कर चीन के स्वायत क्षेत्र तिब्बत में प्रवेश करना था। हमने एक और बोझा कम कर सामान यहाँ के कैंप में लौटते वक्त कलेक्ट करने के लिए छोड़ा।
सात बजे रात का खाना लग गया क्योंकि अगले दिन की यात्रा बहुत कठिन थी और अगले दिन रात्री दो बजे ही प्रस्थान करना था इसलिए रात को जल्दी सोना था। कल हमें लिपुलेख पास पार करके तिब्बत में प्रवेश करना था। लिपुलेख का मौसम बहुत थोड़ी देर सुबह लगभग सात बजे (दो/तीन घंटे) तक ही ठीक रहता है। उसके बाद वहाँ बर्फीली आंधियाँ और बारिश होने लगती है। यात्रियों को निर्धारित समय-सीमा के अंदर ही लिपुलेख पास पार करना पड़ता है। भोजन से पहले एलओ ने छोटी सी मीटिंग की। अगली सुबह सभी से कई लेअर्स में कपड़े पहनकर, सिर से पैर तक ढकने और रैनकोट, टॉर्च और ड्राई-फ्रूट्स साथ रखने के लिए कहा। पोनी पर चलने वालों को ठंड से बचने के लिए विशेष ध्यान देने के लिए कहा क्योंकि पैदल चलने वाले यात्रियों को चलने से गर्मी आ जाती है पर पोनी पर हवा बहुत लगती है।
चीनी अधिकारियों द्वारा 7.30 बजे भारतीय समय के अनुसार (चीन का समय हम से 2.30 घंटे आगे है।) सुबह सीमा पार कराने का समय निश्चित किया गया है। इसलिए समय का ध्यान रखते हुए कल पैदल यात्री 2.00 बजे (रात के) तथा घोड़े वाले यात्री 3.00 बजे (रात को)अपनी-अपनी यात्रा प्रारंभ करेंगे तद्नुसार यात्री तैयार रहें। यहाँ पर मैंने अपने कैमरे का मेमोरी कार्ड निकाल लिया और दूसरा नया मेमोरी कार्ड डाल दिया। क्योंकि कई बार ऐसा होता है कि चीनी अधिकारी आपके मेमोरी कार्ड जब्त कर लेते हैं ऐसे मे फोटो के रूप आपकी कीमती यादें नष्ट हो जाने का भय रहता है । अगले दिन के रोमांच को मन में रखकर हम जल्दी सो गए।
दिन 11- नवींढांग से लिपुलेख पास भारत पाक सीमा (9 किमी) आगे तकलाकोट बस द्वारा
लिपुलेख की ऊँचाई 5334 मीटर (17500 फ़ीट))
सुबह डेढ़ बजे चाय आ गयी। ठंड इतनी कि हाथ को हाथ महसूस नहीं हो रहा था, ऐसे में बिस्तर छोड़ना एक तपस्या की तरह था और इस वक्त हम अपने को तवस्वी ही महसूस कर रहे थे, सो केएमवीएन के कर्मठ कर्मचारियों की एक आवाज पर उठकर दैनिकचर्या के साथ तैयार होने लगे। केएमवीएन के कर्मचारियों की कार्यकुशलता गजब की थी, पहले ही गरम पानी तैयार था। सभी ने गर्म पानी से हाथ-मुंह धो तैयार हो गए थे, इनर से लेकर विंड-चीटर तक पाँच लेअर्स में कपड़े, हाथ-पैरों में डबल गल्व्ज़ और जुराबें, सिर पर मंकी कैप पहन यात्री पहचाने नहीं जा रहे थे।
हर हर महादेव के नारे के साथ हमारा दल चल पड़ा। सभी यात्री एक हाथ में लाठी एवं दूसरे हाथ में बड़ा टार्च लेकर चल रहे है। ऐसा लग रहा है जैसे रात में मशाल जूलूस निकला हो। अंधेरे में माइनस टेम्प्रेचर में हवा के झोंकों के बीच जूतों और बेंतों की टक-टक, नाक की सूं-सूं, कपड़ो की सरसराहट, घोड़ो के गले में बंधी घण्टियों से सुनसान दर्रा गुंजायमान था। हमको ऐसा विदित हो रहा था की हम स्वर्ग के पथ के राही हों। आईटीबीटी के जवान साये की तरह, दो डॉक्टर्स मैडिकल-इक्यूपमेंट्स, ऑक्सीज़न-सिलेंडर्स और दो पोर्टेबल- स्ट्रेचर के साथ यात्रियों के साथ-साथ चल रहे थे। किसी को कोई परेशानी न हो हर पल का ध्यान रख रहे थे। बार-बार हाल पूंछते हौंसला बढ़ाते चल रहे थे। सांस फूलने की वजह से रूक-रूककर चलना पड़ रहा था।
इतनी देर में हमारा घोड़े वाले भी आ पहुंचा हम सपत्नीक घोड़े पर सवार हो गए। घोड़े पर बड़ा ही सचेत हो कर बैठना जरूरी था नहीं तो रात में घोड़े पर नींद आने के कारण गिरने के कई किस्से सुने हुए थे। जैसे-जैसे आगे बढ़ते जा रहे थे ठंड और हवा दोनों बढ़ती जा रही थी।
हम लिपु बॉर्डर से लगभग एक कि.मी.पहले रुक गए। यही पर हमें पैदल यात्रियों का इंतज़ार करना था। समय काटना कठिन हो रहा था, ठंड के मारे हाथ पैर सुन हो रहे थे ऐसे मे हमारे दल के लायजिनिग अधिकारी ने सब को गोला बनाकर 17500 फिट की ऊंचाई पे एक्सर्साइज़ करवाई, ये अपने आप में एक अनुभव था । पहाड़ों पर जल्दी दिन निकल आता है। आसपास पौ फटनी शुरु हो गयी। धीरे-धीरे धुंधलका कम होने लगा था। अब सब साफ़ दिखने लगा था। पैदल यात्री धीरे धीरे आ रहे थे। धीरे धीरे हम लोगो बॉर्डर की तरफ चलना शुरू किया। 7 बजे तक हम बॉर्डर पर थे। पहाड़ियों पर लगे झंडे सीमा बना रहे थे, वरना पता भी नहीं चल रह था कि कौन सी हद से कौन सा देश शुरु होता है। वो एक गाना है ना पंछी, नदियां पवन के झोंके कोई सरहद न इन्हे रोके। सब चीनी अधिकारीयों का इंतज़ार कर रहे थे। झर झर बहती तेज हवा एक जगह खड़े नहीं होने दे रही थी, नीचे तीन लेयर के कपड़े होने के बावजूद टांगे जैसे सुन्न हो रही थी, और इससे बचने के लिए जंप लगाने से सांस फूल रही थी, मतलब चीन के अधिकारियों का इंतज़ार भारी पड़ रहा था।
सीमा पर जवानों का जमावड़ा था। हमारी ओर हमारे सशस्त्र जवान जमे हुए थे। हम वही पत्थर की शिलाओं पर बड़ी मुश्किल से संतुलन बनाकर बैठ गए। हमारे साथ चल रहे पोनी एवं पोर्टर यही पर रूक गये। उन्हे उन की पेमेंट का आधा भुगतान किया गया, तिब्बत की सीमा रेखा के अंदर जाने तक आईटीबीपी के जवान हमारे साथ थे। एक तेज़ ढलवा रास्ते के उस पार दूर से दो बस आती दिखी, आगे आगे एक चीनी अधिकारियों की जीप थी। केवल दो चीनी अधिकारी ऊपर आए निरीक्षण कर वापस चले गए। हम लोगो ने अब बॉर्डर पार कर चीन -अधिकृत तिब्बत में प्रवेश किया। चीनी सीमा से बस तक का लगभग एक किलोमीटर का रास्ता पथरीला फिसलन भरा था, चूंकि उस तरफ पोर्टर नहीं थे एक हाथ में समान पीठ पर पिठू घिसटते, गिरते पड़ते बस के पास पहुँच गए वहाँ चीनी अधिकारी मौजूद थे चीनी अधिकारी अपनी लिस्ट से एक एक का नाम बोलकर बुला रहे थे और नाम और पासपोर्ट के साथ चेहरा चहेरे को मिला कर टिक कर रहे थे। हमारा सामान बस की डिकी में लोड हो गया और हम बस मे सवार हो गए। बस में बैठते ही हमारे गुरु नामक गाइड ने विशुद्ध हिन्दी में अपना और अपनी सहयोगी जिसका नाम डिक्की का परिचय दिया और बताया कि हम कस्टम-चैकिंग के लिए जा रहे थे। यात्री की गिनती के पश्चात बस चल पड़ी।
हम लोग बस से चीन के निकटम शहर तकलाकोट (पुरंग) के लिए रवाना हुए, मिट्टी के पहाड़ी-पठारी-मार्ग पर चढती उतरती धूल उड़ाती बस में बैठकर सुबह से थका शरीर बहुत राहत महसूस कर रहा था। बस बॉर्डर के मिलट्री-एरिया से गुज़र रही थी. सो गुरु ने फोटो बिलकुल न लेने और कैमरे बंद रखने की हिदायत दी। बस बॉर्डर के मिलट्री-एरिया से गुजरते हुए तकलाकोट में प्रवेश किये। बस तकलाकोट के कस्ट्म ऑफ़िस में दाख़िल हुयी हम सभी उतर कर कस्टम ऑफिस में अंदर गए। हमने इमीग्रेशन फार्म भरा, फिर लाइन में लगकर अंदर गए जहाँ सामने दीवार पर इन्फ़्रा-रेड कैमरा लगा था, सभी का टेंप्रेचर रिकॉर्ड हो रहा था। बैल्ट-पाऊच और हैंडबैग्स भी एक्सरे मशीन से गुजारे और सारी औपचारिकताएं पूर्ण करते हुए हम बस में आ कर बैठ गए।
पुनः बस में बैठकर तकलाकोट शहर में पुरंग गेस्ट-हाऊस की ओर चल पड़े। यहाँ नए और पुराने ब्लॉक में यात्रियों को रुकाया गया था। नया ब्लॉक कही ज़्यादा बेहतर था गीजर नहीं था सो गरम पानी के लिए सौर ऊर्जा आधारित गरम पानी के लिए सूर्य भगवान का इंतज़ार करना पड़ा, हमारा सामान भी आ गया था। उसे उठा कर अपने कमरे में लाये और किसी तरह फ्रेश और स्नान कर के हम लोग तैयार हुए तो नाश्ते का समय हो गया।
हम लोग भोजन-कक्ष में पहुँच गए। बड़ा सा हॉल जिसमें कई बड़ी गोल मेज लगीं थीं और चारों ओर कुर्सियाँ लगीं थी। बुफ़े सजा हुआ था, एक तरफ चाय और दूध का बड़ा कंटेनर लगा था। यहीं पर गुरु और डिकी ने आगे की यात्रा के बारे में ब्रीफ़ किया, वित्तीय हिसाब किताब घोड़ो पोर्टेरों के खर्चे आदि के बारे में समझाया। आगे के सात आठ दिन के रहने, बस आदि की व्यवस्था हेतु हमें 900 डॉलर चीन सरकार द्वारा निर्धारित एजेंसी को देने थे। फाइनेंस कमेटी के पास सभी ने डॉलर जमा करवा दिए। और सबको निर्देश दिये गए की जिनको आगे पोर्टर और घोड़ो की जररूरत हो वो अपने नाम अपने दल की इस हेतु बनी कमेटी को नोट करवा उसके लिए देय राशि युवान में जमा करवा दे। इसके अलावा दल की फूड कमेटी को भारत सरकार द्वारा दिये राशन के अतरिक्त दल के साध चलने वहाँ के कुक्स के साथ मिल बैठ जरूरी सामान की लिस्ट बना स्थानीय बाज़ार से खरीदना था, कैलाश बाबा और मानसरोवर की परिक्रमा से निकलने से पहिले। इन सब तैयारियों के लिए आज और कल इसी शहर और इसी होटल मे रुकना था परसों सुबह हम निकलेंगे उस सपनों की दुनिया के सफर पर।
खाना खा कर थोड़ा आराम कर के मार्किट घूमने चले गए शाम हो गयी थी, चीन की इस मामले में तारीफ करनी पड़ेगी, बार्डर के एक किलोमीटर दूर सड़क थी, बार्डर के इतना नजदीक इतना आधुनिक शहर तकलाकोट बसा लिया है सालों पहिले से और हम अब लीपुलेख तक कची पकी सड़क बना पाये है और उस पर भी नेपाल जैसे पिद्दू देश ने भारत को आँख दिखाई है, भगवान भला करे इस देश का।
आज आराम का दिन था, वहाँ के खुश्क मौसम में खुद को एडजस्ट करने के लिए। तकलाकोट लगभग 4050 मीटर की ऊँचाई पर स्थित यह शहर कैलाश पर्वत से दक्षिण में घाघरा नदी (जिसे कर्णाली नदी और मापछु खमबाब के नामों से भी जाना जाता है) की घाटी में बसा हुआ है। इस की आबादी 73000 के लगभग है। आराम का दिन था पर सुबह आराम से सोकर उठना संभव नहीं था क्योंकि चीन का समय हमसे दो घंटे पहिले था प्रातः आठ बजे, मतलब भारतीय समयानुसार 6 बजे, लग जाता। नाश्ता कर के हम बाजार घूमने चल दिए। सड़क के दोनो किनारे पर दुकाने बनी हुई है, सभी दुकानों में चीन भाषा में बोर्ड लगे हुए है। सभी दैनिक वस्तुओं की दुकानो के अलावा मटन मांस/विदेशी शराब के दुकान भी देखने को मिली। छोटी छोटी दुकानें भी देखने को मिली जहां पर केवल चीनी सामान ही दिखें। वही पर हम एक स्टोर में गए। वहां की दूकानदार तिब्बती थी। वार्तालाप की प्रोबलम थी, वे न तो हिंदी जानतीं थीं और न अंग्रेजी और न हम चीनी भाषा। हम सामान उठाकर दिखाते और वो केल्कुलेटर पर अंक लिख देतीं,इतने युआन क़ीमत! बार्गेनिंग हेतु हम केलकुलेटर पर अपनी पसंद के अंक लिख देते। हम ने कुछ मिनरल पानी की बड़ी बाटलें खरीदी जो खाली होने पर लौटते वक्त मानसरोवर का पवित्र जल लाने में काम आएंगी। हवा बहुत रूखी और तेज थी।बाज़ार में ज़्यादा बड़े शॉरूम के अलावा छोटी दुकानें भी थीं। घूमते-घूमते हम काफ़ी दूर चले गए। आगे जाकर नेपाली मार्केट था, जहाँ जैकेट, स्वेटर, शॉल, स्कार्फ़ इत्यादि की दुकानें थीं। वे सामान खरीदने पर युआन के अलावा रुपए भी ले रहे थे। चीन में खाने का इंतजाम हमें अपना करना होता है। इस लिए फ़ूड कमेटी ने आनेवाले दिनों के लिए काफ़ी सारी सब्जी खरीदीं। आगे की यात्रा के बाद हमें यहीं वापिस आना था। आगे के लिए पोनी और पोर्टर के लिये फाइनेंस कमेटी के पास युआन जमा करने को कहा गया। पोनी के लिए 1200 (12000 रुपए) युआन और पोर्टर के लिए 400 (40000 रुपए) युआन तय थे। हम पति पत्नी ने दो पोनी और एक पोर्टर लेने का निर्णय लिया और युआन जमा करा दिए। उतराखंड के घोड़े वालों के विपरीत यहाँ के घोड़े वाले एक छोटे बैग के अलावा आपको ज्यादा सामान घोड़े पर लादने नहीं देते।
कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान चीन सरकार द्वारा यात्रियों को रूकने की व्यवस्था, तथा खाना बनाने हेतु बर्तन व गैस सहित चुल्हा की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। भोजन सामग्री एवं रसोईया का इंतजाम यात्रियों को स्वयं करना होता है, इसलिए तकलाकोट से दो रसोइयों का सामूहिक व्यय पर इंतजाम किया गया। दिल्ली से यात्रा में रवाना होने के पूर्व यात्रियों के लिए 10 दिन का राशन सामग्री एवं दो बैग मेडिकल किट दिल्ली की एक संस्था द्वारा प्रदाय किया गया था।
हमारे गाइड गुरु द्वारा दिये निर्देशों से हम यात्री इतना डरे हुए थे कि हम बाहर मार्किट की फोटो खीचते हुए डर रहे थे की कहीं कोई सरकारी इमारत न हो। खैर हम घूम घाम के वापस आ गए, खुद को ज्यादा थकाया नहीं आने वाले दिन के लिए शक्ति बचाने हेतु। हम से पहिले गया दल वापसी उपरांत होटल मे पड़ाव डाले था, परिसर में अपने अनुभव सुना रहा था, परिसर में ही हम सब ने मिलकर भजन गाये और शाम का खाना जो की भारतीय समयनुसार 6 बजे ही लग गय, खाकर अपने अपने कमरों में चले गए और अपने समान को फिर दो भागों में बांटा एक कैलाश की परिक्रमा के समय के लिए और शेष मानसरोवर की परिक्रमा के लिए, और मन और स्व्पनों में कल से प्रारम्भ होने वाली यात्रा का खाका बनाते हुए हम सो गए।


तेरहवाँ दिन तकलाकोट से दारचेन दारचेन की ऊँचाई - 4670 मीटर
कुल रास्ता : - 130 कि.मी बस
आज की यात्रा के उत्साह और रोमांच के मारे रात भर कई बार नींद उचटी और आखिर 5 बजे उठ बैठे निर्देश और सलाह थी चूंकि हम लोग लगभग 12 बजे अपने अगले पड़ाव पर पहुँच जाएंगे और वहाँ सौर ऊर्जा जनित गरम पानी मिल जाएगा सो, सुबह स्नान avoid करें सो हम हाथ मुंह दो फ्रेश हो तैयार हुए। 6 बजे नाश्ता के लिए डायनिंग हॉल गए। और लगभग 7 बजे बस में सवार हो गए। बस बड़ी आरामदायक थी। थोड़ी ही देर में
बस शहर से निकलकर करनाली नदी के किनारे पहाड़ी रास्तो की चढाई चढ़ते हुए चल रही थी। सड़क गज़ब की बनी थे ट्रैफिक न के बराबर कभी कभार कोई गाड़ी दिख जाए तो ठीक नहीं तो विधवा की मांग की तरह सूनी। हरियाली का नामो निशान न था । परंतु इस निर्जनता की अपनी सुंदरता थी। ऊपर सफ़ेद बर्फ़ से ढ़की चोटियाँ तो नीचे मटमैले पठारों की चोटियों हम प्राकृति को निहारते चल रहे थे।
लगभग 50 किमी चलने के बाद हमारी बस एक बड़ी सी झील के किनारे जाकर रूक गई । हमारे गाइड गुरु और डिकी ने बताया कि यह राक्षस ताल है, हम सभी यात्री नीचे उतरे, बस से नीचे उतरते ही तेज ठण्डी हवा महसूस हुई। झील नीलमणि सी चमकती रही थी। अद्भुत सौंदर्य परंतु विडम्बना देखये कि इस झील को अपवित्र माना जाता है। मान्यता है कि रावण द्वारा इसी झील के किनारे बैठकर भगवान शिव की कठिन तपस्या किया गया है। इसलिए इस झील को ‘‘रावण ताल” या “राक्षसताल” भी कहते हैं। रावण के कारण राक्षस-ताल अभिशप्त मानी गयी है। किंवदंतियों में इसके जल को विषैला बताया गया है, इसलिए इसके जल का स्पर्श वर्जित माना गया है। पक्षी भी इस का जल नहीं पीते और ना ही इस झील में कोई जीव जन्तु निवास करते हैं। जहाँ मानसरोवर का पानी मीठा है, वहाँ राक्षस ताल का खारा है। मानसरोवर में मछलियों और जलीय पौधों की भरमार है, जबकि राक्षस ताल के खारे पानी में यह नहीं पनप पाते। स्थानीय तिब्बती लोग इसके पानी को विषेला मानते हैं। हम सभी यात्री इस सुन्दर झील के फोटो खीचने में मग्न हो गए। यहाँ से कैलाश पर्वत के पहले दर्शन होते हैं.
कुछ और आगे चल हम पवित्र मानसरोवर झील पर पहुँच गए। मानसरोवर गोल है और इसे सूरज का और दिन की रौशनी का प्रतीक माना जाता है जबकि राक्षसताल के आकार की तुलना अर्धचंद्र से की जाती है और इसे रात्रि का और अंधेरे का प्रतीक माना जाता है। मानसरोवर के पानी में सूरज की किरणे पड़ रही थी जिससे वह चमकीला दिखाई पड़ रहा था ऐसा लग रहा था जैसे तारे मानसरोवर झील में टिमटिमा रहे हो। यात्रीगण बस से उत्तर कर मानसरोवर झील के सौंदर्य को जी भर के आँखों में बसा रहे थे तो कुछ कैमरे में कैद कर रहे थे। मानसरोवर के किनारे-किनारे दूर में हिमाच्छाादित लंबी पर्वत श्रृखंला लगातार दिखाई दे रही थी। यात्री निस्तब्ध हो, वहीं किनारे पर ध्यान मग्न हो बैठ गए।
लगभग आधा घटें के बाद हम लोगो ने दारचेन शहर के लिए प्रस्थान किया। यहाँ इतनी ऊंचाई पर सड़के शानदार देख मन वहाँ के प्रशासन कि तारीफ के बिना नहीं रह सकता। दारचेन के रास्ते में हिमालय में अनेक हिमाच्छिदत छोटे-छोटे पर्वत दिखाई दिए। दारचेन कैलाश परिक्रमा का बेस कैंप है हमें शहर के बाहर रोक गया, बस और सामान चेक हुआ और हम लोगो ने शहर में प्रवेश किया।
लगभग 11.30 बजे हम लोग दारचेन पहुंचे। हमारी बस बांऊण्ड्रीवाल से घिरे हुए भवन के पास जाकर रुकी। यहाँ पर एक सर्व सुविधा युक्त गेस्ट हाऊस में रूकवाया जाता है। बस के रूकते ही हम लोग अपना-अपना लगेज उतार कर गेस्ट हाऊस में दाखिल हुए। बस से उतरते ही आपको तिब्बती महिलाएँ अपनी पारंपरिक वेशभूषा में घेर लेती हैं मोती/स्टोन की बनी मालाएँ और अन्य आभूषण बेचने हेतु प्रदर्शित करने लगती है । परंतु सावधान सभी सामानों के भाव में मोल-तोल बहुत किया जाता है।
हमारे साथ आए कुक्स की कार्य कुशलता का क्या कहना 1.30 बजे भोजन तैयार होने की घंटी बजी तब तक हम गरम पनि से नहा धो भोजन हेतु गए भोजनोपरांत हम दारचेन के स्थानीय बाजार घुमने गए। प्रायः सभी दुकानों के मालिक तिब्बती महिला ही थी। खाने-पीने के सामान के अलावा अन्य सभी सामानों के भाव में मोल-तोल बहुत किया जा रहा था। हम ने कथित स्फटिक मालाएँ, दोस्तो रिशतेदारों के लिए यात्रा यादगार छोटे उपहार खरीदे। आसमान से कोहरा छटने पर दूर पहाड़ों के बीच में शाम को लगभग 5 बजे गेस्ट हाऊस से कैलाश पर्वत के दर्शन हुए। यहाँ से सामने की ओर से कैलास साफ दिखाई पड़ता है. 22,000 फीट की ऊंचाई वाला कैलास कुल 45 किलोमीटर इलाके में फैला है सभी यात्रियों ने कैलाश पर्वत के दर्शन किये। वाईफाई भी चालू हो गया था सो हमने वीडियो कॉल कर दोस्तो परिवार वालों को को भी कैलाश के दर्शन कराये। शाम की चाय पर हमारी फूड कमेटी के प्रयासों से गरम पकोड़ो के साथ गीतो की महफिल जमाई। यहाँ के डायनिंग हाल का माहौल/ambience गज़ब का है। बैठक व्यवस्था में सोफ़े लगे हुए थे। मेहफ़िल उपरांत सब को निदेश दिया गया की अगले तीन दिन के लिए सामान एक अलग बेग में भर बाकी सामान यहाँ जमा कर दें जो की कैलाश परिक्रमा के उपरांत यहाँ से कलेक्ट कर सकते हैं। निर्देश अनुसार रात्रि भोजन के लिए इकठे होने से पहले हमने अतरिक्त समान गेस्ट हाउस में निर्धारित जगह पर रख दिया और भोजन के बाद हम लोग सोने चल दिये, कल एक और ट्रेक के रोमांचक दौर के लिए ।
चोदहवाँ दिन--दारचेन से यम-द्वार(8 किमी बस द्वारा),
यम-द्वार से डेरापुख 10 किमी (पैदल लगभग 5 घंटे पोनी - लगभग 3 घंटे)
यम द्वार की ऊँचाई 4810 मीटर
डेरापुख की ऊँचाई 5050 मीटर
आज फिर हम सबेरे 5 बजे उठकर तैयार हो गया। हम पति पत्नी का एक बड़ा 15 लिटर का पिठू बैग और दो छोटे और तमाम हल्के बैग और एक थर्मस, दोनों बेल्ट-पाऊच कमर में बाँधकर, पानी की बोतल और फोल्डिंग छड़ियाँ लेकर हम गेस्ट हाउस से बाहर आ गए। अहाते में ही बस खड़ी थी। हम बस में जाकर बैठ गए। ठीक 7.30 बजे बस आगे यात्रा के लिए रवाना हुई। हमारी बस पहाड़ी कच्चे रास्ते से होकर आगे बढ़ रही थी। चारो तरफ सपाट बंजर भूमि नजर आ रही थी। हम आगे बढ़े. सामने का नजारा अद्भुत था. दो घाटियों के बीच में बर्फ की सफेद चादर से ढकी पर्वत-शृंखला, उसके पीछे नीला साफ आकाश. थोड़ा और आगे बढ़े, एक और घाटी, चारों तरफ बर्फ से ढकी हुई. हमें बताया गया कि यहीं महादेव ने कामदेव को भस्म किया था. तब यहां इतनी बर्फ नहीं थी, हरियाली थी और फूल खिलते थे. बारहों महीने वसंत रहता था. तारक नाम के राक्षस से देवता आक्रांत थे. उसे ब्रह्मा का वरदान था. देवता ब्रह्मा की शरण में गए. ब्रह्माजी मुस्कुराए, बोले—तारक का संहार शिव-पुत्र ही करेगा. पर शिव तो सती के वियोग में तपस्यारत हैं, फिर पुत्र कैसे होगा? उनकी तपस्या तोड़ने के लिए इंद्र ने कामदेव को भेजा. कामदेव पहुंचे तो उस बर्फीले पर्वत पर वसंत छा गया.
पार्वती अपनी सखियों के संग शिव के दर्शन के लिए पहुंचीं. तपस्या में लीन शिव के चरणों में पुष्प अर्पित किए. घनी झाड़ी में छुपे कामदेव ने फूलों से बींधा बाण चला दिया. शिव ने पार्वती को देखा, उनकी तरफ हाथ बढ़ाया. सोचने लगे, यह सुंदरी यहां कैसे! ध्यान भटका. लेकिन फिर तप में लीन हो गए. पर कहीं व्यवधान था. ध्यान केंद्रित नहीं हुआ. शिव चकित थे. काम का बाण अपना असर दिखा रहा था. कामदेव मुस्कुराए. तभी शिव का तीसरा नेत्र खुल गया. कामदेव वहीं भस्म हो गया. पार्वती व सखियां घबराकर भाग गईं.
कामदेव की पत्नी रति रोती-बिलखती शिव की शरण में आई—मेरा क्या होगा प्रभु? भोलेनाथ पिघले. बोले—अच्छा, जाओ, कामदेव को जीवित करता हूं; पर अब वह अनंग रहेगा. कभी सामने नहीं आ पाएगा. हमेशा छुपकर वार करेगा. पहले वहां बारहों महीने फूल खिला सकता था, पर अब नहीं. अब केवल दो महीनों के लिए फूल खिलेंगे और तब वसंत आएगा. तभी से वसंत सिर्फ दो महीनों के लिए ही आता है.
दारचेन से ८ कि.मी. आगे जाने के बाद बस रूक गई उस समय सुबह 8.30 बजे थे, हमें बताया गया कि बस इसके आगे नहीं जाएगी, आगे का रास्ता पैदल एवं घोडे से तय करना होगा। सभी यात्री नीचे उतर आए। सामने एक बड़े गुंबज वाला द्वार बना था। गुरु गाइड ने बताया- यह यम-द्वार है।
इस द्वार की परिक्रमा करके ही कैलाश की परिक्रमा प्रारंभ होती है। किवंदिति है, अगर आप इस की परिक्रमा कर के इस द्वार को पार करते हो तो मृत्यु-भय समाप्त हो जाता है। द्वार के इस ओर संसार है तो उस पार मोक्ष-धाम! बौद्ध लामा लोग यहाँ आकर प्राणांत होने को मोक्ष-प्राप्ति मानते हैं। इसलिए बीमार लामा अंतिम इच्छा के रुप में यहाँ जाते हैं और प्राण-त्यागते हैं। ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम स्थल इसी के पास है.
यम-द्वार के चारों तरफ रंग बिरंगी झंडियां लगी हुई थी। उसके दोनों ओर छोटे-छोटे चबूतरे बने थे। लोग शरीर-त्याग के प्रतीक के रुप में अपने शरीर से बाल नोंचकर वहाँ अर्पित कर रहे थे। द्वार के पार कैलाश-पर्वत अपने चरम सौंदर्य के साथ विधमान थे यहाँ से कैलाश बाबा का दक्षिणी मुख दिखता है। सभी यात्री इस द्वार को पार कर परिक्रमा कर भगवान शिव के निवास स्थल ‘‘कैलाश” पर्वत के परिक्रमा हेतु पोनी एवं पोर्टर के अलॉटमेंट का इंतज़ार करने लगे। यात्रियों के द्वारा अपनी-अपनी आवश्यकता अनुसार पोनी पोर्टर की मांग तकलाकोट में ही चीनी अधिकारियों को बता दी गई थी। उसी के अनुरूप यहां पोनी पोर्टर उपलब्ध होने थे। हमारे खाने, किराने और किचेन के समान के लिए याक भी आए थे।
हम सब एक नदी के किनारे के विस्तृत क्षेत्र में खड़े थे जहाँ बहुत सारे पोनी थे और तिब्बती पोर्टर। गुरु ने पोनी लेने वाले तीर्थयात्रियों की एक लाइन और पोर्टर लेने वालों की दूसरी लाइन लगाने को कहा, जिनको दोनों लेने होते है उन्हे अपने बैग पोर्टर वाली लाइन में रखना होते है

हमारा गाइड घोड़े वालों और पोर्टर के नामों की पर्ची एक टोपी में डालकर लाइन में लगे हरेक यात्री के पास जाकर एक-एक पर्ची उठाने को कहता जिस पर्ची पर जो नाम लिखा था वही उसका पोर्टर था। जिन यात्रियों ने केवल पोर्टर ही हायर किया था वे उनके साथ परिक्रमा पर चले गए, पर जिनको पोनी भी चाहिए था वे अभी भी अटके हुए थे। चूंकि घोड़े और पोर्टर पहिले ही देर से आए और फिर उनकी यात्री एलाट करते करते लगभग 9.45 पर हम परिक्रमा आरंभ कर पाये। हमारा एक बड़ा बैग पोर्टर ने उठा लिया और दो छोटे बैग जिसमें निजी जरूरतों के सामान थे वो हमारी पीठ पर थे। तीखी चुभन वाला ठंडा और खुश्क मौसम था। हमने अपनी कलाई पर काफूर की पोटली बांध रखी थी, समय पर इसे सूंघकर राहत महसूस होती थी
इन पोनी और पोर्टेरों को हिंदी या अंग्रेजी बिलकुल नहीं आती थी इसलिए इशारे से अपनी बात समझनी और समझानी पड़ती है। मैं घोड़े वाले के साथ पैदल ही चल पड़ा कब कभी तीखी चढ़ाई आती मैं घोड़े पर सवार हो जाता, हम प्रकृति के अद्भुत दृश्यों का आनंद लेते चलते जा रहे थे, आकाश गहरा नीला था, सूर्यदेव अपनी ऊष्मा उड़ेल रहे थे। दायीं ओर कैलाश-पर्वत अपनी श्वेत आभामय छवि के साथ दिव्य-दर्शन दे रहे थे, साथ में नंदी पर्वत उनके सौंदर्य की वृद्धि कर रहा था। बीच-बीच में हमें सामने से आते बौद्ध-अनुयायी परिक्रमा लगाते दिखायी दिए। कुछ तो लेट-लेटकर परिक्रमा मार्ग पर जा रहे थे।




आगे जाने पर हमें कुछ टेंट लगे दिखाई दिए, इन टैंट में खान पान की दुकान थी, क्योंकि हम अभी अभी तो चलना चालू किए थे, मैंने घोड़े वाले से कहा चलते रहो, पर उसने माना किया, हमारी गाइड डिकी ने स्पष्ट किया कि ये पोर्टर पोनी वाले सुबह सवेरे अपने गांवों से निकलते है और इस समय तक उन्हें भूख लग आती है सो उनके लिए रुकना पड़ेगा। कुछ देर के बाद हम फिर से आगे चल दिए।
करीब 1.30 बजे के करीब हम डेरापुख पहुँच गए। दारचीन और यम द्वार से हमने पवित्र कैलाश के दक्षिण मुख का दर्शन किया था और यहाँ से हम भगवान शिव के उतरी मुख का दर्शन कर रहे थे, विशाल पर्वत हमें बाहें फैलाये स्वागत आतुर प्रतीत हो रहा था ।
डेरापुख हमारा आज का विश्राम-स्थल था। सभी यात्री अपने अपने कमरों में चले गए। कमरे में छः पलंग पर बिस्तर लगे थे। मैं और कुछ साथी तुरंत ही यहाँ से करीब दो दो किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पर चरण स्पर्श की ओर चल दिये हालांकि हमारे गाइड ने यात्रा स्टार्ट करने से पहिले ही चेतावनी दी थी कि चरण स्पर्श तक जाने कि अनुमति नहीं है, फिर भी कोई जाना चाहे तो अपनी रिस्क पर जा सकता है और कोई गाइड साथ नहीं जाएगा, वहाँ कभी भी मौसम खराब हो जाता है, कई लोगो का अनुभव है कि उन्हे किसी दिव्य शक्ति के कारण रास्ता भटक गए मतलब उन्होने हर तरह से हतोत्साहित और डराने कि कोशिश की परंतु हमारे दल के दोनों एलओ और कुछ साथी चल दिये चरण स्पर्श कि और मेरी पत्नी ने पहिले तो माना कर दिया परंतु बाद में वे भी दल के सबसे बुजुर्ग साथी 65 वर्षीय श्री कापुरचंद और श्रीमति मीनक्षी के साथ वहाँ पहुँच गईं थीं।
हम कैलाश-पर्वत की ओर से बहकर आ रही जलधारा के किनारे-किनारे पहाड़ी पर चढ रहे थे। बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच से निकलते हुए हम आगे बढ़ते जा रहे थे। एक एक कदम करके दम भरते काफ़ुर सूंघते चल रहे थे, मेरी गति धीमी पड़ गयी थी और एक समय पर मैं अकेले ही रह गया, बाकी लोग आगे चले गए थे, मैं घबरा रहा था, परंतु ऐसा अहसास हो रहा था कि कोई अंजान शक्ति मुझे पीछे से सहारा देकर आगे बढ़ाती जा रही है, चलते-चलते पानी की बोतल समाप्त हो गई। गला सूखने लगा पर चरण-स्पर्श का कुछ पता नहीं। जितना आगे जाते उतना ही रास्ता और कठिन होता जा रहा था। शिलाओं पर कूदते-फांदते डर भी लग रहा था कि कहीं संतुलन न बिगड़ जाए, पर ’ऊँ नमःशिवाय’ का जाप करते बढ़ते जा रहा था। अंधेरा होने का भय सता रहा था पर अंजान दिव्य शक्ति ने आखिर मंज़िल पर पहुंचा दिया कैलाश पर्वत के चरणों में अद्भुत दृश्य था, साँसो को संयत कर वहीं नतमस्त्क हो, ठंडी बर्फीली जमीन पर बैठ गया, आँखों से स्वतः अश्रु धारा बह रही थी, आँख खुली तो देखा पत्नी भी वहाँ पहुंची हुई थी मन दुगनी प्रसनता और प्रभु के प्रति आभार से भर उठा। करीब 4.30 बजे हम पहुंचे थे और एक घंटा ध्यान पूजन और फोटोग्राफी कर वापस चल दिए लौटते समय भी मैं मेरी धीमी चाल के कारण पीछे रह गया, पर हमारा अंधेरे हो जाने का खतरा भी निर्मूल साबित हुआ करीब 7.30 बजे तक अच्छी ख़ासी रोशनी थी।
वापिस आके कुछ देर आराम करने के बाद मैं कमरे से बाहर आया थोड़ी देर बाद सूप आ गया फिर खाना खाया और सोने चले गए 8 बजे ही क्यों कि कल जल्दी उठना था कल का रास्ता इस यात्रा का सब से कठिन रास्ता डोलमा पास था। रात्रि में अंग अंग दर्द कर रहा था, कुछ दर्द के मारे, कुछ high altitude सिकनेस के कारण नींद नहीं आ रही थी, नींद न आने के बारे मे हमें पहिले से ही चेता दिया गया था। 11-11.30 के करीब जब नींद आने को लग रहा था तो अंडकोशों/gladder में लघुशंका का प्रैशर सत्ताने लगा पर कुछ ठंड और कुछ घुप अंधेरे के कारण बाहर निकलने की हिम्मत न हो रही थी, दूर कोने वाले बिस्तर पर भी हलचल महसूस हुई तो मैंने पीलीभीत के हमारे सबसे जवान साथी अनुज को साथ में लघुशंका के लिए बाहर चलने का निमंत्रण दिया जो उन्होने सहर्ष स्वीकार कर लिया। आजा सनम मधुर चाँदनी मे हम, गाते हुए हल्के हुए, वॉट ए रिलीफ़😀😀😀😀😀 का भाव लिए वापस आए, तब जाके कुछ देर के लिए आँख लगी।
पंद्रहवाँ दिन-----डेरापुख से ज़ुंज़हुई पुक
डेरापुख से ज़ुंज़हुई पुक , दूरी 20 किमी पैदल
डोल्मा-ला पास ऊँचाई 5750मीटर/19500 ft.
ज़ुंज़हुई पुक की ऊँचाई 4780 मीटर
आज हम सब ने यात्रा का सबसे कठिन और ऊँची चढ़ाई वाला भाग तय करना था। यहाँ सब कुछ मौसम पर निर्भर था, कब बर्फ़ पड़ने लगे और कब तेज बारिश, कुछ भी सुनिश्चित नहीं होता। सुबहे 4 बजे हम उठ गए बाहर काफी ठंडक थी। पाँच कपड़ो की परत पहने टोर्च के सहारे, बुरे तरह से गंधियाते, शौचालय में, कुंडी न खड़काओ राजा, सीधे अंदर आओ राजा गाते, 😀😀😀😀😀😀😀क्योंकि दरवाजे में कुंडियाँ ही नहीं थी किसी तरह नित्य कर्म निपटाए। इस मामले में चीनी सरकार के लिए मन में गंदे गंदे विचार आ रहे थे, पूरे परिक्रमा पथ पर 6 दिन यही व्यथा रही।
सुबह यहाँ से हमारे कुछ साथी स्वस्थाय ठीक न होने और कुछ आगे आने वली भीषण चढ़ाई भाँप वापिस चल दिए पर 65 वर्षीय दोनों बुजुर्ग अभी भी हमारे साथ थे। और दोनों ही चरण स्पर्श पर भी हमारे साथ थे, उनकी ज़िंदादिली, जिजीवषा और साहस को प्रणाम।
ब्रश वगैहरा कर के चाय पी, नाश्ते में दूध कोर्नफ़्लेक्स खाये और तैयार हो गये। हम सभी बाहर आ कर गोल्डन कैलाश के दर्शन के लिए खड़े हो गए। बादल होने के कारण गोल्डन कैलाश के दर्शन न हो सके। तब तक हमारे घोड़े वाले आ गए।
‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ उद्घोष के बाद पैदल यात्रा 5.15 पर शुरू की गई। हवा में पूरी ठंडक थी। सांस फूलना सामान्य बात थी। थोड़ी दूर ही पैदल चलने पर सांस फुलने लग गया चूंकि आगे लगभग 5 कि.मी. खड़ी, संकरी, पथरीली चढ़ाई थी, इसलिए घोड़े से आगे की यात्रा प्रारंभ की गई। रास्ते में चारो तरफ सिर्फ चट्टान ही चट्टान दिखाई दे रहा था, पेड़ पौधे एवं हरियाली के नामो निशान नहीं है।
ठंडी और तेज हवा के बीच उन पथरीले टीलों को पार करके हम साढ़े छः के आसपास खड़ी ऊँची पहाड़ी पर चढ़ने लगे। चढ़ाई मानों किसी दीवार पर चढ़ रहे हों। घोडा बार-बार पीछे को आता हम बड़ी मुश्किल से, घोड़े पर आगे की तरफ सिर झुकाए हुए संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे थे । डोल्मा पास से आधा कि.मी पहले घोड़े वाले ने हमें उतार दिया क्योंकि आगे तीखे मोड़े और नुकील पत्थर थे । एक एक कदम बढ़ाते इंच दर इंच सरकते चढाई चढ़ कर हम लोग डोल्मा पास पहुंचे जिसकी समुद्र सतह से ऊचाई 19500 फीट हैं इस स्थल को तिब्बती देवता डोमा के नाम से डोल्मा माता का स्थान भी कहते है। चारो ओर से उच्च्चतम पर्वत-मालाओं से घिरा, फैली हुयी विशालाकार चट्टानों/शिलाओं से पटा पड़ा विशाल दर्रा – डोलमा-ला पास!!! दिल दहला देनेवाली यह सबसे कठिन चढ़ाई थी. यहां आते-आते सांसें छूटने लगीं. डोल्मा से कैलास शिखर की ऊंचाई महज 3,000 फीट रह जाती है. लग रहा था कि हाथ बढ़ा कैलास को छू लें. बर्फ से ढके शिवलिंग की तरह कैलास सबसे मनोरम यहीं से दिखते हैं. सचमुच स्वर्ग की सीढ़ी का अहसास होता है. बाकी हिम-शिखरों से बिलकुल भिन्न. अदृश्य शक्तियों का भंडार. संतुलित पूरा पहाड़ जितना लंबा उतना चौड़ा.
यहाँ से कैलाश का पश्चिमी चेहरा दिखता है इस छोर से उस पर बनी शेषनाग की लहरियां दिखती हैं. गाइड ने बताया कि ये समुद्र-मंथन के निशान हैं. कुदरत से बड़ा संगतराश कौन है. ग्रेनाइट पत्थर का यह पर्वत महाशिवलिंग का आभास देता था. रास्ता खतरनाक था. हमें बड़े-बड़े पत्थरों पर संतुलन बिठाकर चलना पड़ रहा था. लगता था, अगर पांव फिसला तो सीधे महादेव के चरणों में. डोल्मा पास पर रंग बिरंगी तिब्बती मंत्रो से लिखी झंडियां लगी हुई थी, जो एक अलग ही बहुत सुन्दर नजारा पेश कर रही थी।
डोल्मा से आगे केवल चट्टानयुक्त पगडण्डी है, पैदल ही चढ़ाई से उतरना है, इसलिए घोड़े खाली चले आ रहे थे । हम धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा। थोड़ी ही दूर चलने के बाद पहाड़ी के नीचे घाटी में आपस में मिले हुए दो छोटे-छोटे तालाब जैसे दिखाई दिया, जिसमें पानी हरें रंग का दिखाई दे रहा है जिसके बारे में बताया गया कि यह ‘‘गौरीकुण्ड‘‘ है मान्यता है कि यहीं पार्वती स्नान करती थीं. यहीं गणेश पैदा हुए थे. शिव के लिए पार्वती ने यहीं तपस्या भी की थी । यहाँ रुककर कई लोग फोटोग्राफ खींच रहे थे, इसलिए काफी भीड़ थी, पतली सी पगडंडी थी और खाली घोड़े वाले आयें देख रहे थे न बाएँ, सो यहाँ सावधानी के जरूरत है, मैं तो घोड़े के पीठ पर लदे ज़ीन से टकरा के गिर गया, लोग वहाँ पर पड़ी कपड़े की झंडियों पर भी फिसल रहे थे। खैर मैं उठ के चल दिया नीचे की ओर, नीचे उतरना भी कम खतरनाक नहीं था एक एक कदम संभल के उतरना पड़ता है, भारी हवा के कारण सांस लेना भी मुश्किल होता है और जब मैं नीचे पहुँच गया जाकेट की जेब टटोली तो मेरा छोटा सा सोनी का कैमरा गायब था जो की ज़रूर ऊपर गिरने के कारण मेरी जाकेट से फिसल गया होगा, वहाँ बौद्धों का तीर्थ होने के कारण लोकल तिब्बती लोगो की बहुत आवहजावही थी, कैमरा मिलने की संभावना कम ही थी और वापस ऊपर चढ़ने की हिम्मत ही नहीं थी मन मसोस कर आगे बढ़ चला केमेरा से ज्यादा उसमे दर्ज यादगार फोटोस के खोने का ज्यादा गम था।
कुछ यात्री गौरी कुण्ड से जल ले जाने के लिए अपने अपने पोनी और पोर्टर को अलग से युआन दे रहे थे। क्योकि यात्रियों को जल लाने हेतु नीचे खतरनाक फिसलन होने से नीचे जाने की सलाह दी गई थी।
डोलमा-ला पास से आते रास्ते में मिल गये पत्थरों पर चढ़ते-उतरते पैर और घुटने बिलकुल बेहाल थे। आगे हमने बर्फ का छोटा सा ग्लेशियर पार किया और अब रास्ता उतराई का था काफी चलने के बाद हम ल्हाचू घाटी में पहुंचे। नीचे पहुँच के मालूम पड़ा यहाँ भी मैं सब से पीछे रह गया था हमारे दल के साथ के सभी साथी, मेरी पत्नी भी आगे जा चुकी थी। ल्हाचू घाटी में एक छोटी सी दुकान भी थी। जिसमें कोल्डड्रिंक, पानी के बोतल और चॉकलेट इत्यादि मिल रहे थे। चूंकि मैं थक के चूर हो चुका था, मैं भी वहां रूककर थोड़ी देर विश्राम किया, और दुकानदार से गरम पानी ले अपने साथ लायी इंस्टेंट मैगी मे डाल पेट पुजा की चाय पी फिर चल दिये घुड़सवार बन। हम मिट्टी के ढ़ेरों वाली उबड़-खाबड़ उतार-चढ़ाव रहित घाटी में चल रहे थे। बायी ओर मंद-मंद बहती नदी थी। जैसे-जैसे हमारी यात्रा आगे की ओर बढ़ती जा रही थी वैसे-वैसे नदी चौड़ी और गहरी होती जा रही थी। इस के बाद का रास्ता खत्म होने पर ही नहीं आ रहा था। मेरे दल का कोई साथी दूर दूर तक नहीं दिख रहा था, घोड़े पर बैठे बैठे पीठ अकड़ रही थी
चलते चलते अंतः मैं ज़ुंज़हुई पुक कैंप पहुँचा। नदी किनारे थोड़ी दूर पर सामने एक लाइन में कई कमरे बने थे प्रत्येक कमरे में पांच बिस्तर लगे थे। पीने के लिए गर्मपानी का जग रखा था पर यहाँ भी टॉयलेट या बाथरुम नहीं थे। कमरों के पीछे खुले में एक ओर महिलाएं और दूसरी ओर पुरुष टॉयलेट की तरह जा सकते थे। सारे यात्री पहले ही पहुँच चुके थे । मैं भी एक खाली कमरे में बिस्तर पर लेट गया। अकेले बैठे कैमरा खोने का गम उभर के चेहरे पर उदासी बन छा गया। शरम के मारे साथियों से भी जिक्र नहीं किया।
शाम के समय चन्द्रमा अपने पूरे रूप में हमारे कमरों के सामने चमक रहे थे। सामने पहाड़ पर सूर्य की किरणे और साथ ही पूर्ण चन्द्रमा अलग ही नजारा पेश कर रहे थे। सब ने जल्दी से इस नज़ारे को कैमरे में कैद करना शुरू कर दिया। मेरे को उदास देख मित्रो ने पूछा तो उन्हे आप बीती सुनाई, तो वो बोले, अरे! वो जो हमारे साथ जो दूसरा दल चल रहा था उसके एक साधुवेशी सदस्य को एक कैमरा मिला है, मैं भाग के उसके कमरे मे पहुंचा और कैमरा का पूछा तो झोले से निकाल कैमरा दिखाया, ये देखिये ईश्वर की असीम कृपा मेरा कैमरा मिल गया था, मन खुशी से झूम उठा। आज सभी बहुत प्रसन्न थे क्योंकि शिव की कृपा से यात्रा का कठिनतम भाग भी निर्विघ्न पूरा हो गया था। सभी सकुशल रहे और मौसम हमेशा अनुकूल बना रहा। अत्याधिक थकावट के मारे आज सभी साथी खाना खा जल्दी ही सो गए
सोलहवां दिन---ज़ुंजुनहुई पुक से कुगु
कुगु की ऊंचाई 4600 मीटर लगभग 5 किमी. पैदल १२० किमी बस से
सुबह 4 बजे उठ गये नित्य क्रिया से फारिग हो, चाय और नाश्ता कर के 5:30 बजे तक चलने को तैयार हो गये। शिव वंदना और जयकारे के साथे यात्रा शुरू की, कल की यात्रा की अपेक्षा आज की यात्रा का रास्ता आसान था। सभी यात्री लगातार बढ़े जा रहे थे। हम जोंगज़ेर्बू नदी के किनारे-किनारे दूसरी ओर कच्चे पहाड़ों के बीच समतल घाटी में प्रकृति के रुप को निहारते बढ़ते जा रहे थे।
करीब 5 कि.मी. चलने के बाद हम ऐसे जगह पहुंचे जहाँ बस हमारा इंतज़ार कर रही थी। यात्री आते जा रहे थे और कैलाश-परिक्रमा पूर्ण होने की बधाई दे रहे थे। सभी बस में आ कर बैठ गये ड्राइवर ने बस स्टार्ट कर दी। बस में सभी ने एकसाथ जय भोले का घोष किया। बस चल पड़ी। 8:30 बजे पुनः दारचेन के उसी गेस्टहाऊस में जाकर रुक गयी। यहाँ से हमने जो सामान छोड़ा था वापिस कलेक्ट किया। कुछ वहाँ बैठी महिलाओं से ख़रीदारी की और वापिस बस में सवार हो चल पड़े।
अब हमें मानसरोवर की परिक्रमा बस से ही करनी थी, बस चलते हुए गाँव, मैदान और पठार पार करती विशाल मानसरोवर के किनारे-किनारे बनी पक्की सड़क पर दौड़ रही थी। हम बस की खिड़की से मानस सरोवर को निहार रहे थे। सड़क कभी झील के पास होती तो कभी दूर, झील के पार कैलाश-पर्वत के भी साथ-साथ दर्शन हो रहे थे। यात्रा में लगातार हमारी बस मानसरोवर के किनारे-किनारे ही जा रही थी।
मानसरोवर के चारों ओर से दुनिया की चार बड़ी नदियां निकलती हैं. मानसरोवर के पश्चिम की ओर से निकलनेवाली सतलुज नदी है. तिब्बती इसे ‘लांजयेन खंबाब’ कहते हैं, जिसका मतलब हाथी का मुंह होता है. दक्षिण की ओर बहनेवाली नदी करनाली है, जिसे तिब्बती में ‘मेपचा खंबाब’ कहते हैं. यही नदी भारत में पहले सरयू और बाद में घाघरा कही जाती है. ब्रह्मपुत्र को तिब्बती ‘तमचोक खंबाब’ कहते हैं, यानी घोड़े का मुंह. यह पूर्वी छोर से निकलती है. सिंधु शेर के मुंह से निकलनेवाली नदी कही जाती है. उत्तर की तरफ से निकलने वाली ‘सिंधु’ नदी को ‘इंडस’ भी कहते हैं.
लगभग 10.30 बजे हम मानसरोवर के किनारे बने कुगु स्थित गेस्टहाऊस पहुंचे, गेस्ट हाउस की लोकेशन बड़ी शानदार थी गेस्टहाऊस में दो ओर आमने-सामने पंक्तिबद्ध कमरे बने थे। सभी के दरवाजे प्रांगण में खुलते थे और सभी खिड़कियाँ मानसरोवर की ओर खुलती थीं। दूसरी पंक्ति के कमरों के खिड़कियाँ मान्धाता पर्वत की ओर। अन्य दो साइड्स में एक ओर दरवाज़ा बना था मोनेस्ट्री की ओर, तो दूसरी ओर खुला क्षेत्र था, उसी ओर दो टॉयलेट बने थे। दोनों ओर से मानसरोवर झील के किनारे तक पहुँचा जा सकता था।
हम लोग अपने कमरे में आ गए। कमरा बहुत साफ़ सुथरा और बड़ा था। दरवाजे के बिलकुल सामने पूरी दीवार की चौड़ाई में बड़ी खिड़की जिस पर काँच के पल्ले थे। पूरी कैलाश और मानस परिक्रमा का सबसे बेहतर कमरा था। कमरा और उस की साज सज्जा देख कर दिल खुश हो गया। मौसम साफ़ था। धूप खिली थी सो यात्रियों ने निश्चय किया कि मानस में डुबकी उसी दिन लगा ली जाए क्योंकि अगले दिन मौसम अनुकूल हो या न हो। इस वर्ष चीनी सरकार ने सरोवर मे डुबकी लगाने और सीधे नहाने पर पाबंदी लगा दी थी सबको बाल्टी और मग दे दिया गया था, बाल्टी भर के स्नान किया जा सकता था, डुबकी लगाकर पकड़े जाने पर ५००० युवान का फ़ाइन था।
हमने अनेक झील देखीं हैं, मै तो झीलों की नागरी भोपाल का बंदा हूँ, पर यह दिव्य झील मानो नीलमणि पिघलकर बह रही हो!!! कहते हैं ब्रह्मा ने देवताओं के लिए इसे रचा! स्वच्छ जल! आकाश जिसमें डूबता सा लगता था, लहरें मानों अनुशासन में नापकर दूरी तय करती हों और सामने भव्य कैलाश का दर्शन! क्या कहें लिखते में भी रोमांच होता है! पहले झुककर कैलाश पर्वत को नमस्कार किया और पिघली बर्फ़ से ठंडे जल को दोनों हाथों में लेकर मस्तक से लगाया।
मानसरोवर का पानी एकदम साफ, अत्यधिक ठण्डा है। पानी में कमर तक गहराई में जाने पर भी नीचे सतह स्पष्ट दिखाई दे रहा था। पानी ठण्डा होने के बाद भी मानसरोवर में काफी अंदर जा बाल्टी भर सर पर पलटने पर असीम आनन्द की अनुभूति हुई। मानसरोवर में खड़े हो दूसरी तरफ दूर दिखाई दे रहे ‘‘कैलाश‘‘ को नमस्कार करना एक अलग ही अनुभव था, झील के सामने दूसरी तरफ ओर बर्फ से ढके मांधाता पर्वत थे। मानसरोवर में स्नानकर अद्भुत अनुभूति प्राप्त कर अपने कमरे में लौट आये। फिर एक कमरे बैठ दल के सदस्यों ने गानो की महफिल सजाई और खूब आनंद लिया।
शाम होने पर मानसरोवर किनारे खड़ा होकर सूर्यास्त देखा और कैलाश दर्शन कर अपने अपने कमरों में सोने के लिए चले गए। ऐसी मान्यता है कि रात्रि के अंतिम प्रहर में भोर से पहले देवगण आकाश मार्ग से रौशनी के रूप में मानस में स्नान करने आते हैं शूटिंग स्टार जैसा दृशय होता है ऐसे अनुभव कई यात्रियों के सुने थे, सो हम जल्दी खाना खा सो गए एक बजे का अलार्म लगा, एक बजे हम खिड़की के पास लगे टेबल पर जा बैठे, टकटकी लगा आसमान देखते रहे, काफी देर तक, चाँदनी रात मे नीला पानी झिलमिला रहा था, पानी की लहरों के थपेड़े यहाँ तक सुनाई दे रहे थे परंतु देवीय रोशनी के दर्शन नहीं हुए। कुछ देर बाद बाहर हलचल सी सुनी तो देखा हमारे दल के कुछ सदस्य नीचे झील तक जा रहे थे सो हम सभी बाहर झील की तरफ गए, हम सभी झील के किनारे बैठ कर देवगणो का इंतज़ार करने लगे। एक दो बार आकाश में प्रकाश फैलता नजर आया था जैसे कोई टॉर्च से प्रकाश फैंक रहा हो। बाहर बहुत ठण्ड थी। तापमान माइनस में होगा शायद। हम सभी ने कई लेएर्स में कपडे, दस्ताने, कैप आदि पहन रखे थे। सभी का ध्यान झील और आकाश की तरफ था। २ घंटे के करीब बैठने के बाद मैं कमरे में चला गया। धीरे धीरे सभी यात्री अपने अपने कमरों में चले गए। शायद इतने साफ वातावरण में जहां तारे इतने साफ दिखाई दे रहे थे शूटिंग स्टार्स को या दूर हाइवे पर जा रहे वाहनो की रोशनी को ही लोग दिव्य रोशनी समझते होंगे। खैर जो भी हो चाँदनी रात में झिललमिलती झील का आनंद तो लिया हमने।
सत्रहवाँ दिन - एक ठहरा हुआ दिन मानसरोवर के सानिध्य में
आज आराम से सो कर उठे। जल्दी से दैनिक क्रिया से निवृत हो गए। इस के बाद मानसरोवर किनारे चले गए। पानी काफी ठंडा था, मानसरोवर के सुबह के अलौकिक दृश्यों कि फोटो लेते रहे आज आसमान साफ़ था। कैलाश पर्वत की साफ़ दर्शन हो रहे थे, वापस आ कर कपडे निकाल कर मानसरोवर स्नान को निकाल गए। आज मानस के तट पर हवन पूजन का कार्यक्रम था, सुबह से ही तैयारी चल रही थी, फूड कमेटी के सौजन्य से आज सूजी और सूखे मेवे का हलवा प्रसाद स्वरूप बांटने का भी प्लान था, गुजरात से आई सुश्री कलाबेन, मेरी पत्नी मीना और केरल से आए केटरिंग व्यवसायी चंद्रन सब जुटे थे हलवा बनाने में।
प्रातः 10 बजे सब पवित्र झील के पास बने हवन कुंड के पास पहुँच गए, बंगाल से आए दुर्गादास जी और उनकी पत्नी सुश्री रेखा गोस्वामी ने पुरोहित की भूमिका अता की खूब भक्ति भाव और विधि विधान से पूजन अर्चन और हवन किया गया सभी लोगो ने मिलकर मानसरोवर और कैलाश की समक्ष आहुतिया दी और प्रसाद ग्रहण किया।
भोजन के पश्चात आधे घंटे आराम करके हम पास में ही बनी मोनेस्ट्री में चले गए। बाहर से बिलकुल साधारण सी लगने वाली लकड़ी से निर्मित दुमंजिला मोनेस्ट्री अंदर से बहुत भव्य थी। सामने ध्यान-कक्ष में स्वर्ण-मूर्तियाँ विराजित थीं। एक दीपक जल रहा था। विलक्षण शांति पसरी हुई थी। कुछ देर आँखें बंद करके मन एकाग्र किया और ध्यान लगाया। बाहर आकर दूसरी मंजिल पर गए जहाँ लामा लोगों का निवास स्थान था।
एक बार फिर हम मानस के तट घूमने चले गए। मानसरोवर के किनारे किनारे बड़ी दूर तक टहलते हम मानस में बिखरे गोलाकार पत्थरों में ’ऊँ’ लिखे पत्थर ढूंढने लग गए कुछ ॐ लिखे पत्थर हमें मिले तो पर हम जो जहां की वस्तु है वहीं की रहे सोच वही जल मे प्रवाहित कर दिये फिर हम वही पत्थरों पर बैठकर मानस के रुप को निहारते रहे। सूर्य की किरणें और मानस की लहरें क्रीड़ा करते हुए सुंदर दृश्यावलि प्र्स्त्तुत कर रहीं थीं। हम उन्हें देखने में खो गए। कई यात्री मानस में जल भरने जा रहे थे। हम ने भी बोतलों में घर के लिए मानस का पवित्र जल भरा।
ऐसे ही इतनी सुन्दर, पवित्र झील ‘चंद्रताल’ हमने अपनी स्पीति वैली के बाइक ट्रिप के दौरान हिमाचल प्रदेश में देखी है। एक बात और इतनी बड़ी झील और गंदगी का नामोनिशान नहीं। कम से कम इस मामले में तो चीन सरकार तारीफ़ की पात्र है। मेरे ख्याल में यही पवित्र झील अगर भारत में होती तो पहले धर्म के नाम पर इस के चारों तरफ दुकानें खुल जाती फिर गंदगी तो अपने आप आ जाती।
रात्री भोजन से पहिले एक बार फिर गानों/भजनों की महफिल चली और चूंकि कल प्रस्थान था, भोजन उपरांत हम पेकिंग आदि मे जुट गए, मानस के जल की भरी केन और बोतलों के ढक्कन साथ लाई एमसील और टेप से अच्छे तरह से पैक करी और फिर एक शानदार और परिपूर्ण दिन की समाप्ति के लिए ईश्वर को धन्यवाद दे नींद के आगोश मे समा गए।
अठारहवाँ दिन - मानसरोवर कुगु से तकलाकोट
65 कि.मी. बस से
सुबह पांच बजे उठकर दैनिकचर्या से निपटकर नाश्ता किया और मानस दर्शन किये। मानस का अलौकिक दिव्य स्वरुप ही सचमुच इसे देव-सरोवर! बनाता है। "ओम नमः शिवाय" के उद्घोष के साथ 6 बजे हमारी बस चल पड़ी। यात्रियों ने विदाई-भाव के साथ शिव-धाम कैलाश और देव-सरोवर मानस को नमन किया और ’हर-हर महादेव’ के जयकारे लगाए। सभी कैलाश से विदा लेते में भावुक थे क्योंकि आगे धीरे-धीरे कैलाश के दर्शन छिप जाते हैं। यही बाबा भोले के धाम के अंतिम दर्शन थे। हमारी बस मानस के किनारे-किनारे बने रास्ते पर जा रही थी। हम मानस के विशाल रुप को देखकर मुग्ध हो रहे थे। हमारी बस मानस को पीछे छोड़कर आगे दौड़ रही थी। थोड़ी देर में मानस दर्शन कम हो गए और राक्षस-ताल दिखेंने लगा। हमारी बस ऐसे जगह रुकी जहा से मानस ताल, राक्षस-ताल दाये और बाये थे। यहाँ से एक ओर कैलाश पर्वत तो दूसरी ओर तो गुरला मन्धाता के दर्शन होते हैं
गुरला मन्धाता तिब्बत की सबसे ऊंची चोटी है मन्धाता प्राचीन भारत में सुर्य राजवंश का एक राजा था जिसने कथानुसार इन्द्र को परास्त करके अमरावती पर विजय की थी।[2] इस विजय को यादगार बनाने के लिये मानसरोवर के किनारे खड़े इस पर्वत का नाम 'मन्धाता' रखा गया। 'गुरला' यहाँ पास में स्थित एक पहाड़ी दर्रे का नाम था जो पर्वत के नाम के साथ जुड़ गया। यहाँ थोड़ी देर रुक फोटोग्राफी की और फिर चल पड़े ज़ोरावर सिंह की समाधि की ओर
लगभग 2 घंटे चलने के बाद आसपास हमारी बस सड़क के बायीं ओर साइड में जाकर खड़ी हो गयी। गुरु ने सभी से नीचे उतरने को कहा। लगभग सौ मीटर अंदर जंगल में गए। वहाँ छोटे-छोटे पत्थरों को चुनकर लाल रंग से पुता हुआ एक मंच/चबूतरा सा बना हुआ था। जिस पर मठ की भांति तिब्बती-परंपरा की तरह कपड़ों की झंडियाँ बांधी हुयी थीं।
हम सभी वहाँ एकत्र हो गए। तब गुरु ने बताया कि वह ’तोय’ गांव है और वह चबूतरा भारत के वीर बलिदानी सेना-नायक ज़ोरावरसिंह की समाधि है। वीर ज़ोरावर सिंह लद्दाख को भारत का अभिन्न हिस्सा बनाने के अभियान का हीरो था। स्थानीय भाषा में उसे सिंगलाका चौतरा कहा जाता है। गुरु के अनुसार स्थानीय लोगों में उस समाधि की बड़ी मान्यता है। वहाँ समाधि पर आने से उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। हम सभी ने सच्चे मन से उस सैनानी को अपनी विनम्र श्रद्धांजली अर्पित की।
ज़ोरावर सिंह की याद को मन में संजोय हम बस में बैठकर पुनः तकलाकोट की ओर बढ़ गए। हमारी बस तकलाकोट को पार कर खोजरनाथ के रास्ते पर चल पड़ी खोजरनाथ एक प्राचीन हिन्दु मंदिर है। खोजरनाथ तकलाकोट से लगभग 20 कि.मी. दूर है।
मंदिर में आदम कद से भी बड़ी तीन मूर्तियाँ थी, जिनको गुरु ने राम, लक्षमण और सीता बताया। बीच में राम बाएं सीता तो दांए लक्षमण। इन मूर्तियों की बनावट बुद्ध मूर्तियों की तरह ही है। हालांकि बाहर बोर्ड पर उसे खोरचग मोनेस्ट्री ही लिखा है। इस की स्थापना 996 ई. में रिनचेन सांगपो द्वारा की गई थी। मंदिर के बीचो बीच घी के बड़े-बड़े दीपक जल रहे थे। यात्रियों को भी दीपक खरीदकर आरती करने की सुविधा थी। हम सब ने भी दीपक जलाए। मंदिर में युवान के साथ-साथ रुपया भी लिया जा रहा था। मंदिर में अंदर मूर्तियों के सिंहासन के चारों ओर अति संकीर्ण परिक्रमा-मार्ग था। जिसमें बिलकुल गुपागुप्प अंधेरा था। पहले तो डर लगा फिर चले गए और परिक्रमा करके बाहर आ गए। मंदिर के दायीं ओर एक कक्ष में भगवान बुद्ध की ध्यानस्थ-मुद्रा में मूर्ति विराजित थी। हमसब ने वहाँ भी मस्तक झुकाकर नमस्कार किया और मंदिर का पुस्तकालय देखा और बाहर आगए। मठ के परिक्रमा स्थल में प्रार्थना चक्र लगे थे। जिन पर तिब्बती भाषा में मंत्र लिखे हुए थे। बौद्ध श्रद्धालु परिक्रमा करते समय उन्हें घूमते जा रहे थे। उनके लिए वे बौद्ध भगवान थे हमारे लिए वे राम सीता लक्ष्मण थे ।
बाहर मैन गेट के पास ही मंदिर के प्रबंधक की ओर से हम सब यात्रियों को याक के दूध की चाय पिलायी गयी। वहीं एक छोटी सी कोठरी में मंदिर और कैलाश-मानसरोवर के पोस्टर और चित्रों के अतिरिक्त पूजा की अन्य सामग्री भी बिक रही थी। कुछ सहयात्री खरीददारी कर रहे थे, कुछ बाहर बस के पास आगए थे। मठ के चारों ओर पक्की सड़कें, मकान थे। जिन पर चीन के झंडे लहरा रहे थे।
करीब 1 घंटा खोजरनाथ में बिताने के बाद हम तकलाकोट के लिए रवाना हो गए। सभी यात्री तिब्बत के पठारों के प्राकृतिक नज़रो को कैमरे में कैद करने में लगे थे। जल्दी ही हम तकलाकोट पहुंच गए अपने कमरो में जा कर स्नान किये और लंच किये फिर शॉपिंग करने निकल गए क्योंकि हमें अपने लगेज वापस पैक कर के कस्टम क्लेरेंस के लिए जमा कर देना था।
शाम को हम नेपाली बाज़ार में टहलने निकले, छोटी मोटी ख़रीदारी की, यहाँ एक नेपाली और भारतीय मार्केट भी है, इस मार्केट के अंदर एक नेपाली द्वारा संचालित ढाबे में लजीज भारतीय व्यंजन, बीयर आदि मिल जाती है यहाँ हमने अपने दल के किशोर कुमार श्री रवि मल्होत्रा के साथ हमप्याला हमनिवाला हो कई मधुर नगमे सुने, जिसका आनंद उठा, पास बैठे स्थानीय लोग, भाषा न समझते हुए भी झूम रहे थे। एक आनंददायी शाम।
चूंकि हमारा दल इस साल का आखरी दल था, चीनी अधिकारिय ने अंतिम दल के सम्मान में, एक स्नेह सम्मेलन आयोजित किया था प्रत्येक यात्री का परम्परागत सफ़ेद मलमल का दुशाला पहनाकर स्वागत किया गया, एक पार्टिंग गिफ्ट भी दिया गया। दुभाषिए की मदद से विचारों का आदान प्रदान हुआ। आज दल की एक साथी श्रीमति मौसमी का जन्मदिन भी इसी पार्टी में मनाया गया, साथियों का प्यार भरा उत्सव देख, श्रीमति मौसमी भावुक हुए बिना न रह सकी, कल सुबह वापसी के लिए प्रस्थान का दिन था।
बीसवाँ दिन ----तकलाकोट से गुंजी
कुल रास्ता 15 कि.मी बस से + 26 कि.मी. पैदल
आज हमें अपने देश, अपनी धरती पर वापस जाना था। भारतीय समय के अनुसार हम 4.00 बजे उठ गए, दैनिक नित्य कर्म से निवृत और स्नान कर हम 5 बजे अपने कमरो की चाबियाँ जमा कर तैयार थे।
गेस्ट हाउस वाली सड़क पर ही कस्टम ऑफिस में चीनी आब्रजन अधिकारीयों ने प्रत्येक यात्री की जाँच की। पासपोर्ट पर लगी फोटो से उनका मिलान किया, पासपोर्ट जरूरी प्रवष्टि की । इस के बाद हमारी बस भारत-चीन बॉर्डर लिपु पास की तरफ चल पडी। बस सुनसान पहाड़ी क्षेत्र में चली जा रही थी, धीरे-धीरे पौ फटने लगी आकाश में दिन निकलने से पहले का प्रकाश छाने लगा।
बिलकुल बार्डर तक एक बहुत ही अच्छी पक्की सड़क पर बस एक एयरपोर्ट सरीखे प्लैटफ़ार्म पर जाकर रुकी, यहाँ पर सभी यात्रियों के हाथ की बैग, केमेरा, फोन की जांच कर यात्रियों को आगे जाने की अनुमति दी गई, सभी यात्रियों को अपने बैग खुद ही उठाने थे, इस लिए सभी यात्री धीरे धीरे चल रहे थे। ऑक्सीजन भी बहुत कम थी। कई यात्री तो बहुत ही धीरे धीरे चल रहे थे। लिपुलेख दर्रे के आखिरी 50 मीटर की चढाई एकदम सीधी थी।
हम लिपलेख बॉर्डर के पास पहुंचे, तभी हमारे पोर्टर चीनी सीमा के 30 -40 मीटर सीमा के अंदर आ कर अपने अपने यात्रियों को ढूंढ रहे थे। लिपु बॉर्डर पर पहुँच कर हम अपनी देश की सीमा में प्रवेश कर गए। हमारे सिपाही हमारे स्वागत के लिए खड़े थे। हाथ पकड़कर सभी को बुला रहे थे। वह पल हमारे लिए गर्व के पल थे। हम अपने देश में लिपुलेख दर्रे पर खड़े थे। बॉर्डर पर ठंड बहुत थी। वहीँ पर सभी यात्री अपने अपने पोनी पोर्टर को ढूंढ रहे थे।
जहाँ चीन साइड गिर जाने पर कोई उठाने वाला नहीं था। वही अपनी साइड सहारा देने वाले कई हाथ थे। एक बात और जहाँ बॉर्डर के उस साइड (चीन) के आधे किलोमीटर तक चीन की सैनिक चौंकी और सड़क मोटर मार्ग था, वही हमारी तरफ 9 कि.मी. के बाद सैनिक चौंकी और 18 कि.मी. के बाद सड़क मोटर मार्ग था।
थोड़े समय के विश्राम और पोर्टरों, घोड़ेवालों सेना क जवानों से मेलमिलाप के बाद हम नवींढांग की तरफ पैदल चल पड़े । रास्ता उतराई का था सिपाहियों के ग्रुप भी यात्रियों के साथ-साथ चल रहे थे। हम सकुशल यात्रा पूरी करके स्वदेश वापिसी के सुखद भाव में भरे प्रकृति के सुंदर बिछावन को देखकर मोहित हो रहे थे जिन्हें जाते समय अंधेरा होने के कारण देख भी न सके थे। क्या दृश्य थे! उन्हें देखकर लग रहा था कि वह कोई विशाल पोस्टर है। हम सुंदर दृश्यों को कैमरे में उतारते, गाते गुनाते चारों ओर देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। जहाँ तिब्बत का पूरा पठार पूरी तरह वनस्पति विहीन और बंजर था। वही अब भारतीय सीमा में हिमालय के शिखरों का सोंदर्ये प्रगट हो गया था। लिपुलेख दर्रे से उतरते ही रास्ते के किनारे छोटी घास और झाड़ियाँ मिलने लगी थी।
हम 9.30 बजे सुबह नवीढ़ांग कैम्प पहुंच गया वहां हम ने गरम गरम पराठे आचार का नाश्ता किया। एक बार फिर ॐ पर्वत का जी भर दर्शन किया, फोटो खींचे और एक घंटा रुकने के बाद हम ने काला पानी के लिए प्रस्थान किया। नदी किनारे दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और घाटी में कहीं-कहीं पहाड़ों के ढलान पर रंगबिरंगे छोटे-छोटे फूल भी खिल रहे थे। निरंतर चलते हुए हम 1.30 बजे हम काला पानी पहुंच गये और जी भर बुरांश का शरबत पिया। दोपहर के भोजन और थोड़े विश्राम के बाद हम इमिग्रेशन क्लेरेंस करा कर, काली माता के चरणो में अब तक की निर्विघ्न यात्रा एवं दर्शनों के लिए धन्यवाद किया एवं आगे के जीवन के आशीर्वाद की कामना लिए मंदिर में प्रवेश किये।
थोड़ी देर बाद हम गुंजी के लिए निकल पड़े। लेकिन यहाँ से चलते मौसम खराब होना चालू हो गया, हल्की बूँदाबाँदी होने लगी। हमारे दल के एक साथी घोड़े से गिर गए, उन्हें कमर मे काफी अंदरूनी चोट लगी, आईटीबीटी वाले उन्हे वाहन में बैठा के आगे निकल गए। हम बारिश का आनंद लेते धीरे कदम बढ़ाते चलते रहे। कालापानी से गूंजी तक मार्ग अच्छा है। आज की यात्रा काफी लम्बी और थकाने वाले थी। 4 बजे के करीब हम ने गुंजी में प्रवेश किया। आज कुल 26 कि.म. चले थे। हम गुंजी कैंप जाते समय हम ने आई टी बी पी कैंप में माता मंदिर में यात्रा पूर्ण होने के लिए धन्यवाद देते दर्शन किये और अपने कैंप में पहुंचे।
पहुँचते ही चाय आ गयी फिर थोड़ा आराम किया पर देखते देखते मौसम खराब हो चुका था और कल हमरी आगे की यात्रा पर संशय के बादल मंडराने लगे। क्योंकि यहाँ से धरचूला के रास्ते टूटे थे उस बरस भारी बारिश के कारण यहाँ से वापसी सेना के हेलीकाप्टर से होनी थी, और इसकी उड़ान पूरी तरह से मौसम मे पर निर्भर थी। प्रत्येक शाम केएमवीएन के कर्मठ कर्मचारी आपकी हट में गरमागरम सूप सर्व करते हैं। शाम ढलते ही ठंड ने अपना प्रभाव जमाना शुरू कर दिया, दल के सभी लोग अलग समूहों में बंट कुदरत दिये इस आराम के मौके का आनंद उठा रहे थे, कुछ समूह अपने हट्स में तो कुछ bonfire करके किचन के सामने बने कनोपी में बैठ गीत संगीत का आनंद उठा रहे थे। बाद में सभी यात्री आनन्दपूर्वक भोजन किए एवं वापस आकर सो गए।
इक्कीसवाँ, बीसवाँ और तेवीसवां दिन गूंजी केएमवीएन और आईटीबीटी की मेहमानी में
अगली सुबह उठे तो मौसम वैसे ही बना हुआ था, चारों तरफ घने बादल, अन्नपूर्ण की चोटी भी घने बादलों से ढकी थी। ऐसे में हेलीकाप्टर का उड़ना संभव नहीं था और पैदल मार्ग तो पहले से टूटा था धरचूला और गूंजी की बीच। इस तरह एक एक अरे तीन दिन बीत गए, पर इन तीन में पूरे दल ने भरपूर मज़ा लूटा आसपास के खूबसूरती का। लगभग हर दिन वहाँ की एक स्थानीय टपरी पर सामोसा पार्टियां हुई यह टपरी एक लड़की चलाती थी और यात्री दलों के बीच मिस गूंजी के नाम से मशहूर थी। इन तीन दिनों में केएमवीएन के कर्मियों का धैर्य भी तारीफ के काबिल था, उनकी सेवा अथक थी। तीनों दिन वहाँ स्थित मंदिर में रोज शाम भजनों की गंगा भी बहती।
एक दिन हम पास ही स्थित नपलचू गाँव में गए यहाँ की जलेबी की दुकान भी यात्रियों में काफी लोकप्रिय है, यहाँ रस भरी जलेबियाँ खा जब ऊपर ढलान पर स्थित गाँव में गए तो वहाँ नक्काशीदार लकड़ी के दरवाजे देखकर आवाक रह गए, थोड़ा और ऊपर चढ़े तो कुटू की फसल लहलहा रही थी, इसकी फसल के रंग का संयोजन कमाल का दृश्य उत्पन्न कर रहे थे,ऐसा लगता था फूलों की घाटी में आ गए हों। यह तीन दिन जिंदगीभर की लिए यादगार बन गए, चूंकि आज सुबह मौसम कुछ साफ था तो हुमसे पहले आए दल को आज हेलिकॉप्टर से आगे भेज दिया गया और कल शायद हमारा भी नंबर आएगा, और चूंकि ये हमारा आखरी दिन था यहाँ पर तो आईटीबीपी के द्वारा आज यात्रियों के वापस आने की खुशी एवं स्वागत हेतु हमारे दल के सम्मान और विदाई स्वरूप एक शानदार दावत का आयोजन किया सेना की भाषा में इसे ‘बड़ा खाना’ कहा जाता है, आईटीबीटी के सभा कक्ष में karoke के साथ खूब धमा चौकड़ी हुई, हमारे एक सहयात्री श्री चंद्रन का जन्मदिन भी था, ITBP के जवानो ने सीमित साधनो की बावजूद एक हलवा केक बनाया था। इस यात्रा में भारत की साइड वाले भाग में ITBP के रोल की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है। हमारे धमाल की एक बानगी इन विडियोस में देखें
चौबीसवाँ दिन गूंजी से पिथौरागढ़ और फिर जागेश्वर
आखिर तीन दिन के इंतज़ार बाद आज मौसम साफ था और हम नहा धो सुबह सुबह तैयार हो हेलिपेड पहुँच गए और लगभग नौ बजे एक यात्री और उसके सामान का वजन ले हेलीकाप्टर में जाने दिया जा रहा था, चूंकि हमारा दल इस वर्ष का आखिरी दल था तो केएमवीएन के कर्मी भी सारे कैंप को समेट कर हमारे साथ हेलीकाप्टर में सवार थे और 10 बजे पिथौरागढ़ एयरपोर्ट पर पहुँच गए और एक रोमांचक और आध्यत्मिक यात्रा का अंत हुआ। केएमवीएन के गेस्ट हाउस में शानदार स्वागत हुआ, प्रेस यात्रियों के विचार, अनुभव जानने के लिए उपस्थित थी। यात्री अपने सामान जो यहाँ छोड़ गए थे, समेट रहे थे और नहा धो तैयार हो दोपहर के भोजन हेतु इकठे हो गए, और भोजन उपरांत बस में सवार हो गए अपने अगले पड़ाव जागेश्वर के लिए। रास्ते भर अंताक्षरी, भजन चुटकुलों के दौर चलते रहे। जागेश्वर से कुछ किलोमीटर पूर्व हमें यहाँ के पत्थरों के मंदिरों की झलक प्राप्त होने लगी थी। पहाड़ व रास्ते के बीच बहती एक छोटी नदी के उस पार, पहाड़ों की तरफ, मंदिरों का एक छोटा समूह खड़ा था। करीब एक किलोमीटर की दूरी और तय करते ही हम एक घाटी में पहुंचे जहां ऊंचे और गहरे हरे रंग के देवदार वृक्षों के घने जंगल थे और हमने स्वयं को ऊँचे घने पेड़ों से घिरे पाया। रास्ते के एक तरफ कुमाऊं मंडल विकास निगम का यात्री निवास था व दूसरी तरफ जागेश्वर मंदिर समूह। लगभग 7 बजे शाम हम जागेश्वर पहुँच गए, आज रात यहाँ विश्राम था और कल सुबह जागेश्वर महादेव के दर्शन कर दिल्ली की और प्रस्थान करना था। हम नहा धो भोजन कर चाँदनी रात में जगेश्वर मंदिर समूह परिसर तक टहल कर आए, छोटा सा कस्बा था रात के नीरव में पास बहती जटागंगा नदी की आवाज स्पष्ट रूप से आ रही थी, कुछ दूर तक घूम हम वापिस चल दिये और अपने अपने कमरों में विश्राम के लिए चले गए क्योंकि कल एक थकाऊ बस यात्रा थी दिल्ली तक।
पच्चीसवाँ दिन जागेश्वर से दिल्ली
मंदिर सुबह चार बजे ही खुल जाता है जैसा कि तय था, हम अल सुबह 4 बजे ही मंदिर दर्शन को पहुँच गए और दर्शन हेतु केवल हमारे दल के ही कुछ सदस्य थे, हम सब को विशेष पुजा और आरती में भाग लेने का अवसर मिला। जागेश्वर धाम भगवान सदाशिव के 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है। कहा जाता है कि यह प्रथम मंदिर है जहां लिंग के रूप में शिवपूजन की परंपरा सर्वप्रथम आरंभ हुई। जागेश्वर को उत्तराखंड का पांचवां धाम भी कहा जाता है। जागेश्वर धाम को भगवान शिव की तपस्थली माना जाता है। यह ज्योतिर्लिंग आठवां ज्योतिर्लिंग माना जाता है। इसे योगेश्वर नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर शिवलिंग पूजा के आरंभ का गवाह माना जाता है।
पुराणों के अनुसार भगवान शिव एवं सप्तऋषियों ने यहां तपस्या की। कहा जाता है कि प्राचीन समय में जागेश्वर मंदिर में मांगी गई मन्नतें उसी रूप में स्वीकार हो जाती थीं, जिसका भारी दुरुपयोग होने लगा। आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य यहां आए और उन्होंने इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। अब यहां सिर्फ यज्ञ एवं अनुष्ठान से मंगलकारी मनोकामनाएं ही पूरी हो सकती हैं। यह भी मान्यता है कि भगवान श्रीराम के पुत्र लव-कुश ने यहां यज्ञ आयोजित किया था, जिसके लिए उन्होंने देवताओं को आमंत्रित किया। कहा जाता है कि उन्होंने ही सर्वप्रथम इन मंदिरों की स्थापना की थी। जागेश्वर में लगभग 250 छोटे-बड़े मंदिर हैं। जागेश्वर मंदिर परिसर में 125 मंदिरों का समूह है। मंदिरों का निर्माण पत्थरों की बड़ी-बड़ी शिलाओं से किया गया है।

दर्शन उपरांत बाकी सब तो वापिस होटल की और चल दिये मैं अकेला ही मॉर्निंग वॉक के लिए निकल गया मैं नदी की धारा के साथ चलता जा रहा था, जागेश्वर मंदिर समूह, नदी किनारे ऊंचे मोटे देवदार वृक्षों के बीच एक छोटे घोंसले की तरह लग रहा था।
जागेश्वर मंदिर परिसर की ओर मुख रखे कुछ घर पहाड़ी पर बिखरे हुए थे। हर घर के द्वार व खिड़कियों की चौखट पर बारीक नक्काशियां कीं हुईं थीं। मंदिर के सम्मुख स्थित गली में एक छोटा बाज़ार था। इनके अलावा वहां और कुछ नहीं था। एक संकरी घाटी में ही आपको सम्पूर्ण नगर के दर्शन हो जाते हैं- कुछ १३० मंदिर, एक गाँव, उसका बाज़ार , एक नदी और एक सुन्दर सा जंगल। सब एक चित्र की चौखट में समाये से नजर आते हैं। मन ही मन उस नज़ारे की कल्पना उभरने लगी, जो बर्फ की एक परत में ढंकने के पश्चात यहाँ दिखाई पड़ती होगी। बहुत ही मनोरम दृश्य देखने को मिल रहे थे मन लौटने को नहीं हो रहा था परंतु हमे नाश्ते के बाद तुरंत दिल्ली के लिए प्रस्थान करना था सो मन मसोस वापिस चल दिया। नाश्ते उपरांत हम बस में बैठ चल दिए दिल्ली की ओर। लगभग 35 किलोमीटर चलने के बाद हम गोलु देवता के मंदिर पर पुनः कुछ देर रुके दर्शन कर गरम गरम पकोड़े चाय भकोसे, फिर अल्मोड़ा में कुछ देर रुक यहाँ की प्रसिद्ध बल मिठाई की जमकर ख़रीदारी हुई। हमारी एक साथी सुश्री मृणालनी अल्मोड़े की हीं थी सो उन्होने यहीं से रुखसती ली।
दोपहर होते होते हम काठगोदाम पहुंचे वहाँ हमारे दल का समारोह पूर्वक स्वागत हुआ, प्रेस कवरेज भी जबरदस्त था, हमें कई momento दिये गए, जो आज भी हमारे घर की शोभा बढ़ा रहे हैं। भोजन उपरांत हम फिर आगे चल दिये दिल्ली की ओर। दिली पहुँचने से पहिले गाजियाबाद के पास होटल स्कायलार्क में दिल्ली के समाजसेवी श्री गुलशन द्वारा यात्रियों के लिए स्वागत और हाइ टी की वयवस्था की थी, गुलशनजी की सेवा भावना से सब अभिभूत थे, सब यात्रियों के दल का एक ग्रुप फोटो, कैलाश के बैक्ग्राउण्ड के साथ सभी यात्रियों को दिया गया। यात्रा प्रारम्भ करने से पहिले भी यात्रा में लगने वाली छोटी जरूरत के सामान की किट उनके संगठन जय भोले परिवार द्वारा यात्रियों को निशुल्क दी गई थी, इसमें शामिल सामान की कोइ कल्पना भी नहीं कर सकता की ये कितने जरूरी हो सकती है, ये किट उनके यात्रा अनुभवो के आधार पर तैयार की गयी थी। हैट्स ऑफ टु गुलशन जी
लगभा नौ बजे हम गुजराती समाज भवन पहुँच गए, खाना खाकर अपने अपने बँक बेड पर सब बेसुध होकर पड़ रहे, दिन भर की बस यात्रा से थके होने के कारण।
छबीसवाँ दिन दिल्ली गुजराती समाज भवन
आज विछोह का दिन था, सभी यात्री एक एक कर अपने अपने गृह नगर को प्रस्थान कर रहे थे। दिन भर भावुक विछोह के पल आते रहे, क्योंकि हर यात्री के अपने समय और यात्रा साधन के अनुसार निकाल रहे थे, कुछ आरक्षण न मिलने के कारण अभी भी एक आध दिन यहीं बिताने को मज़बूर थे। केएमवीएन की टीम भी वहाँ उपस्थित थी उनके द्वारा एक यात्रा प्रमाण पत्र जारी किया जो की यात्री अपने अपने राज्य द्वारा प्राप्त होने वाली सब्सिडि की लिए उपयोग कर सकते थे। केएमवीएन दल को केंद्र सरकार दी जाने वाली सहायता के लिए अपने अपने खाते के विवरण दे दिये गए थे। हम भी हसीन यादों को समेटे रात्री की ट्रेन से भोपाल के लिए निकल गए।
सभी यात्रियों का एक WhatsApp ग्रुप बना दिया गया था, जिससे हम आज भी सक्रिय रूप से जुड़े हुए है एक वृहुद परिवार की तरह जुड़े हुए हैं।
इति श्री, पाठकों आप सुधि जन किसी भी सहायता या जानकारी हेतु हमसे संपर्क कर सकते हैं। आपको यह जानकारी ब्लॉग कैसा लगा अपने विचार प्रकट कर प्रोत्साहित करेंगे तो आभारी रहेंगे, कोई सुझाव हों तो स्वागत है ।
वर्ष 2010 में अखबार में कैलाश मानसरोवर की यात्रा हेतु विदेश मंत्रालय का विज्ञापन अखबार में देखा तो मन ने जागती आँखों से कैलाश मानसरोवर की यात्रा का सपना देखा और जब विज्ञापन अंत तक पढ़ा तो मालूम पड़ा की पवित्र सरोवर तो चीन के स्वायत क्षेत्र तिब्बत मे है और इसके लिए पासपोर्ट आवश्यक होगा तो सपने को पूरा करने के पहले कदम के तौर पूरे परिवार का पासपोर्ट बनवा लिया, और अगर पासपोर्ट बना होता तो उसी वर्ष चल देते कैलाश को लेकिन कहते है न ऐसी यात्राओं का बुलावा आता है तो ही आप जा सकते हो, सो बुलावा नहीं था तो पासपोर्ट बनते बनते आवेदन तिथि निकल गयी, वर्ष के अंत आते न आते एक फार्म हाउस का प्लॉट अच्छा लगा तो लग गए एक झूले और बगीचे वाले घर का सपना पूरा करने में और ये सपना पूरा करते करते 2014 आ गया, और फिर आ गया आ गया एक और सपना छोटे बेटे को डॉक्टर बनने का सपना और ये सपना पूरा करते करते आ गया 2017 और अगस्त 2017 में बच्चा भावेश पहुँच गया देश के प्रतिष्ठित संस्थान एम्स में। लगता है शिव कैलाशों का वासी भी चाहते थे की सब ज़िम्मेदारी पूरी करो फिर मेरे दर पे आओ, 2018 की मार्च 23 थी विदेश मंत्रालय में आवेदन करने की, और देखये बुलावा आता है तो हजारों हजार आवेदनो के बीच हमारा आवेदन स्वीकृत और बाय पास सर्जरी के रिकार्ड के बावजूद भीषण मेडिकल टेस्ट पास करते हुए अंतिम पड़ाव पर कैसे पहुंचे आगे उसकी महागाथा ।
महागाथा, हाँ महागाथा ही तो है ये। कैलाश मानसरोवर पर यात्रा वृतांत करने का विचार हमेशा दिमाग में रहा 2018 से 2020 के उतरार्द्ध में पहुँच गए पर नौकरी में स्थानांतरण के चलते भोपाल बालाघाट जबलपुर के बीच झूलते और अन्य व्यस्तताओं और के चलते संभव नहीं हो रहा था। अब ईश्वर की असीम कृपा से लगता है दिनचर्या में, कुछ तो वापिस भोपाल स्थानांतरण के चलते और कुछ तो कोविद महामारी के कारण स्थायतित्व का भाव आया तो ये महागाथा लिखने बैठा। 2018 में आवेदन स्वीकृत होने के बाद से ही जो इंटरनेट से जानकारी खोजने बैठा तो यात्रा की कठिनाइयों को के बारे मे पढ़ पढ़ एक समय तो ऐसा लगा कि नहीं, लेकिन अन्ततः मन के जीते, जीत और मन के हारे हार को सच करते, मैंने बस जाने का मन बना लिया था इसलिए कि जिसने मुझे अपने निवास पे आने के लिए जिसने बुलावा भेजा है वो ही हाथ पकड़ हमें ले जाएगा, क्योंकि मेरे पास जाने के लिए कोई क्षमता या योग्यता नहीं है, यह वास्तव में वह है जो मेरे हाथों को पकड़े हुए है और मुझे साथ लेकर चलने के लिए ले जा रहा है। यह यात्रा मेरी अपेक्षा से अधिक आनंदित और मंत्रमुग्ध करने वाली थी। बहुत सारी चुनौतियां थी, लेकिन फिर भी यह तरीका है, जब आप पूरी तरह से अपने आप को दिव्य शक्तियों और कार्यप्रणाली के सामने आत्मसमर्पित कर देते हैं। बिना चुनौतियों के तीर्थयात्राएं शायद एक छाप नहीं छोड़ेंगी यदि वे बगीचे में एक नियमित सैर की तरह हों। कैलाश मानसरोवर यात्रा एक प्रकार से शून्य में यात्रा है, जहाँ आप उत्साह और उदासी की मिश्रित भावनाओं का अनुभव करते हैं। यह शिव के पवित्र निवास की यात्रा है, केवल आमंत्रण द्वारा प्रवेश।
‘कैलाश’, शाब्दिक रूप से दो शब्दों ‘काई’ और ‘लश’ से मिलके बना है। काई का अर्थ है आत्मा का अर्थ है और लश का अर्थ है ’एक नृत्य रूप’। इसलिए, एक धार्मिक और धर्मपरायण व्यक्ति के लिए, 'कैलाश' का अर्थ वास्तव में भगवान शिव का निवास होता है, जहां वह अपनी अर्धांगिनी पार्वती के साथ सदा ध्यान की स्थिति में बैठता है। शाब्दिक अर्थ अधिक सामान्य और सार्वभौमिक है, जो एक ऐसी जगह को दर्शाता है जहां आत्मा ’अंतिम आनंद की स्थिति में आनन्दित और उत्साहित लगती है।
कैलाश पर्वत एक विशालकाय पिरामिड है, जो 100 छोटे पिरामिडों का केंद्र है। कैलाश पर्वत की संरचना कम्पास के 4 दिक् बिंदुओं के समान है और एकांत स्थान पर स्थित है, जहां कोई भी बड़ा पर्वत नहीं है। कैलाश पर्वत समुद्र सतह से 22068 फुट ऊंचा है तथा हिमालय से उत्तरी क्षेत्र में तिब्बत में स्थित है। चूंकि तिब्बत चीन के अधीन है, अतः कैलाश चीन में आता है। मानसरोवर झील से घिरा होना कैलाश पर्वत की धार्मिक महत्ता को और अधिक बढ़ाता है।
यहां चारों तरफ कल्पना से भी ऊंचे बर्फीले पहाड़ हैं। जैसे कुछ पहाड़ों की ऊंचाई 3500 मीटर से भी अधिक है। कैलाश पर्वत की ऊंचाई तो लगभग 22028 फुट हैं। इस कैलाश पर्वत की 4 दिशाओं से 4 नदियों का उद्गम हुआ है- ब्रह्मपुत्र, सिन्धु, सतलज व करनाली। इन नदियों से ही गंगा, सरस्वती सहित चीन की अन्य नदियां भी निकली हैं। कैलाश की चारों दिशाओं में विभिन्न जानवरों के मुख हैं जिसमें से नदियों का उद्गम होता है। पूर्व में अश्वमुख है, पश्चिम में हाथी का मुख है, उत्तर में सिंह का मुख है, दक्षिण में मोर का मुख है।
कैलाश मानसरोवर के पास ही यमद्वार है। यहीं से होकर कैलाश स्पर्श स्थान तथा कैलाशजी की परिक्रमा शुरू करना होती है। यमद्वार से करीब 12 किमी की यात्रा प्रारंभ होती है। सुनसान रास्ते के दोनों तरफ पथरीले और बर्फ से ढंके पहाड़ दिखाई देते हैं। दोनों पहाड़ों के बीच बर्फ की नदी अपने अस्तित्व का अहसास कराती है। कैलाश की संपूर्ण परिक्रमा लगभग 50 किलोमीटर की है, जिसे यात्री प्रायः तीन दिनों में पूरा करते हैं। यह परिक्रमा कैलाश शिखर के चारों ओर के कमलाकार शिखरों के साथ होती है। कैलाश शिखर अस्पृश्य है। यात्रा मार्ग से लगभग ढाई किलोमीटर की सीधी चढ़ाई करके ही इसे स्पर्श किया जा सकता है। यह चढ़ाई पर्वतारोहण की विशिष्ट तैयारी के बिना संभव नहीं है।
मानसरोवर
मानसरोवर झील लगभग 320 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैली हुई है। इसके उत्तर में कैलाश पर्वत तथा पश्चिम में रक्षातल झील है। संस्कृत शब्द मानसरोवर, मानस तथा सरोवर को मिलकर बना है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है- मन का सरोवर। कहते हैं कि मानसरोवर वह झील है जहां माता पार्वती स्नान करती थीं और मान्यता अनुसार, वह आज भी करती हैं। वैज्ञानिक कहते हैं कि यह अभी तक रहस्य है कि ये झीलें प्राकृतिक तौर पर निर्मित हुईं या कि ऐसा इन्हें बनाया गया?
हालांकि पुराणों के अनुसार, समुद्र तल से 17 हजार फुट की उंचाई पर स्थित 300 फुट गहरे मीठे पानी की इस मानसरोवर झील की उत्पत्ति भगीरथ की तपस्या से भगवान शिव के प्रसन्न होने पर हुई थी। पुराणों के अनुसार, भगवान शंकर द्वारा प्रकट किए गए जल के वेग से जो झील बनी, कालांतर में उसी का नाम 'मानसरोवर' हुआ।
एक अन्य मान्यता के अनुसार, परमपिता परमेश्वर के आनन्द अश्रुओं को भगवान ब्रह्मा ने अपने कमण्डल में रख लिया था तथा इस भूलोक पर 'त्रियष्टकं' (तिब्बत) स्वर्ग समान स्थल पर 'मानसरोवर' की स्थापना की। शाक्त ग्रंथ के अनुसार, देवी सती का दायां हाथ इसी स्थान पर गिरा था, जिससे यह झील तैयार हुई। इसलिए यहां एक पाषाण शिला को उसका रूप मानकर पूजा जाता है। इसलिए इसे 51 शक्तिपीठों में से एक माना गया है।
मान्यता है कि कोई व्यक्ति मानसरोवर में एक बार डुबकी लगा ले, तो वह 'रुद्रलोक' पहुंच सकता है। मानसरोवर पहाड़ों से घिरी झील है, जिसे पुराणकार 'क्षीर सागर' कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि महाराज मांधाता ने मानसरोवर झील की खोज की और कई वर्षों तक इसके किनारे तपस्या की थी, जो कि इन पर्वतों की तलहटी में स्थित है।
यहां 2 सरोवर मुख्य हैं- पहला, मानसरोवर जो दुनिया की शुद्ध पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकार सूर्य के समान है। दूसरा, यहां पर लगभग 225 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र, 84 किलोमीटर परिधि तथा 150 फुट गहरी राक्षस नामक झील, जो दुनिया की खारे पानी की उच्चतम झीलों में से एक है और जिसका आकार चन्द्र के समान है। ये दोनों झीलें सौर और चन्द्र बल को प्रदर्शित करती हैं जिसका संबंध सकारात्मक और नकारात्मक ऊर्जा से है। जब दक्षिण से देखते हैं तो एक स्वस्तिक चिह्न वास्तव में देखा जा सकता है। इन दो सरोवरों के उत्तर में कैलाश पर्वत है। इसके दक्षिण में गुरला पर्वतमाला और गुरला शिखर है। मानसरोवर के कारण कुमाऊं की धरती पुराणों में उत्तराखंड के नाम से जानी जाती हैं।
यदि यात्रा पर जाना चाहते हैं तो क्या करें?
चीन और नेपाल से तनातनी के वर्तमान परिदृश्य में यात्रा पे जाना संभव है की नहीं ये तो भविष्य ही तय करेगा, हम तो भगवान शिव के चरणों में ये ही प्रार्थना कर सकते है के हे मृतञ्जय भारत को इतनी शक्ति दो कि 1962 के पूर्व कि स्थिति बहाल हो जाए और चीन के नापाक कदम इसकी धरती से हट जाएँ। आज हमें अपनी ही भूमि पर जाने के लिए कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए वीजा लेना पड़ता है दुष्ट चीन से|
पर हम तो अपनी यात्रा का संस्मरण लिखने बैठे है तो 1981 से 2019 ये यात्रा कैसे होती थी, के बारे में स्पष्ट करते है यह यात्रा, सिक्किम और नेपाल के काठमांडू से प्रारभ होती है। इसमें सिक्किम के नाथुरा दर्रा से जाना सबसे सुरक्षित है। यदि आप उत्तराखंड से कैलाश मानसरोवर जा रहे हैं तो आपको 75 किलोमीटर पैदल मार्ग पर चलने और पहाड़ियों पर चढ़ने के लिए तैयार रहना होगा। इसके लिए जरूरी है कि आपका शरीर मजबूत और हर तरह के वातावरण और थकान को सहन करने वाला हो। यदि नाथुरा दर्रा से यात्रा करते हैं तो 10-15 किलोमीटर तक ही पैदल चलना होगा। नेपाल के रास्ते होने वाली यात्रा प्राइवेट टूर संचालकों के हाथ में होता है पर उनका भरोसा करना जरा मुश्किल होता है, 2018 में मौसम खराब होने पर अपने यात्रियों को जहां तहां छोड़ भागने वाले प्राइवेट operators ही थे। कितनों ने अपने जान गंवाई, भारत सरकार ने बचाव कार्य किए तो स्थिति सुधरी। और हमने चुनोतियों को स्वीकार करते उतराखंड वाला रास्ता चुना। इस रास्ते के लिए पिछले वर्ष तक भारत और चीन के विदेश मंत्रालयों के संयुक्त रूप से इस यात्रा को आयोजित करते थे। भारत की तरफ सीमा के इस पार का संचालन कुमाऊं मण्डल विकास निगम द्वारा किया जाता है, जबकि तिब्बती क्षेत्र में चीन की पर्यटक एजेंसी इस यात्रा की व्यवस्था करती है। उतराखंड वाला रूट मेप इस प्रकार है
जबकि सिक्किम नाथुला दर्रे का रूट इस प्रकार है
भारत के विदेश मंत्रालय द्वारा आयोजित वार्षिक रूप से आयोजित यात्रा में लगने वाले सांकेतिक खर्चे का विविरण इस प्रकार है
Route
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Mode of Journey
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Tentative Cost
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Number of Days
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Via Lipulekh Pass (Uttarakhand)
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Trekking / Road Journey
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Rs. 1.8 lakh per person
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24 Days
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Via Nathu La Pass (Sikkim)
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Air / Road Journey
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Rs. 2.5 lakh per person
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21 Days
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सरकार प्रायोजित यात्रा – एक सही कदम
भले ही लिपुलेख दर्रा मार्ग से जाने में शामिल जोखिम बहुत अधिक और अक्सर अज्ञात हैं, पर तीर्थयात्रियों की सुविधा और सुरक्षा एक प्रमुख कारक है, जो एक विवेकी तीर्थयात्री को सरकार समर्थित कैलाश मानसरोवर यात्रा के लिए आकर्षित करती है। यात्रा के प्रत्येक बैच का नेतृत्व एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी द्वारा किया जाता है जो यात्रा के दौरान बैच के समग्र कल्याण के लिए जिम्मेदार होता है। इसके अलावा, यात्रियों के प्रत्येक जत्थे में एक मेडिकल टीम, केएमवीएन गाइड, एक पुलिस गाइड और एक एसडीआरएफ / आईटीबीपी रेस्क्यू टीम साथ होती है, जो यात्रियों की लिपुलेख दर्रे तक सुविधा, आराम और सुरक्षा सुनिश्चित करती है। सीमा पार करने के बाद, चीन के तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में, चीनी टीम इस जत्थे का प्रभार ले लेती है और संपर्क अधिकारी, विदेश मंत्रालय के साथ संचार के चैनल को खुला रखता है और अधिकारियों को यात्रा के सभी विकास और प्रगति के बारे मे अवगत रखता है। यात्रा के लिए निकलने से पहले यत्रियों का नई दिल्ली में चिकित्सकीय परीक्षण किया जाता है और गुंजी (ऊंचाई 10500 फीट या 3200 मीटर) पर फिर एक बार चिकित्सा समीक्षा की जाती है और केवल उन यात्रियों को, जिन्हें आगे बढ़ने के लिए फिट पाया जाता है, उन्हें वहाँ रुकने और विश्राम करने की अनुमति दी जाती है और बाकी फिट न पाये जाने वाले यात्रीयौ को नई दिल्ली वापस भेज दिया जाता है। चूंकि यह यात्रा भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के तत्वावधान में, चीनी सरकार के साथ एक द्विपक्षीय समझौते के तहत आयोजित की जाती है, इसलिए यात्रियों को मौसम की स्थिति खराब होने या यात्रा मार्ग के टूटने के कारण किसी भी स्तर पर यात्रा बाधित होने की स्थिति में भारतीय सीमा मे एयरलिफ्ट सहित सभी प्रकार के उपस्कर, चिकित्सा और शारीरिक सहायता का आश्वासन दिया जाता है।
सभी यात्रा पड़ावों पर स्नो हट में आरामदायक आवास व्यवस्था
उच्चीकरण(Acclimatization):
बहुत ऊंचाई वाले क्षेत्र में, धीरे-धीरे और लगातार ऊंचाई हासिल करना बहुत महत्वपूर्ण है। बहुत तेजी से और बिना अलग-अलग ऊंचाई पर उचित आराम करने के कारण एक्यूट माउंटेन सिकनेस (एएमएस) की स्थिति हो सकती है, जो कि समय पर इलाज न करने पर घातक हो सकती है। अतः बहुत सावधानी से बुना/डिज़ाइन किया हुआ यह यात्रा कार्यक्रम, यह सुनिश्चित करता है कि जब तक यात्री यात्रा के उच्चतम बिंदु तक पहुंचे, तब तक सभी यात्री उच्च ऊंचाई वाले ट्रेकिंग के लिए पूरी तरह से तैयार हों। जबकि प्राइवेट यात्रा एजेंसियां आपको सीधे एक ऊंचाई पे छोड़ देतीं है और वहाँ यात्री कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं से झूझते हैं।
कैलाश मानसरोवर यात्रा – एक ऐसी यात्रा, जो प्रत्येक दिन, आपको एक नए ब्रह्माण्ड का अहसास देगी
दिन 1 (नई दिल्ली)
भारत के कोने कोने से आए अलग अलग भाषाभाषी गुजरात भवन में इक्कठा हुए, इस यात्रा शुरू होने से पहले यात्रियों को चिकित्सा जाँचों, वीज़ा व्यवस्था, ब्रीफिंग आदि के लिए लगभग तीन दिन दिल्ली में रहना पड़ता है, इसके लिए सिविल लाइंस स्थित श्री दिल्ली गुजरती समाज भवन की 25-25 बेड के समूहिक शयन कक्ष में रहने की व्यवस्था थी, लेकिन अब इस हेतु उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा इंद्रपुरम गाजियाबाद में साठ करोड़ की लागत से 280 व्यक्तियों के रहने के लिए एक विशाल कैलाश मानसरोवर बन कर तैयार है
नई दिल्ली में एक नामित चिकत्सा संस्थान में विस्तृत चिकित्सा परीक्षा के लिए यात्रियों के पूरे जत्थे को एक बस द्वारा ले जाया जाता है। निर्धारित चिकित्सा परीक्षणों की सूची निम्नानुसार है:
हीमोग्लोबिन
टीएलसी
डीएलसी
ब्लड सुगर (एफ एंड पीपी)
रक्त मे स्थित यूरिया
क्रिएटिनिन
सीरम बिलुरूबिन, एसजीओटी, एसजीपीटी
Rh टाइपिंग के साथ BLOOD ग्रुप
लिपिड प्रोफाइल
मूत्र
छाती का एक्स - रे
टीएमटी
E.C.G.
प्रायोगिक समारोह परीक्षण (पीएफटी)
एचबीए 1 सी
STRESS-ECHO-TEST (यदि चिकित्सक द्वारा अनुशंसित हो)
बॉडी मास इंडेक्स:(BMI) यात्रा के लिए एक व्यक्ति की फिटनेस उसके स्वास्थ्य के कई कारकों पर निर्भर करती है। अन्यथा फिट व्यक्ति को बीएमआई स्तर को कम करके 27 या उससे कम करने की कोशिश करनी चाहिए।
इसलिए सलाह दी जाती है यात्रा के छह माह पूर्व ही फिटनेस ट्रेनिंग, व्यायाम प्राणायाम आदि करना चाहिए।
दिन 2 (नई दिल्ली):
मेडिकल परीक्षा से गुजरने वाले सभी यत्रियों को आईटीबीपी की मेडिकल टीम द्वारा मेडिकल समीक्षा के लिए नई दिल्ली के आईटीबीपी अस्पताल में रिपोर्ट करना पड़ता है। आईटीबीपी, निर्धारित चिकित्सा संस्थान द्वारा प्रस्तुत रिपोर्टों के आधार पर चिकित्सा समीक्षा करता है और यत्रियों की फिटनेस निर्धारित करने का उनका निर्णय अंतिम है। इस समीक्षा में फिट घोषित किए गए यात्रियों की ही कुमाऊं मंडल विकास निगम(केएमवीएन) द्वारा वीसा आदि की कार्यवाही की जाती है । यहाँ पर आईटीबीपी के अधिकारी भी आपको यात्रा मार्ग के बारे में ली जाने वाली सावधानियों के बारे में बताते हैं। यहाँ पर हम दल के लोगों ने अलग कमेटियाँ बनाई, जैसे की फूड कमेटी, वित्तीय कमेटी आदि।
दिन 3 (नई दिल्ली)
विदेश मंत्रालय यत्रियों को यात्रा के लिए तैयार करने के लिए एक संक्षिप्त सत्र का आयोजन करता है। इसमें विदेश मंत्रालय का एक वरिष्ठ अधिकारी, एक ITBP अधिकारी, पहले से यात्रा कर चुके एक संपर्क अधिकारी, वर्तमान बैच के Liaison Officer से अपने अनुभव साझा किए। शेष दिन में यात्री अंतिम मिनट की खरीदारी, विदेशी मुद्रा की व्यवस्था, विशेष पेकिंग आदि करते बीता । प्रस्थान से पहले शाम को, दिल्ली सरकार द्वारा एक शानदार सेंड ऑफ फंक्शन का आयोजन किया गया।
दिन 4 (नई दिल्ली से अल्मोड़ा - 370 किलोमीटर / 1890 मीटर / 5250 फीट)
सभी यात्री जल्दी उठ गए, और गैर सरकारी संगठनों और दिल्ली सरकार द्वारा आयोजित एक धार्मिक समारोह/हवन इत्यादि में भाग लेने के बाद, बस द्वारा कुमाऊं उत्तराखंड में अल्मोड़ा के लिए निकले। यह 337 किलोमीटर का सफर शाम ढलने से पहले सुनिश्चित करने के लिए बस सुबह तड़के 06.00 बजे ही निकल गयी। हमारा दल दोपहर 1:30 बजे के आसपास काठगोदाम में पहुँच गया और कुमाऊं मंडल विकास निगम (केएमवीएन) टूरिस्ट रेस्ट हाउस (टीआरएच) में एक पारंपरिक स्वागत और दोपहर के भोजन के बाद छोटी बस में लगभग 2:30 बजे अल्मोड़ा के लिए रवाना होता है। रास्ते में हमने विश्व विख्यात बाबा नीम करोली के कैंची धाम, भवाली से लगभग 9 किलोमीटर की दूरी पर एक संक्षिप्त पड़ाव कर दर्शन किए । इस आश्रम की शांति को आत्मा द्वारा अनुभव किया जा सकता है और इसे शब्दों में स्पष्ट नहीं किया जा सकता है। टुरिस्ट रेस्ट हाउस अल्मोड़ा पहुंचने पर, रात के खाने के बाद यात्री अपने कमरों में विश्रामरत हो गए।
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| प्रस्थान |
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| स्वागत |
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| कैंची धाम , अल्मोड़ा |
दिन 5 (अल्मोड़ा से धारचूला – 113 किलोमीटर)
पिछली रात को ही दल के मुखिया श्री संजय कोठारी, जो कि इंडो तिब्बत बार्डर पुलिस के अधिकारी हैं, द्वारा घोषणा कर दी गयी थी कि सुबह अगले पड़ाव के लिए रवाना होने से पहले, अपने को आने वाली दुर्गम चढ़ाइयों के लिए तैयार होने के लिए एक व्यायाम सत्र का आयोजन किया जाएगा। अतः सब यात्री सुबह जल्दी उठ गए, कमरे की खिड़की से मन को सुकून देने वाले दृश्य थे

व्यायाम सत्र में सब यात्रियों ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया, इन क्षणो के कुछ छाया चित्र प्रस्तुत है।


व्यायाम सत्र में सब यात्रियों ने बढ़ चढ़ कर भाग लिया, इन क्षणो के कुछ छाया चित्र प्रस्तुत है।

व्यायाम के बाद सब नहा धो, नाश्ता कर बस में सवार हो गए अगले पड़ाव के लिए।अल्मोड़ा शहर से कुछ ही दूरी पर यात्री गोलु देवता का दर्शन करने को रुके। इस स्थानकि ये मानता है कि अपनी फरियाद गोलु देवता को चिठी में लिख मंदिर परिसर में टांग दो और जब फरियाद का समाधान हो जाये तो एक घंटी चढ़ा के गोलु देवता का आभार प्रकट करो। वहाँ लाखों कि संख्या में घाटियां बंधी थी जो कि इस बात का सबूत थी कि गोलु देवता सबकी फरियाद सुनता है।
गोलु देवता के दर्शन कर भजन गाते गुनगुनाते दोपहर के भोजन तक हम केएमवीएन के पिथोरागढ़ स्थित गेस्ट हाउस में पहुँच गए। आज का बाकी दिन लास्ट मिनट कि ख़रीदारी आदि के लिए फ्री था, शाम को पर्यटक आवास गृह के प्रबंधक दिनेश गुरुरानी की पहल पर मानसरोवर यात्रा वाटिका में धरती के नाम एक पौधा कार्यक्रम के तहत पौधरोपण किया गया, यह एक अच्छी पहल है हमसे पहले के 17 यात्री जत्थों द्वारा लगाए पौधे वहाँ लहलहा रहे थे। बाकी शाम यात्रियों ने अपना-अपना सामान पुनरव्यवस्थित करते हुए गुजारा क्योंकि निर्देश दिया गया थे की helicopter पर केवल पंद्रह किलो वजन की अनुमति रहेगी सो सबने अपने अपने अतरिक्त सामान को पैक कर वहीं पर्यटक आवास गृह में छोड़ा और सारे वजनी कपड़े अपने शरीर पर धारण कर लिए क्योंकि इंसान के वजन की कोई अधिकतम सीमा निर्धारित नहीं थी। यहाँ ये बता दें कि वर्ष 2018 मे भीषण वर्षा के कारण धरचूला से बूढ़ी और बूढ़ी से गूंजी तक का ट्रेक पूरी तरह से तहस नहस हो गया था, यह दूरी 71 किलोमीटर (40 किमी जीप द्वारा और 29 पैदल) जो कि हमें छठे और सातवें दिन में क्रमशः 12 और 17 किमी पैदल चल कर करनी थी स्थगित कर दी गयी थी और अब हमें यह दूरी धरचूला के बजाय धरचूला लगभग100 किमी पहले ही पिथौरागढ़ से वायुसेना के हेलीकाप्टर द्वारा करनी थी, सो अब हमारा अगला पड़ाव अब पिथौरागढ़ था।
दिन 6
पिथौरागढ़(4967 फिट) से गूंजी (10500 फिट)
कुल 159 km (140 किमी रोड बस से 29 किमी पैदल)
सुबह भोलेनाथ की कृपा से मौसम साफ था और हेलीकाप्टर निर्धारित समय पर उड़ान भर हमें दो दिन और 29 किम की बेहद खतरनाक लेकिन बहुत ही खूबसूरत ट्रेकिंग से बचाते हुए केवल 35 मिनट में सीधे गूंजी पहुंचा दिया। ये भी हमारी बेच पर भोले की कृपा थी की मौसम साफ़ था नहीं तो हमारे से पहिले वाले जत्थे तो तीन तीन दिन रोज़ तैयार होके एयरपोर्ट आते और मौसम साफ़ न होने के कारण वापिस होटल। सेना के हेलीकाप्टर में बैठकर हमें खुद भी सैनिक होने का जैसा अहसास हुआ और गर्व भी महसूस हुआ। हेलीकाप्टर की खिड़की से हम दम साधे खूबसूरत नजरों को हसरत भरी निगाहों से देखते रहे और सोचते रहे की इन वादियों और झरनो को हम छू न पाये, खैर अभी आगे और भी मंज़िलें हैं। वहाँ पहुँचते ही हम ITBT के कैम्प से गुजरते kmvn के इगल्लू स्टाइल में बने खूबसूरत कैंप में पहुंचे वहाँ हमारा गरम गरम नाश्ते और चाय के साथ स्वागत हुआ और हम सब अपना सामान रख खूबसूरत नज़ारे देखने बाहर खुले में आ गए, और हमें तुरंत ही 10500 फिट पे पहुँच जाने का अहसास हुआ, तीखी ठंडक और दो कदम चलने में दम फूल रहा था। दोपहर में कुछ आराम, शाम को एक दो किमी की गूंजी गाँव की वॉक हमारे ग्रुप के सबसे प्यारे और बुजुर्ग छतीसगढ़ी कपुरचंदजी अग्रवाल के साथ। उसी शाम आईटीबीटी के कैंप प्रभारी और डॉक्टर द्वारा यात्रा के आगे के हिस्से की ब्रीफ़ दी और एक जरूरी सलाह की हमेशा जाकेट की चेन ऊपर और सर और कान ढके, नहीं तो तो कब ठंड आपको जकड़ लेगी आपको पता ही न चलेगा और आगे की आपकी यात्रा दुखद बना देगी। कुछ देर बाद ITBT के कैम्प में बने सुंदर मंदिर के अंदर आईटीबीटी के जवानो के साथ सुंदर भजन कीर्तन हुआ। और उसके बाद गरमा गरम भोजन और फिर रात्री में विश्राम
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| देश का अपना बैंक 10500 फुट की ऊंचाई पे |
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| गूंजी स्थित केएमवीएन का गेस्ट हाउस |
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| गूंजी गाँव के खूबसूरत लोग, जानवर और नज़ारे |
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| गूंजी गाँव मे खूबसूरत नक्काशीदार दरवाजा |
दिन 7 (गूंजी से नाबी 3 किमी)
इस छोटे से गाँव में यात्रियों को तीन दिन रुकाने के पीछे एक ही उदेश्य है उच्चीकरण(Acclimatization) यानि धीरे धीरे अपने आपको ऊंचाई वाले क्षेत्रों के उच्च दबाव वाले वातावरण में ढालना, लेकिन तीन दिन में शायद यात्री उकता न जाएँ इस कारण सामान्य यात्रा कार्यक्रम को थोड़ा सा संशोधित किया गया है, साथ ही साथ कुमाऊँनी जीवन शैली और उनकी संस्कृति, लोक संगीत और व्यंजनों को पेश करने के उद्देश्य के साथ सभी केएमवाई यात्रियों के लिए एक होमस्टे अनुभव को शामिल किया गया। हम सब छह बजे ही सब यात्री गुंजी से 3 किलोमीटर दूर एक गाँव नबी में गए जहां हमारे आगमन पर, हमारा पारंपरिक स्वागत किया गया और कुमाउनी व्यंजनों और लोक नृत्य और संगीत के समूह के साथ। आज हमें यहीं इनके गाँव में इनके घरों में रहना है, गाँव प्रधान श्रीमति सनम नाबयाल, एक फुर्ती भरी युवती प्यारी मुस्कान के साथ सब यात्रियों की सुख सुवधाओं का ध्यान रख रही थी। सुबह के नाश्ते से लेकर रात के खाने तक कई तरह के लोकल व्यंजन परोसे गए। शाम को एक बहुत ही मोहक सांस्कृतिक समारोह का आयोजन किया गया था, इसमे हमारे दल के सदस्यों ने भी अपनी प्रस्तुतिया दी। कुछ सदस्यों ने इनके पारंपरिक परिधानो को भी धारण किया। इतनी ठंड के बावजूद इनके घर के अंदर घर की बनावट और लोकल सामग्री के चलते आरामदायक गर्माहट थी या ये हो सकता है ये इनके स्वागत भरे व्यवहार की गर्माहट हो। रात को पास ही बहने वाली नदी की कलकल के बीच कब आँख लगी पता ही न चला। गाँव वाले के साथ नृत्य की झलकी इस लिंक पर देखी जा सकती है
स्वागत नृत्य
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| ग्राम प्रधान द्वारा सौम्य मुस्कराहट के साथ स्वागत |
दिन 8 (गूंजी में आराम का दिन)
हम चारों ओर की ऊँची चोटियों के मंत्रमुग्ध करने वाले दृश्यों के साथ जागे. चूंकि आसमान साफ था अपी पर्वत और इसके आस-पास की पर्वत श्रृंखला के चारों ओर सुनहरे रंग के आभा मण्डल के साथ हमारे सामने था। नाश्ते के बाद नाबी होम स्टे से नाबी गाँव वासियों ने आगे की यात्रा की लिए शुभकामनाओं के साथ भावभीनी विदाई दी, हम होम स्टे टीम के स्वागत सत्कार से अभिभूत थे। गूंजी गाँव की गलियों से गुजरते हम शीघ्र केएमवीएन के गेस्ट हाउस वापस पहुँच गए। संध्या को आईटीबीपी मेडिकल टीम गूंजी के कैंप में सभी यात्रियों की एक बार फिर चिकित्सा समीक्षा हुई, ITBP द्वारा आगे की बड़ी चुनौतियों के लिए यत्रियों को तैयार करने के लिए एक और ब्रीफिंग की । जिन तीर्थयात्रियों को आगे बढ़ने के लिए अयोग्य घोषित किया जाता है, उन्हें गुंजी से वापस भेज दिया जाता है, अन्य सभी को हरी झंडी दे दी जाती है परंतु हमारा पूरा दल इस परीक्षा में फिट पाया गया अलबत्ता बुजुर्ग और बीपी/ हृदय रोग के इतिहास वाले यात्रियों को घोड़े पर सवारी करने की शर्त पर आगे बढ्ने की अनुमति दी गयी।
अगली सुबह हमारी यात्रा की रवानगी थी, हमने आगे की यात्रा के लिए जरूरी पेकिंग कर अतरिक बोझ वापसी में कलेक्ट करने के लिए यहीं छोड़ दिया, पेकिंग भी दो अलग अलग भागो में की गयी एक भारत की तरफ के लिए और एक चीन की तरफ के लिए।
आपी पर्वत की चमकती चोटियाँ
दिन 9 गूंजी से व्यास गुफा/कालापानी
ट्रेक 10 किमी 3600 मी/11811 फिट
मुंह अंधेर ही हम 5 बजे हम कालापानी, जो की काली नदी का उद्गम स्थल है, के ट्रेक के लिए निकल चुके थे।केएमवीएन के स्टाफ ने ने इतनी सुबह नाश्ता तैयार करके हमारी विदाई की। खूबसूरत नदियां नाले को लांघते हम चलते जा रहे थे। गूंजी से चीन सीमा तक यात्रियों के साथ आगे-पीछे एवं बीच में आईटीबीपी के जवान चल रहे थे। जवानों ने इमरजेंसी के लिये साथ में आक्सीजन सिलेंडर भी रखे हुए थे।
जैसे-जैसे आगे बढ़ते जा रहे थे, हरियाली कम होते जा रही थी। केवल पत्थर, चट्टान ही दिखाई दे रहा था। प्राकृतिक धरोहर को आँखों में भरते हुए काली नदी के किनारे-किनारे आगे बढ़ते जा रहे थे। लगभग ३ घंटे चलने की बाद हम काली नदी के उदगम स्रोत पर बने कालीमाता के मंदिर पर पहुँच गए। काली नदी में बने पुल से नदी पारकर कालापानी पहुंचे। सरोवर के किनारे रास्ते पर चारों ओर रंगीन पेपर की झंडियाँ लगायी हुयीं थीं। छोटे-छोटे पत्थरों को लाल रंगकर उनसे सरोवर के जल में ऊँ लिखा हुआ था।
मंदिर के सामने एक पहाड़ में बहुत ऊँचाई पर एक गुफ़ा थी। जहां पर आईटीबीपी द्वारा पहचान हेतु झण्डा भी लगाया गया है। उक्त सुराख को ‘‘व्यास गुफा” बताया गया। इसी गुफा में महामुनि ब्यास द्वारा वर्षों तपस्या की गयी थी।
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| व्यास गुफा |
हम सभी ने जूते उतारकर, हाथ-मुंह धोकर अंदर प्रवेश किया। एक बड़े से कमरे में सामने दो छोटे कक्ष थे, जिनमें एक में माँ काली की प्रतिमा विद्यमान थी तो दूसरे में भगवान शंकर जी की। मंदिर को सलीके से सजाया हुआ था। रंगीन कालीन बिछा हुआ था। ढोलक मंजीरे और चिमटा इत्यादि रखे हुए थे जिनसे पता चलता था कि यहाँ भी कीर्तन होता रहता है। देखकर मन मंत्र-मुग्ध हो गया। मंदिर के बाहर बड़ा सा कुण्ड बना हुआ है जिसमें मंदिर के अन्दर से पानी बहता हुआ आकर एकत्र होता है। फिर वही पानी बहते हुए आगे जाकर नदी में मिल जाता है यहां से यह नदी काली नदी कहलाती है। बाहर एक अन्य कक्ष में हनुमानजी की प्रतिमा थी। इसी जगह के लिए अब नेपाल ने विवाद खड़ा किया है।
ऊँचे-ऊँचे पर्वत शिखरों से घिरे काली मंदिर में भजनों का संगीत बज रहा था। मंदिर में आईटीबीपी के जवानों द्वारा खास हमारे लिए लंगर की व्यवस्था की थी, भोजन में गरमा गरम पूड़ी सब्जी और खीर की व्यवस्था थी मन तृप्त हो खाना खाया और उसके उपरांत इमीग्रेशन के लिए प्रस्थान किया और फॉर्म भर कर, पासपोर्ट पर इमीग्रेशन करवा कर, कालापानी के केएमवीएन कैंप में आये। जहा बुरासँ के फूलो का शरबत ताज़गी देने के लिए तैयार था। यहीं पर रात्री भोजन और विश्राम की व्यवस्था थी

दूरी 9 किमी ऊंचाई 4260 मी/13976 फुट
एक बार फिर सुबह मुंह अंधेरे हम निकाल पड़े, कालापानी से नबीढ़ांग की दूरी 9 कि.मी है। नवीढांग के रास्ते में हरियाली कम दिखी किन्तु घाटी में रंग-बिरंगी फूल जरूर दिखे। ऊँ पर्वत के दर्शनों का लोभ लिए सभी जल्दी से जल्दी नवींढांग पहुचना चाह रहे थे। नवीढ़ांग के रास्ते में लगभग चारों तरफ पहाड़ी चोटी दिखलाई दे रही थी। जिसके आसपास काफी कोहरा भी था। तभी हमारे घोड़े वाले भैया सचिन ने बताया कि पीछे से एक ट्रक आ रहा है जो कि लीपुलेख से कालापानी के बीच बन रहे रास्ते के मजदूर और मशीन ले जाता है, उसको हम हाथ देके लिफ्ट मांगेंगे, इससे आप जल्दी नबीढ़ांग पहुँच जाएंगे और ॐ पर्वत के दर्शन सुलभ हो जाएंगे क्योंकि जैसे जैसे सूरज ऊपर चढ़ता है ॐ पर्वत पर धुंध छा जाती है, अहोभाग्य कि ट्रक रुक गया और हम भेड़ बकरियों कि तरह ट्रक में लद गए और आधे घंटे मे हम मंज़िल पर थे। यहाँ पर मौसम साफ़ नहीं था। ऊँ पर्वत बादलों में छिपा हुआ था।
हम टकटकी लगाये ऊँ पर्वत के पूरे दर्शनों के अभिलाषा लिए बैठे रहे और लगभग 10.10 पर बादल छटना चालू हो गए और हम ॐ पर्वत के दर्शन पाकर निहाल होते रहे, किचन आ रहे गरम पराठों की खुशबू भी हमें ललचा नहीं पाई और नयन भर नजारों का मज़ा लूटते रहे, खाने को तो पूरा दिन पड़ा था। बाकी का दिन हमने पेकिंग करते गुज़ारा क्योंकि भारत की तरफ ये हमारा आखरी दिन था कल सुबह हमें सीमा पार कर चीन के स्वायत क्षेत्र तिब्बत में प्रवेश करना था। हमने एक और बोझा कम कर सामान यहाँ के कैंप में लौटते वक्त कलेक्ट करने के लिए छोड़ा।
सात बजे रात का खाना लग गया क्योंकि अगले दिन की यात्रा बहुत कठिन थी और अगले दिन रात्री दो बजे ही प्रस्थान करना था इसलिए रात को जल्दी सोना था। कल हमें लिपुलेख पास पार करके तिब्बत में प्रवेश करना था। लिपुलेख का मौसम बहुत थोड़ी देर सुबह लगभग सात बजे (दो/तीन घंटे) तक ही ठीक रहता है। उसके बाद वहाँ बर्फीली आंधियाँ और बारिश होने लगती है। यात्रियों को निर्धारित समय-सीमा के अंदर ही लिपुलेख पास पार करना पड़ता है। भोजन से पहले एलओ ने छोटी सी मीटिंग की। अगली सुबह सभी से कई लेअर्स में कपड़े पहनकर, सिर से पैर तक ढकने और रैनकोट, टॉर्च और ड्राई-फ्रूट्स साथ रखने के लिए कहा। पोनी पर चलने वालों को ठंड से बचने के लिए विशेष ध्यान देने के लिए कहा क्योंकि पैदल चलने वाले यात्रियों को चलने से गर्मी आ जाती है पर पोनी पर हवा बहुत लगती है।
चीनी अधिकारियों द्वारा 7.30 बजे भारतीय समय के अनुसार (चीन का समय हम से 2.30 घंटे आगे है।) सुबह सीमा पार कराने का समय निश्चित किया गया है। इसलिए समय का ध्यान रखते हुए कल पैदल यात्री 2.00 बजे (रात के) तथा घोड़े वाले यात्री 3.00 बजे (रात को)अपनी-अपनी यात्रा प्रारंभ करेंगे तद्नुसार यात्री तैयार रहें। यहाँ पर मैंने अपने कैमरे का मेमोरी कार्ड निकाल लिया और दूसरा नया मेमोरी कार्ड डाल दिया। क्योंकि कई बार ऐसा होता है कि चीनी अधिकारी आपके मेमोरी कार्ड जब्त कर लेते हैं ऐसे मे फोटो के रूप आपकी कीमती यादें नष्ट हो जाने का भय रहता है । अगले दिन के रोमांच को मन में रखकर हम जल्दी सो गए।
दिन 11- नवींढांग से लिपुलेख पास भारत पाक सीमा (9 किमी) आगे तकलाकोट बस द्वारा
लिपुलेख की ऊँचाई 5334 मीटर (17500 फ़ीट))
सुबह डेढ़ बजे चाय आ गयी। ठंड इतनी कि हाथ को हाथ महसूस नहीं हो रहा था, ऐसे में बिस्तर छोड़ना एक तपस्या की तरह था और इस वक्त हम अपने को तवस्वी ही महसूस कर रहे थे, सो केएमवीएन के कर्मठ कर्मचारियों की एक आवाज पर उठकर दैनिकचर्या के साथ तैयार होने लगे। केएमवीएन के कर्मचारियों की कार्यकुशलता गजब की थी, पहले ही गरम पानी तैयार था। सभी ने गर्म पानी से हाथ-मुंह धो तैयार हो गए थे, इनर से लेकर विंड-चीटर तक पाँच लेअर्स में कपड़े, हाथ-पैरों में डबल गल्व्ज़ और जुराबें, सिर पर मंकी कैप पहन यात्री पहचाने नहीं जा रहे थे।
हर हर महादेव के नारे के साथ हमारा दल चल पड़ा। सभी यात्री एक हाथ में लाठी एवं दूसरे हाथ में बड़ा टार्च लेकर चल रहे है। ऐसा लग रहा है जैसे रात में मशाल जूलूस निकला हो। अंधेरे में माइनस टेम्प्रेचर में हवा के झोंकों के बीच जूतों और बेंतों की टक-टक, नाक की सूं-सूं, कपड़ो की सरसराहट, घोड़ो के गले में बंधी घण्टियों से सुनसान दर्रा गुंजायमान था। हमको ऐसा विदित हो रहा था की हम स्वर्ग के पथ के राही हों। आईटीबीटी के जवान साये की तरह, दो डॉक्टर्स मैडिकल-इक्यूपमेंट्स, ऑक्सीज़न-सिलेंडर्स और दो पोर्टेबल- स्ट्रेचर के साथ यात्रियों के साथ-साथ चल रहे थे। किसी को कोई परेशानी न हो हर पल का ध्यान रख रहे थे। बार-बार हाल पूंछते हौंसला बढ़ाते चल रहे थे। सांस फूलने की वजह से रूक-रूककर चलना पड़ रहा था।
इतनी देर में हमारा घोड़े वाले भी आ पहुंचा हम सपत्नीक घोड़े पर सवार हो गए। घोड़े पर बड़ा ही सचेत हो कर बैठना जरूरी था नहीं तो रात में घोड़े पर नींद आने के कारण गिरने के कई किस्से सुने हुए थे। जैसे-जैसे आगे बढ़ते जा रहे थे ठंड और हवा दोनों बढ़ती जा रही थी।
हम लिपु बॉर्डर से लगभग एक कि.मी.पहले रुक गए। यही पर हमें पैदल यात्रियों का इंतज़ार करना था। समय काटना कठिन हो रहा था, ठंड के मारे हाथ पैर सुन हो रहे थे ऐसे मे हमारे दल के लायजिनिग अधिकारी ने सब को गोला बनाकर 17500 फिट की ऊंचाई पे एक्सर्साइज़ करवाई, ये अपने आप में एक अनुभव था । पहाड़ों पर जल्दी दिन निकल आता है। आसपास पौ फटनी शुरु हो गयी। धीरे-धीरे धुंधलका कम होने लगा था। अब सब साफ़ दिखने लगा था। पैदल यात्री धीरे धीरे आ रहे थे। धीरे धीरे हम लोगो बॉर्डर की तरफ चलना शुरू किया। 7 बजे तक हम बॉर्डर पर थे। पहाड़ियों पर लगे झंडे सीमा बना रहे थे, वरना पता भी नहीं चल रह था कि कौन सी हद से कौन सा देश शुरु होता है। वो एक गाना है ना पंछी, नदियां पवन के झोंके कोई सरहद न इन्हे रोके। सब चीनी अधिकारीयों का इंतज़ार कर रहे थे। झर झर बहती तेज हवा एक जगह खड़े नहीं होने दे रही थी, नीचे तीन लेयर के कपड़े होने के बावजूद टांगे जैसे सुन्न हो रही थी, और इससे बचने के लिए जंप लगाने से सांस फूल रही थी, मतलब चीन के अधिकारियों का इंतज़ार भारी पड़ रहा था।
सीमा पर जवानों का जमावड़ा था। हमारी ओर हमारे सशस्त्र जवान जमे हुए थे। हम वही पत्थर की शिलाओं पर बड़ी मुश्किल से संतुलन बनाकर बैठ गए। हमारे साथ चल रहे पोनी एवं पोर्टर यही पर रूक गये। उन्हे उन की पेमेंट का आधा भुगतान किया गया, तिब्बत की सीमा रेखा के अंदर जाने तक आईटीबीपी के जवान हमारे साथ थे। एक तेज़ ढलवा रास्ते के उस पार दूर से दो बस आती दिखी, आगे आगे एक चीनी अधिकारियों की जीप थी। केवल दो चीनी अधिकारी ऊपर आए निरीक्षण कर वापस चले गए। हम लोगो ने अब बॉर्डर पार कर चीन -अधिकृत तिब्बत में प्रवेश किया। चीनी सीमा से बस तक का लगभग एक किलोमीटर का रास्ता पथरीला फिसलन भरा था, चूंकि उस तरफ पोर्टर नहीं थे एक हाथ में समान पीठ पर पिठू घिसटते, गिरते पड़ते बस के पास पहुँच गए वहाँ चीनी अधिकारी मौजूद थे चीनी अधिकारी अपनी लिस्ट से एक एक का नाम बोलकर बुला रहे थे और नाम और पासपोर्ट के साथ चेहरा चहेरे को मिला कर टिक कर रहे थे। हमारा सामान बस की डिकी में लोड हो गया और हम बस मे सवार हो गए। बस में बैठते ही हमारे गुरु नामक गाइड ने विशुद्ध हिन्दी में अपना और अपनी सहयोगी जिसका नाम डिक्की का परिचय दिया और बताया कि हम कस्टम-चैकिंग के लिए जा रहे थे। यात्री की गिनती के पश्चात बस चल पड़ी।
हम लोग बस से चीन के निकटम शहर तकलाकोट (पुरंग) के लिए रवाना हुए, मिट्टी के पहाड़ी-पठारी-मार्ग पर चढती उतरती धूल उड़ाती बस में बैठकर सुबह से थका शरीर बहुत राहत महसूस कर रहा था। बस बॉर्डर के मिलट्री-एरिया से गुज़र रही थी. सो गुरु ने फोटो बिलकुल न लेने और कैमरे बंद रखने की हिदायत दी। बस बॉर्डर के मिलट्री-एरिया से गुजरते हुए तकलाकोट में प्रवेश किये। बस तकलाकोट के कस्ट्म ऑफ़िस में दाख़िल हुयी हम सभी उतर कर कस्टम ऑफिस में अंदर गए। हमने इमीग्रेशन फार्म भरा, फिर लाइन में लगकर अंदर गए जहाँ सामने दीवार पर इन्फ़्रा-रेड कैमरा लगा था, सभी का टेंप्रेचर रिकॉर्ड हो रहा था। बैल्ट-पाऊच और हैंडबैग्स भी एक्सरे मशीन से गुजारे और सारी औपचारिकताएं पूर्ण करते हुए हम बस में आ कर बैठ गए।
पुनः बस में बैठकर तकलाकोट शहर में पुरंग गेस्ट-हाऊस की ओर चल पड़े। यहाँ नए और पुराने ब्लॉक में यात्रियों को रुकाया गया था। नया ब्लॉक कही ज़्यादा बेहतर था गीजर नहीं था सो गरम पानी के लिए सौर ऊर्जा आधारित गरम पानी के लिए सूर्य भगवान का इंतज़ार करना पड़ा, हमारा सामान भी आ गया था। उसे उठा कर अपने कमरे में लाये और किसी तरह फ्रेश और स्नान कर के हम लोग तैयार हुए तो नाश्ते का समय हो गया।
हम लोग भोजन-कक्ष में पहुँच गए। बड़ा सा हॉल जिसमें कई बड़ी गोल मेज लगीं थीं और चारों ओर कुर्सियाँ लगीं थी। बुफ़े सजा हुआ था, एक तरफ चाय और दूध का बड़ा कंटेनर लगा था। यहीं पर गुरु और डिकी ने आगे की यात्रा के बारे में ब्रीफ़ किया, वित्तीय हिसाब किताब घोड़ो पोर्टेरों के खर्चे आदि के बारे में समझाया। आगे के सात आठ दिन के रहने, बस आदि की व्यवस्था हेतु हमें 900 डॉलर चीन सरकार द्वारा निर्धारित एजेंसी को देने थे। फाइनेंस कमेटी के पास सभी ने डॉलर जमा करवा दिए। और सबको निर्देश दिये गए की जिनको आगे पोर्टर और घोड़ो की जररूरत हो वो अपने नाम अपने दल की इस हेतु बनी कमेटी को नोट करवा उसके लिए देय राशि युवान में जमा करवा दे। इसके अलावा दल की फूड कमेटी को भारत सरकार द्वारा दिये राशन के अतरिक्त दल के साध चलने वहाँ के कुक्स के साथ मिल बैठ जरूरी सामान की लिस्ट बना स्थानीय बाज़ार से खरीदना था, कैलाश बाबा और मानसरोवर की परिक्रमा से निकलने से पहिले। इन सब तैयारियों के लिए आज और कल इसी शहर और इसी होटल मे रुकना था परसों सुबह हम निकलेंगे उस सपनों की दुनिया के सफर पर।
पुरंग गेस्ट हाउस में जाने का रास्ता
खाना खा कर थोड़ा आराम कर के मार्किट घूमने चले गए शाम हो गयी थी, चीन की इस मामले में तारीफ करनी पड़ेगी, बार्डर के एक किलोमीटर दूर सड़क थी, बार्डर के इतना नजदीक इतना आधुनिक शहर तकलाकोट बसा लिया है सालों पहिले से और हम अब लीपुलेख तक कची पकी सड़क बना पाये है और उस पर भी नेपाल जैसे पिद्दू देश ने भारत को आँख दिखाई है, भगवान भला करे इस देश का।
बारहवाँ दिन ताकलाकोट
कैलाश मानसरोवर यात्रा के दौरान चीन सरकार द्वारा यात्रियों को रूकने की व्यवस्था, तथा खाना बनाने हेतु बर्तन व गैस सहित चुल्हा की सुविधा उपलब्ध कराई जाती है। भोजन सामग्री एवं रसोईया का इंतजाम यात्रियों को स्वयं करना होता है, इसलिए तकलाकोट से दो रसोइयों का सामूहिक व्यय पर इंतजाम किया गया। दिल्ली से यात्रा में रवाना होने के पूर्व यात्रियों के लिए 10 दिन का राशन सामग्री एवं दो बैग मेडिकल किट दिल्ली की एक संस्था द्वारा प्रदाय किया गया था।
हमारे गाइड गुरु द्वारा दिये निर्देशों से हम यात्री इतना डरे हुए थे कि हम बाहर मार्किट की फोटो खीचते हुए डर रहे थे की कहीं कोई सरकारी इमारत न हो। खैर हम घूम घाम के वापस आ गए, खुद को ज्यादा थकाया नहीं आने वाले दिन के लिए शक्ति बचाने हेतु। हम से पहिले गया दल वापसी उपरांत होटल मे पड़ाव डाले था, परिसर में अपने अनुभव सुना रहा था, परिसर में ही हम सब ने मिलकर भजन गाये और शाम का खाना जो की भारतीय समयनुसार 6 बजे ही लग गय, खाकर अपने अपने कमरों में चले गए और अपने समान को फिर दो भागों में बांटा एक कैलाश की परिक्रमा के समय के लिए और शेष मानसरोवर की परिक्रमा के लिए, और मन और स्व्पनों में कल से प्रारम्भ होने वाली यात्रा का खाका बनाते हुए हम सो गए।

रवि मल्होत्रा जी द्वारा भजन गायन

तेरहवाँ दिन तकलाकोट से दारचेन दारचेन की ऊँचाई - 4670 मीटर
कुल रास्ता : - 130 कि.मी बस
आज की यात्रा के उत्साह और रोमांच के मारे रात भर कई बार नींद उचटी और आखिर 5 बजे उठ बैठे निर्देश और सलाह थी चूंकि हम लोग लगभग 12 बजे अपने अगले पड़ाव पर पहुँच जाएंगे और वहाँ सौर ऊर्जा जनित गरम पानी मिल जाएगा सो, सुबह स्नान avoid करें सो हम हाथ मुंह दो फ्रेश हो तैयार हुए। 6 बजे नाश्ता के लिए डायनिंग हॉल गए। और लगभग 7 बजे बस में सवार हो गए। बस बड़ी आरामदायक थी। थोड़ी ही देर में
बस शहर से निकलकर करनाली नदी के किनारे पहाड़ी रास्तो की चढाई चढ़ते हुए चल रही थी। सड़क गज़ब की बनी थे ट्रैफिक न के बराबर कभी कभार कोई गाड़ी दिख जाए तो ठीक नहीं तो विधवा की मांग की तरह सूनी। हरियाली का नामो निशान न था । परंतु इस निर्जनता की अपनी सुंदरता थी। ऊपर सफ़ेद बर्फ़ से ढ़की चोटियाँ तो नीचे मटमैले पठारों की चोटियों हम प्राकृति को निहारते चल रहे थे।
लगभग 50 किमी चलने के बाद हमारी बस एक बड़ी सी झील के किनारे जाकर रूक गई । हमारे गाइड गुरु और डिकी ने बताया कि यह राक्षस ताल है, हम सभी यात्री नीचे उतरे, बस से नीचे उतरते ही तेज ठण्डी हवा महसूस हुई। झील नीलमणि सी चमकती रही थी। अद्भुत सौंदर्य परंतु विडम्बना देखये कि इस झील को अपवित्र माना जाता है। मान्यता है कि रावण द्वारा इसी झील के किनारे बैठकर भगवान शिव की कठिन तपस्या किया गया है। इसलिए इस झील को ‘‘रावण ताल” या “राक्षसताल” भी कहते हैं। रावण के कारण राक्षस-ताल अभिशप्त मानी गयी है। किंवदंतियों में इसके जल को विषैला बताया गया है, इसलिए इसके जल का स्पर्श वर्जित माना गया है। पक्षी भी इस का जल नहीं पीते और ना ही इस झील में कोई जीव जन्तु निवास करते हैं। जहाँ मानसरोवर का पानी मीठा है, वहाँ राक्षस ताल का खारा है। मानसरोवर में मछलियों और जलीय पौधों की भरमार है, जबकि राक्षस ताल के खारे पानी में यह नहीं पनप पाते। स्थानीय तिब्बती लोग इसके पानी को विषेला मानते हैं। हम सभी यात्री इस सुन्दर झील के फोटो खीचने में मग्न हो गए। यहाँ से कैलाश पर्वत के पहले दर्शन होते हैं.
कुछ और आगे चल हम पवित्र मानसरोवर झील पर पहुँच गए। मानसरोवर गोल है और इसे सूरज का और दिन की रौशनी का प्रतीक माना जाता है जबकि राक्षसताल के आकार की तुलना अर्धचंद्र से की जाती है और इसे रात्रि का और अंधेरे का प्रतीक माना जाता है। मानसरोवर के पानी में सूरज की किरणे पड़ रही थी जिससे वह चमकीला दिखाई पड़ रहा था ऐसा लग रहा था जैसे तारे मानसरोवर झील में टिमटिमा रहे हो। यात्रीगण बस से उत्तर कर मानसरोवर झील के सौंदर्य को जी भर के आँखों में बसा रहे थे तो कुछ कैमरे में कैद कर रहे थे। मानसरोवर के किनारे-किनारे दूर में हिमाच्छाादित लंबी पर्वत श्रृखंला लगातार दिखाई दे रही थी। यात्री निस्तब्ध हो, वहीं किनारे पर ध्यान मग्न हो बैठ गए।
लगभग आधा घटें के बाद हम लोगो ने दारचेन शहर के लिए प्रस्थान किया। यहाँ इतनी ऊंचाई पर सड़के शानदार देख मन वहाँ के प्रशासन कि तारीफ के बिना नहीं रह सकता। दारचेन के रास्ते में हिमालय में अनेक हिमाच्छिदत छोटे-छोटे पर्वत दिखाई दिए। दारचेन कैलाश परिक्रमा का बेस कैंप है हमें शहर के बाहर रोक गया, बस और सामान चेक हुआ और हम लोगो ने शहर में प्रवेश किया।
लगभग 11.30 बजे हम लोग दारचेन पहुंचे। हमारी बस बांऊण्ड्रीवाल से घिरे हुए भवन के पास जाकर रुकी। यहाँ पर एक सर्व सुविधा युक्त गेस्ट हाऊस में रूकवाया जाता है। बस के रूकते ही हम लोग अपना-अपना लगेज उतार कर गेस्ट हाऊस में दाखिल हुए। बस से उतरते ही आपको तिब्बती महिलाएँ अपनी पारंपरिक वेशभूषा में घेर लेती हैं मोती/स्टोन की बनी मालाएँ और अन्य आभूषण बेचने हेतु प्रदर्शित करने लगती है । परंतु सावधान सभी सामानों के भाव में मोल-तोल बहुत किया जाता है।
हमारे साथ आए कुक्स की कार्य कुशलता का क्या कहना 1.30 बजे भोजन तैयार होने की घंटी बजी तब तक हम गरम पनि से नहा धो भोजन हेतु गए भोजनोपरांत हम दारचेन के स्थानीय बाजार घुमने गए। प्रायः सभी दुकानों के मालिक तिब्बती महिला ही थी। खाने-पीने के सामान के अलावा अन्य सभी सामानों के भाव में मोल-तोल बहुत किया जा रहा था। हम ने कथित स्फटिक मालाएँ, दोस्तो रिशतेदारों के लिए यात्रा यादगार छोटे उपहार खरीदे। आसमान से कोहरा छटने पर दूर पहाड़ों के बीच में शाम को लगभग 5 बजे गेस्ट हाऊस से कैलाश पर्वत के दर्शन हुए। यहाँ से सामने की ओर से कैलास साफ दिखाई पड़ता है. 22,000 फीट की ऊंचाई वाला कैलास कुल 45 किलोमीटर इलाके में फैला है सभी यात्रियों ने कैलाश पर्वत के दर्शन किये। वाईफाई भी चालू हो गया था सो हमने वीडियो कॉल कर दोस्तो परिवार वालों को को भी कैलाश के दर्शन कराये। शाम की चाय पर हमारी फूड कमेटी के प्रयासों से गरम पकोड़ो के साथ गीतो की महफिल जमाई। यहाँ के डायनिंग हाल का माहौल/ambience गज़ब का है। बैठक व्यवस्था में सोफ़े लगे हुए थे। मेहफ़िल उपरांत सब को निदेश दिया गया की अगले तीन दिन के लिए सामान एक अलग बेग में भर बाकी सामान यहाँ जमा कर दें जो की कैलाश परिक्रमा के उपरांत यहाँ से कलेक्ट कर सकते हैं। निर्देश अनुसार रात्रि भोजन के लिए इकठे होने से पहले हमने अतरिक्त समान गेस्ट हाउस में निर्धारित जगह पर रख दिया और भोजन के बाद हम लोग सोने चल दिये, कल एक और ट्रेक के रोमांचक दौर के लिए ।
चोदहवाँ दिन--दारचेन से यम-द्वार(8 किमी बस द्वारा),
यम-द्वार से डेरापुख 10 किमी (पैदल लगभग 5 घंटे पोनी - लगभग 3 घंटे)
यम द्वार की ऊँचाई 4810 मीटर
डेरापुख की ऊँचाई 5050 मीटर
आज फिर हम सबेरे 5 बजे उठकर तैयार हो गया। हम पति पत्नी का एक बड़ा 15 लिटर का पिठू बैग और दो छोटे और तमाम हल्के बैग और एक थर्मस, दोनों बेल्ट-पाऊच कमर में बाँधकर, पानी की बोतल और फोल्डिंग छड़ियाँ लेकर हम गेस्ट हाउस से बाहर आ गए। अहाते में ही बस खड़ी थी। हम बस में जाकर बैठ गए। ठीक 7.30 बजे बस आगे यात्रा के लिए रवाना हुई। हमारी बस पहाड़ी कच्चे रास्ते से होकर आगे बढ़ रही थी। चारो तरफ सपाट बंजर भूमि नजर आ रही थी। हम आगे बढ़े. सामने का नजारा अद्भुत था. दो घाटियों के बीच में बर्फ की सफेद चादर से ढकी पर्वत-शृंखला, उसके पीछे नीला साफ आकाश. थोड़ा और आगे बढ़े, एक और घाटी, चारों तरफ बर्फ से ढकी हुई. हमें बताया गया कि यहीं महादेव ने कामदेव को भस्म किया था. तब यहां इतनी बर्फ नहीं थी, हरियाली थी और फूल खिलते थे. बारहों महीने वसंत रहता था. तारक नाम के राक्षस से देवता आक्रांत थे. उसे ब्रह्मा का वरदान था. देवता ब्रह्मा की शरण में गए. ब्रह्माजी मुस्कुराए, बोले—तारक का संहार शिव-पुत्र ही करेगा. पर शिव तो सती के वियोग में तपस्यारत हैं, फिर पुत्र कैसे होगा? उनकी तपस्या तोड़ने के लिए इंद्र ने कामदेव को भेजा. कामदेव पहुंचे तो उस बर्फीले पर्वत पर वसंत छा गया.
पार्वती अपनी सखियों के संग शिव के दर्शन के लिए पहुंचीं. तपस्या में लीन शिव के चरणों में पुष्प अर्पित किए. घनी झाड़ी में छुपे कामदेव ने फूलों से बींधा बाण चला दिया. शिव ने पार्वती को देखा, उनकी तरफ हाथ बढ़ाया. सोचने लगे, यह सुंदरी यहां कैसे! ध्यान भटका. लेकिन फिर तप में लीन हो गए. पर कहीं व्यवधान था. ध्यान केंद्रित नहीं हुआ. शिव चकित थे. काम का बाण अपना असर दिखा रहा था. कामदेव मुस्कुराए. तभी शिव का तीसरा नेत्र खुल गया. कामदेव वहीं भस्म हो गया. पार्वती व सखियां घबराकर भाग गईं.
कामदेव की पत्नी रति रोती-बिलखती शिव की शरण में आई—मेरा क्या होगा प्रभु? भोलेनाथ पिघले. बोले—अच्छा, जाओ, कामदेव को जीवित करता हूं; पर अब वह अनंग रहेगा. कभी सामने नहीं आ पाएगा. हमेशा छुपकर वार करेगा. पहले वहां बारहों महीने फूल खिला सकता था, पर अब नहीं. अब केवल दो महीनों के लिए फूल खिलेंगे और तब वसंत आएगा. तभी से वसंत सिर्फ दो महीनों के लिए ही आता है.
दारचेन से ८ कि.मी. आगे जाने के बाद बस रूक गई उस समय सुबह 8.30 बजे थे, हमें बताया गया कि बस इसके आगे नहीं जाएगी, आगे का रास्ता पैदल एवं घोडे से तय करना होगा। सभी यात्री नीचे उतर आए। सामने एक बड़े गुंबज वाला द्वार बना था। गुरु गाइड ने बताया- यह यम-द्वार है।
इस द्वार की परिक्रमा करके ही कैलाश की परिक्रमा प्रारंभ होती है। किवंदिति है, अगर आप इस की परिक्रमा कर के इस द्वार को पार करते हो तो मृत्यु-भय समाप्त हो जाता है। द्वार के इस ओर संसार है तो उस पार मोक्ष-धाम! बौद्ध लामा लोग यहाँ आकर प्राणांत होने को मोक्ष-प्राप्ति मानते हैं। इसलिए बीमार लामा अंतिम इच्छा के रुप में यहाँ जाते हैं और प्राण-त्यागते हैं। ब्रह्मपुत्र नदी का उद्गम स्थल इसी के पास है.
यम-द्वार के चारों तरफ रंग बिरंगी झंडियां लगी हुई थी। उसके दोनों ओर छोटे-छोटे चबूतरे बने थे। लोग शरीर-त्याग के प्रतीक के रुप में अपने शरीर से बाल नोंचकर वहाँ अर्पित कर रहे थे। द्वार के पार कैलाश-पर्वत अपने चरम सौंदर्य के साथ विधमान थे यहाँ से कैलाश बाबा का दक्षिणी मुख दिखता है। सभी यात्री इस द्वार को पार कर परिक्रमा कर भगवान शिव के निवास स्थल ‘‘कैलाश” पर्वत के परिक्रमा हेतु पोनी एवं पोर्टर के अलॉटमेंट का इंतज़ार करने लगे। यात्रियों के द्वारा अपनी-अपनी आवश्यकता अनुसार पोनी पोर्टर की मांग तकलाकोट में ही चीनी अधिकारियों को बता दी गई थी। उसी के अनुरूप यहां पोनी पोर्टर उपलब्ध होने थे। हमारे खाने, किराने और किचेन के समान के लिए याक भी आए थे।
हम सब एक नदी के किनारे के विस्तृत क्षेत्र में खड़े थे जहाँ बहुत सारे पोनी थे और तिब्बती पोर्टर। गुरु ने पोनी लेने वाले तीर्थयात्रियों की एक लाइन और पोर्टर लेने वालों की दूसरी लाइन लगाने को कहा, जिनको दोनों लेने होते है उन्हे अपने बैग पोर्टर वाली लाइन में रखना होते है
हमारा गाइड घोड़े वालों और पोर्टर के नामों की पर्ची एक टोपी में डालकर लाइन में लगे हरेक यात्री के पास जाकर एक-एक पर्ची उठाने को कहता जिस पर्ची पर जो नाम लिखा था वही उसका पोर्टर था। जिन यात्रियों ने केवल पोर्टर ही हायर किया था वे उनके साथ परिक्रमा पर चले गए, पर जिनको पोनी भी चाहिए था वे अभी भी अटके हुए थे। चूंकि घोड़े और पोर्टर पहिले ही देर से आए और फिर उनकी यात्री एलाट करते करते लगभग 9.45 पर हम परिक्रमा आरंभ कर पाये। हमारा एक बड़ा बैग पोर्टर ने उठा लिया और दो छोटे बैग जिसमें निजी जरूरतों के सामान थे वो हमारी पीठ पर थे। तीखी चुभन वाला ठंडा और खुश्क मौसम था। हमने अपनी कलाई पर काफूर की पोटली बांध रखी थी, समय पर इसे सूंघकर राहत महसूस होती थी
इन पोनी और पोर्टेरों को हिंदी या अंग्रेजी बिलकुल नहीं आती थी इसलिए इशारे से अपनी बात समझनी और समझानी पड़ती है। मैं घोड़े वाले के साथ पैदल ही चल पड़ा कब कभी तीखी चढ़ाई आती मैं घोड़े पर सवार हो जाता, हम प्रकृति के अद्भुत दृश्यों का आनंद लेते चलते जा रहे थे, आकाश गहरा नीला था, सूर्यदेव अपनी ऊष्मा उड़ेल रहे थे। दायीं ओर कैलाश-पर्वत अपनी श्वेत आभामय छवि के साथ दिव्य-दर्शन दे रहे थे, साथ में नंदी पर्वत उनके सौंदर्य की वृद्धि कर रहा था। बीच-बीच में हमें सामने से आते बौद्ध-अनुयायी परिक्रमा लगाते दिखायी दिए। कुछ तो लेट-लेटकर परिक्रमा मार्ग पर जा रहे थे।
आगे जाने पर हमें कुछ टेंट लगे दिखाई दिए, इन टैंट में खान पान की दुकान थी, क्योंकि हम अभी अभी तो चलना चालू किए थे, मैंने घोड़े वाले से कहा चलते रहो, पर उसने माना किया, हमारी गाइड डिकी ने स्पष्ट किया कि ये पोर्टर पोनी वाले सुबह सवेरे अपने गांवों से निकलते है और इस समय तक उन्हें भूख लग आती है सो उनके लिए रुकना पड़ेगा। कुछ देर के बाद हम फिर से आगे चल दिए।
करीब 1.30 बजे के करीब हम डेरापुख पहुँच गए। दारचीन और यम द्वार से हमने पवित्र कैलाश के दक्षिण मुख का दर्शन किया था और यहाँ से हम भगवान शिव के उतरी मुख का दर्शन कर रहे थे, विशाल पर्वत हमें बाहें फैलाये स्वागत आतुर प्रतीत हो रहा था ।
डेरापुख हमारा आज का विश्राम-स्थल था। सभी यात्री अपने अपने कमरों में चले गए। कमरे में छः पलंग पर बिस्तर लगे थे। मैं और कुछ साथी तुरंत ही यहाँ से करीब दो दो किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई पर चरण स्पर्श की ओर चल दिये हालांकि हमारे गाइड ने यात्रा स्टार्ट करने से पहिले ही चेतावनी दी थी कि चरण स्पर्श तक जाने कि अनुमति नहीं है, फिर भी कोई जाना चाहे तो अपनी रिस्क पर जा सकता है और कोई गाइड साथ नहीं जाएगा, वहाँ कभी भी मौसम खराब हो जाता है, कई लोगो का अनुभव है कि उन्हे किसी दिव्य शक्ति के कारण रास्ता भटक गए मतलब उन्होने हर तरह से हतोत्साहित और डराने कि कोशिश की परंतु हमारे दल के दोनों एलओ और कुछ साथी चल दिये चरण स्पर्श कि और मेरी पत्नी ने पहिले तो माना कर दिया परंतु बाद में वे भी दल के सबसे बुजुर्ग साथी 65 वर्षीय श्री कापुरचंद और श्रीमति मीनक्षी के साथ वहाँ पहुँच गईं थीं।
हम कैलाश-पर्वत की ओर से बहकर आ रही जलधारा के किनारे-किनारे पहाड़ी पर चढ रहे थे। बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच से निकलते हुए हम आगे बढ़ते जा रहे थे। एक एक कदम करके दम भरते काफ़ुर सूंघते चल रहे थे, मेरी गति धीमी पड़ गयी थी और एक समय पर मैं अकेले ही रह गया, बाकी लोग आगे चले गए थे, मैं घबरा रहा था, परंतु ऐसा अहसास हो रहा था कि कोई अंजान शक्ति मुझे पीछे से सहारा देकर आगे बढ़ाती जा रही है, चलते-चलते पानी की बोतल समाप्त हो गई। गला सूखने लगा पर चरण-स्पर्श का कुछ पता नहीं। जितना आगे जाते उतना ही रास्ता और कठिन होता जा रहा था। शिलाओं पर कूदते-फांदते डर भी लग रहा था कि कहीं संतुलन न बिगड़ जाए, पर ’ऊँ नमःशिवाय’ का जाप करते बढ़ते जा रहा था। अंधेरा होने का भय सता रहा था पर अंजान दिव्य शक्ति ने आखिर मंज़िल पर पहुंचा दिया कैलाश पर्वत के चरणों में अद्भुत दृश्य था, साँसो को संयत कर वहीं नतमस्त्क हो, ठंडी बर्फीली जमीन पर बैठ गया, आँखों से स्वतः अश्रु धारा बह रही थी, आँख खुली तो देखा पत्नी भी वहाँ पहुंची हुई थी मन दुगनी प्रसनता और प्रभु के प्रति आभार से भर उठा। करीब 4.30 बजे हम पहुंचे थे और एक घंटा ध्यान पूजन और फोटोग्राफी कर वापस चल दिए लौटते समय भी मैं मेरी धीमी चाल के कारण पीछे रह गया, पर हमारा अंधेरे हो जाने का खतरा भी निर्मूल साबित हुआ करीब 7.30 बजे तक अच्छी ख़ासी रोशनी थी।
चरण स्पर्श का पावन दृश्य
वापिस आके कुछ देर आराम करने के बाद मैं कमरे से बाहर आया थोड़ी देर बाद सूप आ गया फिर खाना खाया और सोने चले गए 8 बजे ही क्यों कि कल जल्दी उठना था कल का रास्ता इस यात्रा का सब से कठिन रास्ता डोलमा पास था। रात्रि में अंग अंग दर्द कर रहा था, कुछ दर्द के मारे, कुछ high altitude सिकनेस के कारण नींद नहीं आ रही थी, नींद न आने के बारे मे हमें पहिले से ही चेता दिया गया था। 11-11.30 के करीब जब नींद आने को लग रहा था तो अंडकोशों/gladder में लघुशंका का प्रैशर सत्ताने लगा पर कुछ ठंड और कुछ घुप अंधेरे के कारण बाहर निकलने की हिम्मत न हो रही थी, दूर कोने वाले बिस्तर पर भी हलचल महसूस हुई तो मैंने पीलीभीत के हमारे सबसे जवान साथी अनुज को साथ में लघुशंका के लिए बाहर चलने का निमंत्रण दिया जो उन्होने सहर्ष स्वीकार कर लिया। आजा सनम मधुर चाँदनी मे हम, गाते हुए हल्के हुए, वॉट ए रिलीफ़😀😀😀😀😀 का भाव लिए वापस आए, तब जाके कुछ देर के लिए आँख लगी।
पंद्रहवाँ दिन-----डेरापुख से ज़ुंज़हुई पुक
डेरापुख से ज़ुंज़हुई पुक , दूरी 20 किमी पैदल
डोल्मा-ला पास ऊँचाई 5750मीटर/19500 ft.
ज़ुंज़हुई पुक की ऊँचाई 4780 मीटर
आज हम सब ने यात्रा का सबसे कठिन और ऊँची चढ़ाई वाला भाग तय करना था। यहाँ सब कुछ मौसम पर निर्भर था, कब बर्फ़ पड़ने लगे और कब तेज बारिश, कुछ भी सुनिश्चित नहीं होता। सुबहे 4 बजे हम उठ गए बाहर काफी ठंडक थी। पाँच कपड़ो की परत पहने टोर्च के सहारे, बुरे तरह से गंधियाते, शौचालय में, कुंडी न खड़काओ राजा, सीधे अंदर आओ राजा गाते, 😀😀😀😀😀😀😀क्योंकि दरवाजे में कुंडियाँ ही नहीं थी किसी तरह नित्य कर्म निपटाए। इस मामले में चीनी सरकार के लिए मन में गंदे गंदे विचार आ रहे थे, पूरे परिक्रमा पथ पर 6 दिन यही व्यथा रही।
सुबह यहाँ से हमारे कुछ साथी स्वस्थाय ठीक न होने और कुछ आगे आने वली भीषण चढ़ाई भाँप वापिस चल दिए पर 65 वर्षीय दोनों बुजुर्ग अभी भी हमारे साथ थे। और दोनों ही चरण स्पर्श पर भी हमारे साथ थे, उनकी ज़िंदादिली, जिजीवषा और साहस को प्रणाम।
ब्रश वगैहरा कर के चाय पी, नाश्ते में दूध कोर्नफ़्लेक्स खाये और तैयार हो गये। हम सभी बाहर आ कर गोल्डन कैलाश के दर्शन के लिए खड़े हो गए। बादल होने के कारण गोल्डन कैलाश के दर्शन न हो सके। तब तक हमारे घोड़े वाले आ गए।
‘‘ओम नमः शिवाय‘‘ उद्घोष के बाद पैदल यात्रा 5.15 पर शुरू की गई। हवा में पूरी ठंडक थी। सांस फूलना सामान्य बात थी। थोड़ी दूर ही पैदल चलने पर सांस फुलने लग गया चूंकि आगे लगभग 5 कि.मी. खड़ी, संकरी, पथरीली चढ़ाई थी, इसलिए घोड़े से आगे की यात्रा प्रारंभ की गई। रास्ते में चारो तरफ सिर्फ चट्टान ही चट्टान दिखाई दे रहा था, पेड़ पौधे एवं हरियाली के नामो निशान नहीं है।
ठंडी और तेज हवा के बीच उन पथरीले टीलों को पार करके हम साढ़े छः के आसपास खड़ी ऊँची पहाड़ी पर चढ़ने लगे। चढ़ाई मानों किसी दीवार पर चढ़ रहे हों। घोडा बार-बार पीछे को आता हम बड़ी मुश्किल से, घोड़े पर आगे की तरफ सिर झुकाए हुए संतुलन बनाने की कोशिश कर रहे थे । डोल्मा पास से आधा कि.मी पहले घोड़े वाले ने हमें उतार दिया क्योंकि आगे तीखे मोड़े और नुकील पत्थर थे । एक एक कदम बढ़ाते इंच दर इंच सरकते चढाई चढ़ कर हम लोग डोल्मा पास पहुंचे जिसकी समुद्र सतह से ऊचाई 19500 फीट हैं इस स्थल को तिब्बती देवता डोमा के नाम से डोल्मा माता का स्थान भी कहते है। चारो ओर से उच्च्चतम पर्वत-मालाओं से घिरा, फैली हुयी विशालाकार चट्टानों/शिलाओं से पटा पड़ा विशाल दर्रा – डोलमा-ला पास!!! दिल दहला देनेवाली यह सबसे कठिन चढ़ाई थी. यहां आते-आते सांसें छूटने लगीं. डोल्मा से कैलास शिखर की ऊंचाई महज 3,000 फीट रह जाती है. लग रहा था कि हाथ बढ़ा कैलास को छू लें. बर्फ से ढके शिवलिंग की तरह कैलास सबसे मनोरम यहीं से दिखते हैं. सचमुच स्वर्ग की सीढ़ी का अहसास होता है. बाकी हिम-शिखरों से बिलकुल भिन्न. अदृश्य शक्तियों का भंडार. संतुलित पूरा पहाड़ जितना लंबा उतना चौड़ा.
यहाँ से कैलाश का पश्चिमी चेहरा दिखता है इस छोर से उस पर बनी शेषनाग की लहरियां दिखती हैं. गाइड ने बताया कि ये समुद्र-मंथन के निशान हैं. कुदरत से बड़ा संगतराश कौन है. ग्रेनाइट पत्थर का यह पर्वत महाशिवलिंग का आभास देता था. रास्ता खतरनाक था. हमें बड़े-बड़े पत्थरों पर संतुलन बिठाकर चलना पड़ रहा था. लगता था, अगर पांव फिसला तो सीधे महादेव के चरणों में. डोल्मा पास पर रंग बिरंगी तिब्बती मंत्रो से लिखी झंडियां लगी हुई थी, जो एक अलग ही बहुत सुन्दर नजारा पेश कर रही थी।
डोलमा पास - चित्र साभार अंतर्जाल से
डोलमा पास - चित्र साभार अंतर्जाल से
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| गौरी कुंड |
डोलमा-ला पास से आते रास्ते में मिल गये पत्थरों पर चढ़ते-उतरते पैर और घुटने बिलकुल बेहाल थे। आगे हमने बर्फ का छोटा सा ग्लेशियर पार किया और अब रास्ता उतराई का था काफी चलने के बाद हम ल्हाचू घाटी में पहुंचे। नीचे पहुँच के मालूम पड़ा यहाँ भी मैं सब से पीछे रह गया था हमारे दल के साथ के सभी साथी, मेरी पत्नी भी आगे जा चुकी थी। ल्हाचू घाटी में एक छोटी सी दुकान भी थी। जिसमें कोल्डड्रिंक, पानी के बोतल और चॉकलेट इत्यादि मिल रहे थे। चूंकि मैं थक के चूर हो चुका था, मैं भी वहां रूककर थोड़ी देर विश्राम किया, और दुकानदार से गरम पानी ले अपने साथ लायी इंस्टेंट मैगी मे डाल पेट पुजा की चाय पी फिर चल दिये घुड़सवार बन। हम मिट्टी के ढ़ेरों वाली उबड़-खाबड़ उतार-चढ़ाव रहित घाटी में चल रहे थे। बायी ओर मंद-मंद बहती नदी थी। जैसे-जैसे हमारी यात्रा आगे की ओर बढ़ती जा रही थी वैसे-वैसे नदी चौड़ी और गहरी होती जा रही थी। इस के बाद का रास्ता खत्म होने पर ही नहीं आ रहा था। मेरे दल का कोई साथी दूर दूर तक नहीं दिख रहा था, घोड़े पर बैठे बैठे पीठ अकड़ रही थी
शाम के समय चन्द्रमा अपने पूरे रूप में हमारे कमरों के सामने चमक रहे थे। सामने पहाड़ पर सूर्य की किरणे और साथ ही पूर्ण चन्द्रमा अलग ही नजारा पेश कर रहे थे। सब ने जल्दी से इस नज़ारे को कैमरे में कैद करना शुरू कर दिया। मेरे को उदास देख मित्रो ने पूछा तो उन्हे आप बीती सुनाई, तो वो बोले, अरे! वो जो हमारे साथ जो दूसरा दल चल रहा था उसके एक साधुवेशी सदस्य को एक कैमरा मिला है, मैं भाग के उसके कमरे मे पहुंचा और कैमरा का पूछा तो झोले से निकाल कैमरा दिखाया, ये देखिये ईश्वर की असीम कृपा मेरा कैमरा मिल गया था, मन खुशी से झूम उठा। आज सभी बहुत प्रसन्न थे क्योंकि शिव की कृपा से यात्रा का कठिनतम भाग भी निर्विघ्न पूरा हो गया था। सभी सकुशल रहे और मौसम हमेशा अनुकूल बना रहा। अत्याधिक थकावट के मारे आज सभी साथी खाना खा जल्दी ही सो गए
सोलहवां दिन---ज़ुंजुनहुई पुक से कुगु
कुगु की ऊंचाई 4600 मीटर लगभग 5 किमी. पैदल १२० किमी बस से
सुबह 4 बजे उठ गये नित्य क्रिया से फारिग हो, चाय और नाश्ता कर के 5:30 बजे तक चलने को तैयार हो गये। शिव वंदना और जयकारे के साथे यात्रा शुरू की, कल की यात्रा की अपेक्षा आज की यात्रा का रास्ता आसान था। सभी यात्री लगातार बढ़े जा रहे थे। हम जोंगज़ेर्बू नदी के किनारे-किनारे दूसरी ओर कच्चे पहाड़ों के बीच समतल घाटी में प्रकृति के रुप को निहारते बढ़ते जा रहे थे।
करीब 5 कि.मी. चलने के बाद हम ऐसे जगह पहुंचे जहाँ बस हमारा इंतज़ार कर रही थी। यात्री आते जा रहे थे और कैलाश-परिक्रमा पूर्ण होने की बधाई दे रहे थे। सभी बस में आ कर बैठ गये ड्राइवर ने बस स्टार्ट कर दी। बस में सभी ने एकसाथ जय भोले का घोष किया। बस चल पड़ी। 8:30 बजे पुनः दारचेन के उसी गेस्टहाऊस में जाकर रुक गयी। यहाँ से हमने जो सामान छोड़ा था वापिस कलेक्ट किया। कुछ वहाँ बैठी महिलाओं से ख़रीदारी की और वापिस बस में सवार हो चल पड़े।
अब हमें मानसरोवर की परिक्रमा बस से ही करनी थी, बस चलते हुए गाँव, मैदान और पठार पार करती विशाल मानसरोवर के किनारे-किनारे बनी पक्की सड़क पर दौड़ रही थी। हम बस की खिड़की से मानस सरोवर को निहार रहे थे। सड़क कभी झील के पास होती तो कभी दूर, झील के पार कैलाश-पर्वत के भी साथ-साथ दर्शन हो रहे थे। यात्रा में लगातार हमारी बस मानसरोवर के किनारे-किनारे ही जा रही थी।
मानसरोवर के चारों ओर से दुनिया की चार बड़ी नदियां निकलती हैं. मानसरोवर के पश्चिम की ओर से निकलनेवाली सतलुज नदी है. तिब्बती इसे ‘लांजयेन खंबाब’ कहते हैं, जिसका मतलब हाथी का मुंह होता है. दक्षिण की ओर बहनेवाली नदी करनाली है, जिसे तिब्बती में ‘मेपचा खंबाब’ कहते हैं. यही नदी भारत में पहले सरयू और बाद में घाघरा कही जाती है. ब्रह्मपुत्र को तिब्बती ‘तमचोक खंबाब’ कहते हैं, यानी घोड़े का मुंह. यह पूर्वी छोर से निकलती है. सिंधु शेर के मुंह से निकलनेवाली नदी कही जाती है. उत्तर की तरफ से निकलने वाली ‘सिंधु’ नदी को ‘इंडस’ भी कहते हैं.
लगभग 10.30 बजे हम मानसरोवर के किनारे बने कुगु स्थित गेस्टहाऊस पहुंचे, गेस्ट हाउस की लोकेशन बड़ी शानदार थी गेस्टहाऊस में दो ओर आमने-सामने पंक्तिबद्ध कमरे बने थे। सभी के दरवाजे प्रांगण में खुलते थे और सभी खिड़कियाँ मानसरोवर की ओर खुलती थीं। दूसरी पंक्ति के कमरों के खिड़कियाँ मान्धाता पर्वत की ओर। अन्य दो साइड्स में एक ओर दरवाज़ा बना था मोनेस्ट्री की ओर, तो दूसरी ओर खुला क्षेत्र था, उसी ओर दो टॉयलेट बने थे। दोनों ओर से मानसरोवर झील के किनारे तक पहुँचा जा सकता था।
हम लोग अपने कमरे में आ गए। कमरा बहुत साफ़ सुथरा और बड़ा था। दरवाजे के बिलकुल सामने पूरी दीवार की चौड़ाई में बड़ी खिड़की जिस पर काँच के पल्ले थे। पूरी कैलाश और मानस परिक्रमा का सबसे बेहतर कमरा था। कमरा और उस की साज सज्जा देख कर दिल खुश हो गया। मौसम साफ़ था। धूप खिली थी सो यात्रियों ने निश्चय किया कि मानस में डुबकी उसी दिन लगा ली जाए क्योंकि अगले दिन मौसम अनुकूल हो या न हो। इस वर्ष चीनी सरकार ने सरोवर मे डुबकी लगाने और सीधे नहाने पर पाबंदी लगा दी थी सबको बाल्टी और मग दे दिया गया था, बाल्टी भर के स्नान किया जा सकता था, डुबकी लगाकर पकड़े जाने पर ५००० युवान का फ़ाइन था।
चित्र साभार अंतर्जाल से
हमने अनेक झील देखीं हैं, मै तो झीलों की नागरी भोपाल का बंदा हूँ, पर यह दिव्य झील मानो नीलमणि पिघलकर बह रही हो!!! कहते हैं ब्रह्मा ने देवताओं के लिए इसे रचा! स्वच्छ जल! आकाश जिसमें डूबता सा लगता था, लहरें मानों अनुशासन में नापकर दूरी तय करती हों और सामने भव्य कैलाश का दर्शन! क्या कहें लिखते में भी रोमांच होता है! पहले झुककर कैलाश पर्वत को नमस्कार किया और पिघली बर्फ़ से ठंडे जल को दोनों हाथों में लेकर मस्तक से लगाया।
मानसरोवर का पानी एकदम साफ, अत्यधिक ठण्डा है। पानी में कमर तक गहराई में जाने पर भी नीचे सतह स्पष्ट दिखाई दे रहा था। पानी ठण्डा होने के बाद भी मानसरोवर में काफी अंदर जा बाल्टी भर सर पर पलटने पर असीम आनन्द की अनुभूति हुई। मानसरोवर में खड़े हो दूसरी तरफ दूर दिखाई दे रहे ‘‘कैलाश‘‘ को नमस्कार करना एक अलग ही अनुभव था, झील के सामने दूसरी तरफ ओर बर्फ से ढके मांधाता पर्वत थे। मानसरोवर में स्नानकर अद्भुत अनुभूति प्राप्त कर अपने कमरे में लौट आये। फिर एक कमरे बैठ दल के सदस्यों ने गानो की महफिल सजाई और खूब आनंद लिया।
शाम होने पर मानसरोवर किनारे खड़ा होकर सूर्यास्त देखा और कैलाश दर्शन कर अपने अपने कमरों में सोने के लिए चले गए। ऐसी मान्यता है कि रात्रि के अंतिम प्रहर में भोर से पहले देवगण आकाश मार्ग से रौशनी के रूप में मानस में स्नान करने आते हैं शूटिंग स्टार जैसा दृशय होता है ऐसे अनुभव कई यात्रियों के सुने थे, सो हम जल्दी खाना खा सो गए एक बजे का अलार्म लगा, एक बजे हम खिड़की के पास लगे टेबल पर जा बैठे, टकटकी लगा आसमान देखते रहे, काफी देर तक, चाँदनी रात मे नीला पानी झिलमिला रहा था, पानी की लहरों के थपेड़े यहाँ तक सुनाई दे रहे थे परंतु देवीय रोशनी के दर्शन नहीं हुए। कुछ देर बाद बाहर हलचल सी सुनी तो देखा हमारे दल के कुछ सदस्य नीचे झील तक जा रहे थे सो हम सभी बाहर झील की तरफ गए, हम सभी झील के किनारे बैठ कर देवगणो का इंतज़ार करने लगे। एक दो बार आकाश में प्रकाश फैलता नजर आया था जैसे कोई टॉर्च से प्रकाश फैंक रहा हो। बाहर बहुत ठण्ड थी। तापमान माइनस में होगा शायद। हम सभी ने कई लेएर्स में कपडे, दस्ताने, कैप आदि पहन रखे थे। सभी का ध्यान झील और आकाश की तरफ था। २ घंटे के करीब बैठने के बाद मैं कमरे में चला गया। धीरे धीरे सभी यात्री अपने अपने कमरों में चले गए। शायद इतने साफ वातावरण में जहां तारे इतने साफ दिखाई दे रहे थे शूटिंग स्टार्स को या दूर हाइवे पर जा रहे वाहनो की रोशनी को ही लोग दिव्य रोशनी समझते होंगे। खैर जो भी हो चाँदनी रात में झिललमिलती झील का आनंद तो लिया हमने।
सत्रहवाँ दिन - एक ठहरा हुआ दिन मानसरोवर के सानिध्य में
आज आराम से सो कर उठे। जल्दी से दैनिक क्रिया से निवृत हो गए। इस के बाद मानसरोवर किनारे चले गए। पानी काफी ठंडा था, मानसरोवर के सुबह के अलौकिक दृश्यों कि फोटो लेते रहे आज आसमान साफ़ था। कैलाश पर्वत की साफ़ दर्शन हो रहे थे, वापस आ कर कपडे निकाल कर मानसरोवर स्नान को निकाल गए। आज मानस के तट पर हवन पूजन का कार्यक्रम था, सुबह से ही तैयारी चल रही थी, फूड कमेटी के सौजन्य से आज सूजी और सूखे मेवे का हलवा प्रसाद स्वरूप बांटने का भी प्लान था, गुजरात से आई सुश्री कलाबेन, मेरी पत्नी मीना और केरल से आए केटरिंग व्यवसायी चंद्रन सब जुटे थे हलवा बनाने में।
प्रातः 10 बजे सब पवित्र झील के पास बने हवन कुंड के पास पहुँच गए, बंगाल से आए दुर्गादास जी और उनकी पत्नी सुश्री रेखा गोस्वामी ने पुरोहित की भूमिका अता की खूब भक्ति भाव और विधि विधान से पूजन अर्चन और हवन किया गया सभी लोगो ने मिलकर मानसरोवर और कैलाश की समक्ष आहुतिया दी और प्रसाद ग्रहण किया।
भोजन के पश्चात आधे घंटे आराम करके हम पास में ही बनी मोनेस्ट्री में चले गए। बाहर से बिलकुल साधारण सी लगने वाली लकड़ी से निर्मित दुमंजिला मोनेस्ट्री अंदर से बहुत भव्य थी। सामने ध्यान-कक्ष में स्वर्ण-मूर्तियाँ विराजित थीं। एक दीपक जल रहा था। विलक्षण शांति पसरी हुई थी। कुछ देर आँखें बंद करके मन एकाग्र किया और ध्यान लगाया। बाहर आकर दूसरी मंजिल पर गए जहाँ लामा लोगों का निवास स्थान था।
एक बार फिर हम मानस के तट घूमने चले गए। मानसरोवर के किनारे किनारे बड़ी दूर तक टहलते हम मानस में बिखरे गोलाकार पत्थरों में ’ऊँ’ लिखे पत्थर ढूंढने लग गए कुछ ॐ लिखे पत्थर हमें मिले तो पर हम जो जहां की वस्तु है वहीं की रहे सोच वही जल मे प्रवाहित कर दिये फिर हम वही पत्थरों पर बैठकर मानस के रुप को निहारते रहे। सूर्य की किरणें और मानस की लहरें क्रीड़ा करते हुए सुंदर दृश्यावलि प्र्स्त्तुत कर रहीं थीं। हम उन्हें देखने में खो गए। कई यात्री मानस में जल भरने जा रहे थे। हम ने भी बोतलों में घर के लिए मानस का पवित्र जल भरा।
ऐसे ही इतनी सुन्दर, पवित्र झील ‘चंद्रताल’ हमने अपनी स्पीति वैली के बाइक ट्रिप के दौरान हिमाचल प्रदेश में देखी है। एक बात और इतनी बड़ी झील और गंदगी का नामोनिशान नहीं। कम से कम इस मामले में तो चीन सरकार तारीफ़ की पात्र है। मेरे ख्याल में यही पवित्र झील अगर भारत में होती तो पहले धर्म के नाम पर इस के चारों तरफ दुकानें खुल जाती फिर गंदगी तो अपने आप आ जाती।
रात्री भोजन से पहिले एक बार फिर गानों/भजनों की महफिल चली और चूंकि कल प्रस्थान था, भोजन उपरांत हम पेकिंग आदि मे जुट गए, मानस के जल की भरी केन और बोतलों के ढक्कन साथ लाई एमसील और टेप से अच्छे तरह से पैक करी और फिर एक शानदार और परिपूर्ण दिन की समाप्ति के लिए ईश्वर को धन्यवाद दे नींद के आगोश मे समा गए।
अठारहवाँ दिन - मानसरोवर कुगु से तकलाकोट
65 कि.मी. बस से
सुबह पांच बजे उठकर दैनिकचर्या से निपटकर नाश्ता किया और मानस दर्शन किये। मानस का अलौकिक दिव्य स्वरुप ही सचमुच इसे देव-सरोवर! बनाता है। "ओम नमः शिवाय" के उद्घोष के साथ 6 बजे हमारी बस चल पड़ी। यात्रियों ने विदाई-भाव के साथ शिव-धाम कैलाश और देव-सरोवर मानस को नमन किया और ’हर-हर महादेव’ के जयकारे लगाए। सभी कैलाश से विदा लेते में भावुक थे क्योंकि आगे धीरे-धीरे कैलाश के दर्शन छिप जाते हैं। यही बाबा भोले के धाम के अंतिम दर्शन थे। हमारी बस मानस के किनारे-किनारे बने रास्ते पर जा रही थी। हम मानस के विशाल रुप को देखकर मुग्ध हो रहे थे। हमारी बस मानस को पीछे छोड़कर आगे दौड़ रही थी। थोड़ी देर में मानस दर्शन कम हो गए और राक्षस-ताल दिखेंने लगा। हमारी बस ऐसे जगह रुकी जहा से मानस ताल, राक्षस-ताल दाये और बाये थे। यहाँ से एक ओर कैलाश पर्वत तो दूसरी ओर तो गुरला मन्धाता के दर्शन होते हैं
गुरला मन्धाता तिब्बत की सबसे ऊंची चोटी है मन्धाता प्राचीन भारत में सुर्य राजवंश का एक राजा था जिसने कथानुसार इन्द्र को परास्त करके अमरावती पर विजय की थी।[2] इस विजय को यादगार बनाने के लिये मानसरोवर के किनारे खड़े इस पर्वत का नाम 'मन्धाता' रखा गया। 'गुरला' यहाँ पास में स्थित एक पहाड़ी दर्रे का नाम था जो पर्वत के नाम के साथ जुड़ गया। यहाँ थोड़ी देर रुक फोटोग्राफी की और फिर चल पड़े ज़ोरावर सिंह की समाधि की ओर
लगभग 2 घंटे चलने के बाद आसपास हमारी बस सड़क के बायीं ओर साइड में जाकर खड़ी हो गयी। गुरु ने सभी से नीचे उतरने को कहा। लगभग सौ मीटर अंदर जंगल में गए। वहाँ छोटे-छोटे पत्थरों को चुनकर लाल रंग से पुता हुआ एक मंच/चबूतरा सा बना हुआ था। जिस पर मठ की भांति तिब्बती-परंपरा की तरह कपड़ों की झंडियाँ बांधी हुयी थीं।
हम सभी वहाँ एकत्र हो गए। तब गुरु ने बताया कि वह ’तोय’ गांव है और वह चबूतरा भारत के वीर बलिदानी सेना-नायक ज़ोरावरसिंह की समाधि है। वीर ज़ोरावर सिंह लद्दाख को भारत का अभिन्न हिस्सा बनाने के अभियान का हीरो था। स्थानीय भाषा में उसे सिंगलाका चौतरा कहा जाता है। गुरु के अनुसार स्थानीय लोगों में उस समाधि की बड़ी मान्यता है। वहाँ समाधि पर आने से उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। हम सभी ने सच्चे मन से उस सैनानी को अपनी विनम्र श्रद्धांजली अर्पित की।
ज़ोरावर सिंह की याद को मन में संजोय हम बस में बैठकर पुनः तकलाकोट की ओर बढ़ गए। हमारी बस तकलाकोट को पार कर खोजरनाथ के रास्ते पर चल पड़ी खोजरनाथ एक प्राचीन हिन्दु मंदिर है। खोजरनाथ तकलाकोट से लगभग 20 कि.मी. दूर है।
मंदिर में आदम कद से भी बड़ी तीन मूर्तियाँ थी, जिनको गुरु ने राम, लक्षमण और सीता बताया। बीच में राम बाएं सीता तो दांए लक्षमण। इन मूर्तियों की बनावट बुद्ध मूर्तियों की तरह ही है। हालांकि बाहर बोर्ड पर उसे खोरचग मोनेस्ट्री ही लिखा है। इस की स्थापना 996 ई. में रिनचेन सांगपो द्वारा की गई थी। मंदिर के बीचो बीच घी के बड़े-बड़े दीपक जल रहे थे। यात्रियों को भी दीपक खरीदकर आरती करने की सुविधा थी। हम सब ने भी दीपक जलाए। मंदिर में युवान के साथ-साथ रुपया भी लिया जा रहा था। मंदिर में अंदर मूर्तियों के सिंहासन के चारों ओर अति संकीर्ण परिक्रमा-मार्ग था। जिसमें बिलकुल गुपागुप्प अंधेरा था। पहले तो डर लगा फिर चले गए और परिक्रमा करके बाहर आ गए। मंदिर के दायीं ओर एक कक्ष में भगवान बुद्ध की ध्यानस्थ-मुद्रा में मूर्ति विराजित थी। हमसब ने वहाँ भी मस्तक झुकाकर नमस्कार किया और मंदिर का पुस्तकालय देखा और बाहर आगए। मठ के परिक्रमा स्थल में प्रार्थना चक्र लगे थे। जिन पर तिब्बती भाषा में मंत्र लिखे हुए थे। बौद्ध श्रद्धालु परिक्रमा करते समय उन्हें घूमते जा रहे थे। उनके लिए वे बौद्ध भगवान थे हमारे लिए वे राम सीता लक्ष्मण थे ।
बाहर मैन गेट के पास ही मंदिर के प्रबंधक की ओर से हम सब यात्रियों को याक के दूध की चाय पिलायी गयी। वहीं एक छोटी सी कोठरी में मंदिर और कैलाश-मानसरोवर के पोस्टर और चित्रों के अतिरिक्त पूजा की अन्य सामग्री भी बिक रही थी। कुछ सहयात्री खरीददारी कर रहे थे, कुछ बाहर बस के पास आगए थे। मठ के चारों ओर पक्की सड़कें, मकान थे। जिन पर चीन के झंडे लहरा रहे थे।
करीब 1 घंटा खोजरनाथ में बिताने के बाद हम तकलाकोट के लिए रवाना हो गए। सभी यात्री तिब्बत के पठारों के प्राकृतिक नज़रो को कैमरे में कैद करने में लगे थे। जल्दी ही हम तकलाकोट पहुंच गए अपने कमरो में जा कर स्नान किये और लंच किये फिर शॉपिंग करने निकल गए क्योंकि हमें अपने लगेज वापस पैक कर के कस्टम क्लेरेंस के लिए जमा कर देना था।
शाम को हम नेपाली बाज़ार में टहलने निकले, छोटी मोटी ख़रीदारी की, यहाँ एक नेपाली और भारतीय मार्केट भी है, इस मार्केट के अंदर एक नेपाली द्वारा संचालित ढाबे में लजीज भारतीय व्यंजन, बीयर आदि मिल जाती है यहाँ हमने अपने दल के किशोर कुमार श्री रवि मल्होत्रा के साथ हमप्याला हमनिवाला हो कई मधुर नगमे सुने, जिसका आनंद उठा, पास बैठे स्थानीय लोग, भाषा न समझते हुए भी झूम रहे थे। एक आनंददायी शाम।
चूंकि हमारा दल इस साल का आखरी दल था, चीनी अधिकारिय ने अंतिम दल के सम्मान में, एक स्नेह सम्मेलन आयोजित किया था प्रत्येक यात्री का परम्परागत सफ़ेद मलमल का दुशाला पहनाकर स्वागत किया गया, एक पार्टिंग गिफ्ट भी दिया गया। दुभाषिए की मदद से विचारों का आदान प्रदान हुआ। आज दल की एक साथी श्रीमति मौसमी का जन्मदिन भी इसी पार्टी में मनाया गया, साथियों का प्यार भरा उत्सव देख, श्रीमति मौसमी भावुक हुए बिना न रह सकी, कल सुबह वापसी के लिए प्रस्थान का दिन था।
बीसवाँ दिन ----तकलाकोट से गुंजी
कुल रास्ता 15 कि.मी बस से + 26 कि.मी. पैदल
आज हमें अपने देश, अपनी धरती पर वापस जाना था। भारतीय समय के अनुसार हम 4.00 बजे उठ गए, दैनिक नित्य कर्म से निवृत और स्नान कर हम 5 बजे अपने कमरो की चाबियाँ जमा कर तैयार थे।
गेस्ट हाउस वाली सड़क पर ही कस्टम ऑफिस में चीनी आब्रजन अधिकारीयों ने प्रत्येक यात्री की जाँच की। पासपोर्ट पर लगी फोटो से उनका मिलान किया, पासपोर्ट जरूरी प्रवष्टि की । इस के बाद हमारी बस भारत-चीन बॉर्डर लिपु पास की तरफ चल पडी। बस सुनसान पहाड़ी क्षेत्र में चली जा रही थी, धीरे-धीरे पौ फटने लगी आकाश में दिन निकलने से पहले का प्रकाश छाने लगा।
बिलकुल बार्डर तक एक बहुत ही अच्छी पक्की सड़क पर बस एक एयरपोर्ट सरीखे प्लैटफ़ार्म पर जाकर रुकी, यहाँ पर सभी यात्रियों के हाथ की बैग, केमेरा, फोन की जांच कर यात्रियों को आगे जाने की अनुमति दी गई, सभी यात्रियों को अपने बैग खुद ही उठाने थे, इस लिए सभी यात्री धीरे धीरे चल रहे थे। ऑक्सीजन भी बहुत कम थी। कई यात्री तो बहुत ही धीरे धीरे चल रहे थे। लिपुलेख दर्रे के आखिरी 50 मीटर की चढाई एकदम सीधी थी।
हम लिपलेख बॉर्डर के पास पहुंचे, तभी हमारे पोर्टर चीनी सीमा के 30 -40 मीटर सीमा के अंदर आ कर अपने अपने यात्रियों को ढूंढ रहे थे। लिपु बॉर्डर पर पहुँच कर हम अपनी देश की सीमा में प्रवेश कर गए। हमारे सिपाही हमारे स्वागत के लिए खड़े थे। हाथ पकड़कर सभी को बुला रहे थे। वह पल हमारे लिए गर्व के पल थे। हम अपने देश में लिपुलेख दर्रे पर खड़े थे। बॉर्डर पर ठंड बहुत थी। वहीँ पर सभी यात्री अपने अपने पोनी पोर्टर को ढूंढ रहे थे।
जहाँ चीन साइड गिर जाने पर कोई उठाने वाला नहीं था। वही अपनी साइड सहारा देने वाले कई हाथ थे। एक बात और जहाँ बॉर्डर के उस साइड (चीन) के आधे किलोमीटर तक चीन की सैनिक चौंकी और सड़क मोटर मार्ग था, वही हमारी तरफ 9 कि.मी. के बाद सैनिक चौंकी और 18 कि.मी. के बाद सड़क मोटर मार्ग था।
थोड़े समय के विश्राम और पोर्टरों, घोड़ेवालों सेना क जवानों से मेलमिलाप के बाद हम नवींढांग की तरफ पैदल चल पड़े । रास्ता उतराई का था सिपाहियों के ग्रुप भी यात्रियों के साथ-साथ चल रहे थे। हम सकुशल यात्रा पूरी करके स्वदेश वापिसी के सुखद भाव में भरे प्रकृति के सुंदर बिछावन को देखकर मोहित हो रहे थे जिन्हें जाते समय अंधेरा होने के कारण देख भी न सके थे। क्या दृश्य थे! उन्हें देखकर लग रहा था कि वह कोई विशाल पोस्टर है। हम सुंदर दृश्यों को कैमरे में उतारते, गाते गुनाते चारों ओर देखते हुए आगे बढ़ रहे थे। जहाँ तिब्बत का पूरा पठार पूरी तरह वनस्पति विहीन और बंजर था। वही अब भारतीय सीमा में हिमालय के शिखरों का सोंदर्ये प्रगट हो गया था। लिपुलेख दर्रे से उतरते ही रास्ते के किनारे छोटी घास और झाड़ियाँ मिलने लगी थी।
हम 9.30 बजे सुबह नवीढ़ांग कैम्प पहुंच गया वहां हम ने गरम गरम पराठे आचार का नाश्ता किया। एक बार फिर ॐ पर्वत का जी भर दर्शन किया, फोटो खींचे और एक घंटा रुकने के बाद हम ने काला पानी के लिए प्रस्थान किया। नदी किनारे दोनों ओर ऊँचे-ऊँचे पहाड़ और घाटी में कहीं-कहीं पहाड़ों के ढलान पर रंगबिरंगे छोटे-छोटे फूल भी खिल रहे थे। निरंतर चलते हुए हम 1.30 बजे हम काला पानी पहुंच गये और जी भर बुरांश का शरबत पिया। दोपहर के भोजन और थोड़े विश्राम के बाद हम इमिग्रेशन क्लेरेंस करा कर, काली माता के चरणो में अब तक की निर्विघ्न यात्रा एवं दर्शनों के लिए धन्यवाद किया एवं आगे के जीवन के आशीर्वाद की कामना लिए मंदिर में प्रवेश किये।
थोड़ी देर बाद हम गुंजी के लिए निकल पड़े। लेकिन यहाँ से चलते मौसम खराब होना चालू हो गया, हल्की बूँदाबाँदी होने लगी। हमारे दल के एक साथी घोड़े से गिर गए, उन्हें कमर मे काफी अंदरूनी चोट लगी, आईटीबीटी वाले उन्हे वाहन में बैठा के आगे निकल गए। हम बारिश का आनंद लेते धीरे कदम बढ़ाते चलते रहे। कालापानी से गूंजी तक मार्ग अच्छा है। आज की यात्रा काफी लम्बी और थकाने वाले थी। 4 बजे के करीब हम ने गुंजी में प्रवेश किया। आज कुल 26 कि.म. चले थे। हम गुंजी कैंप जाते समय हम ने आई टी बी पी कैंप में माता मंदिर में यात्रा पूर्ण होने के लिए धन्यवाद देते दर्शन किये और अपने कैंप में पहुंचे।
पहुँचते ही चाय आ गयी फिर थोड़ा आराम किया पर देखते देखते मौसम खराब हो चुका था और कल हमरी आगे की यात्रा पर संशय के बादल मंडराने लगे। क्योंकि यहाँ से धरचूला के रास्ते टूटे थे उस बरस भारी बारिश के कारण यहाँ से वापसी सेना के हेलीकाप्टर से होनी थी, और इसकी उड़ान पूरी तरह से मौसम मे पर निर्भर थी। प्रत्येक शाम केएमवीएन के कर्मठ कर्मचारी आपकी हट में गरमागरम सूप सर्व करते हैं। शाम ढलते ही ठंड ने अपना प्रभाव जमाना शुरू कर दिया, दल के सभी लोग अलग समूहों में बंट कुदरत दिये इस आराम के मौके का आनंद उठा रहे थे, कुछ समूह अपने हट्स में तो कुछ bonfire करके किचन के सामने बने कनोपी में बैठ गीत संगीत का आनंद उठा रहे थे। बाद में सभी यात्री आनन्दपूर्वक भोजन किए एवं वापस आकर सो गए।
इक्कीसवाँ, बीसवाँ और तेवीसवां दिन गूंजी केएमवीएन और आईटीबीटी की मेहमानी में
अगली सुबह उठे तो मौसम वैसे ही बना हुआ था, चारों तरफ घने बादल, अन्नपूर्ण की चोटी भी घने बादलों से ढकी थी। ऐसे में हेलीकाप्टर का उड़ना संभव नहीं था और पैदल मार्ग तो पहले से टूटा था धरचूला और गूंजी की बीच। इस तरह एक एक अरे तीन दिन बीत गए, पर इन तीन में पूरे दल ने भरपूर मज़ा लूटा आसपास के खूबसूरती का। लगभग हर दिन वहाँ की एक स्थानीय टपरी पर सामोसा पार्टियां हुई यह टपरी एक लड़की चलाती थी और यात्री दलों के बीच मिस गूंजी के नाम से मशहूर थी। इन तीन दिनों में केएमवीएन के कर्मियों का धैर्य भी तारीफ के काबिल था, उनकी सेवा अथक थी। तीनों दिन वहाँ स्थित मंदिर में रोज शाम भजनों की गंगा भी बहती।
एक दिन हम पास ही स्थित नपलचू गाँव में गए यहाँ की जलेबी की दुकान भी यात्रियों में काफी लोकप्रिय है, यहाँ रस भरी जलेबियाँ खा जब ऊपर ढलान पर स्थित गाँव में गए तो वहाँ नक्काशीदार लकड़ी के दरवाजे देखकर आवाक रह गए, थोड़ा और ऊपर चढ़े तो कुटू की फसल लहलहा रही थी, इसकी फसल के रंग का संयोजन कमाल का दृश्य उत्पन्न कर रहे थे,ऐसा लगता था फूलों की घाटी में आ गए हों। यह तीन दिन जिंदगीभर की लिए यादगार बन गए, चूंकि आज सुबह मौसम कुछ साफ था तो हुमसे पहले आए दल को आज हेलिकॉप्टर से आगे भेज दिया गया और कल शायद हमारा भी नंबर आएगा, और चूंकि ये हमारा आखरी दिन था यहाँ पर तो आईटीबीपी के द्वारा आज यात्रियों के वापस आने की खुशी एवं स्वागत हेतु हमारे दल के सम्मान और विदाई स्वरूप एक शानदार दावत का आयोजन किया सेना की भाषा में इसे ‘बड़ा खाना’ कहा जाता है, आईटीबीटी के सभा कक्ष में karoke के साथ खूब धमा चौकड़ी हुई, हमारे एक सहयात्री श्री चंद्रन का जन्मदिन भी था, ITBP के जवानो ने सीमित साधनो की बावजूद एक हलवा केक बनाया था। इस यात्रा में भारत की साइड वाले भाग में ITBP के रोल की जितनी तारीफ की जाए उतनी कम है। हमारे धमाल की एक बानगी इन विडियोस में देखें
हंगाखेज पार्टी
हंगाखेज पार्टी गायक श्री संजय कोठारी
उत्कृष्ट कलकृति का नमूना, खूबसूरत दरवाजे
चौबीसवाँ दिन गूंजी से पिथौरागढ़ और फिर जागेश्वर
आखिर तीन दिन के इंतज़ार बाद आज मौसम साफ था और हम नहा धो सुबह सुबह तैयार हो हेलिपेड पहुँच गए और लगभग नौ बजे एक यात्री और उसके सामान का वजन ले हेलीकाप्टर में जाने दिया जा रहा था, चूंकि हमारा दल इस वर्ष का आखिरी दल था तो केएमवीएन के कर्मी भी सारे कैंप को समेट कर हमारे साथ हेलीकाप्टर में सवार थे और 10 बजे पिथौरागढ़ एयरपोर्ट पर पहुँच गए और एक रोमांचक और आध्यत्मिक यात्रा का अंत हुआ। केएमवीएन के गेस्ट हाउस में शानदार स्वागत हुआ, प्रेस यात्रियों के विचार, अनुभव जानने के लिए उपस्थित थी। यात्री अपने सामान जो यहाँ छोड़ गए थे, समेट रहे थे और नहा धो तैयार हो दोपहर के भोजन हेतु इकठे हो गए, और भोजन उपरांत बस में सवार हो गए अपने अगले पड़ाव जागेश्वर के लिए। रास्ते भर अंताक्षरी, भजन चुटकुलों के दौर चलते रहे। जागेश्वर से कुछ किलोमीटर पूर्व हमें यहाँ के पत्थरों के मंदिरों की झलक प्राप्त होने लगी थी। पहाड़ व रास्ते के बीच बहती एक छोटी नदी के उस पार, पहाड़ों की तरफ, मंदिरों का एक छोटा समूह खड़ा था। करीब एक किलोमीटर की दूरी और तय करते ही हम एक घाटी में पहुंचे जहां ऊंचे और गहरे हरे रंग के देवदार वृक्षों के घने जंगल थे और हमने स्वयं को ऊँचे घने पेड़ों से घिरे पाया। रास्ते के एक तरफ कुमाऊं मंडल विकास निगम का यात्री निवास था व दूसरी तरफ जागेश्वर मंदिर समूह। लगभग 7 बजे शाम हम जागेश्वर पहुँच गए, आज रात यहाँ विश्राम था और कल सुबह जागेश्वर महादेव के दर्शन कर दिल्ली की और प्रस्थान करना था। हम नहा धो भोजन कर चाँदनी रात में जगेश्वर मंदिर समूह परिसर तक टहल कर आए, छोटा सा कस्बा था रात के नीरव में पास बहती जटागंगा नदी की आवाज स्पष्ट रूप से आ रही थी, कुछ दूर तक घूम हम वापिस चल दिये और अपने अपने कमरों में विश्राम के लिए चले गए क्योंकि कल एक थकाऊ बस यात्रा थी दिल्ली तक।
पच्चीसवाँ दिन जागेश्वर से दिल्ली
मंदिर सुबह चार बजे ही खुल जाता है जैसा कि तय था, हम अल सुबह 4 बजे ही मंदिर दर्शन को पहुँच गए और दर्शन हेतु केवल हमारे दल के ही कुछ सदस्य थे, हम सब को विशेष पुजा और आरती में भाग लेने का अवसर मिला। जागेश्वर धाम भगवान सदाशिव के 12 ज्योतिर्लिंग में से एक है। कहा जाता है कि यह प्रथम मंदिर है जहां लिंग के रूप में शिवपूजन की परंपरा सर्वप्रथम आरंभ हुई। जागेश्वर को उत्तराखंड का पांचवां धाम भी कहा जाता है। जागेश्वर धाम को भगवान शिव की तपस्थली माना जाता है। यह ज्योतिर्लिंग आठवां ज्योतिर्लिंग माना जाता है। इसे योगेश्वर नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर शिवलिंग पूजा के आरंभ का गवाह माना जाता है।
पुराणों के अनुसार भगवान शिव एवं सप्तऋषियों ने यहां तपस्या की। कहा जाता है कि प्राचीन समय में जागेश्वर मंदिर में मांगी गई मन्नतें उसी रूप में स्वीकार हो जाती थीं, जिसका भारी दुरुपयोग होने लगा। आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य यहां आए और उन्होंने इस दुरुपयोग को रोकने की व्यवस्था की। अब यहां सिर्फ यज्ञ एवं अनुष्ठान से मंगलकारी मनोकामनाएं ही पूरी हो सकती हैं। यह भी मान्यता है कि भगवान श्रीराम के पुत्र लव-कुश ने यहां यज्ञ आयोजित किया था, जिसके लिए उन्होंने देवताओं को आमंत्रित किया। कहा जाता है कि उन्होंने ही सर्वप्रथम इन मंदिरों की स्थापना की थी। जागेश्वर में लगभग 250 छोटे-बड़े मंदिर हैं। जागेश्वर मंदिर परिसर में 125 मंदिरों का समूह है। मंदिरों का निर्माण पत्थरों की बड़ी-बड़ी शिलाओं से किया गया है।

दर्शन उपरांत बाकी सब तो वापिस होटल की और चल दिये मैं अकेला ही मॉर्निंग वॉक के लिए निकल गया मैं नदी की धारा के साथ चलता जा रहा था, जागेश्वर मंदिर समूह, नदी किनारे ऊंचे मोटे देवदार वृक्षों के बीच एक छोटे घोंसले की तरह लग रहा था।
जागेश्वर मंदिर परिसर की ओर मुख रखे कुछ घर पहाड़ी पर बिखरे हुए थे। हर घर के द्वार व खिड़कियों की चौखट पर बारीक नक्काशियां कीं हुईं थीं। मंदिर के सम्मुख स्थित गली में एक छोटा बाज़ार था। इनके अलावा वहां और कुछ नहीं था। एक संकरी घाटी में ही आपको सम्पूर्ण नगर के दर्शन हो जाते हैं- कुछ १३० मंदिर, एक गाँव, उसका बाज़ार , एक नदी और एक सुन्दर सा जंगल। सब एक चित्र की चौखट में समाये से नजर आते हैं। मन ही मन उस नज़ारे की कल्पना उभरने लगी, जो बर्फ की एक परत में ढंकने के पश्चात यहाँ दिखाई पड़ती होगी। बहुत ही मनोरम दृश्य देखने को मिल रहे थे मन लौटने को नहीं हो रहा था परंतु हमे नाश्ते के बाद तुरंत दिल्ली के लिए प्रस्थान करना था सो मन मसोस वापिस चल दिया। नाश्ते उपरांत हम बस में बैठ चल दिए दिल्ली की ओर। लगभग 35 किलोमीटर चलने के बाद हम गोलु देवता के मंदिर पर पुनः कुछ देर रुके दर्शन कर गरम गरम पकोड़े चाय भकोसे, फिर अल्मोड़ा में कुछ देर रुक यहाँ की प्रसिद्ध बल मिठाई की जमकर ख़रीदारी हुई। हमारी एक साथी सुश्री मृणालनी अल्मोड़े की हीं थी सो उन्होने यहीं से रुखसती ली।
दोपहर होते होते हम काठगोदाम पहुंचे वहाँ हमारे दल का समारोह पूर्वक स्वागत हुआ, प्रेस कवरेज भी जबरदस्त था, हमें कई momento दिये गए, जो आज भी हमारे घर की शोभा बढ़ा रहे हैं। भोजन उपरांत हम फिर आगे चल दिये दिल्ली की ओर। दिली पहुँचने से पहिले गाजियाबाद के पास होटल स्कायलार्क में दिल्ली के समाजसेवी श्री गुलशन द्वारा यात्रियों के लिए स्वागत और हाइ टी की वयवस्था की थी, गुलशनजी की सेवा भावना से सब अभिभूत थे, सब यात्रियों के दल का एक ग्रुप फोटो, कैलाश के बैक्ग्राउण्ड के साथ सभी यात्रियों को दिया गया। यात्रा प्रारम्भ करने से पहिले भी यात्रा में लगने वाली छोटी जरूरत के सामान की किट उनके संगठन जय भोले परिवार द्वारा यात्रियों को निशुल्क दी गई थी, इसमें शामिल सामान की कोइ कल्पना भी नहीं कर सकता की ये कितने जरूरी हो सकती है, ये किट उनके यात्रा अनुभवो के आधार पर तैयार की गयी थी। हैट्स ऑफ टु गुलशन जी
लगभा नौ बजे हम गुजराती समाज भवन पहुँच गए, खाना खाकर अपने अपने बँक बेड पर सब बेसुध होकर पड़ रहे, दिन भर की बस यात्रा से थके होने के कारण।
छबीसवाँ दिन दिल्ली गुजराती समाज भवन
आज विछोह का दिन था, सभी यात्री एक एक कर अपने अपने गृह नगर को प्रस्थान कर रहे थे। दिन भर भावुक विछोह के पल आते रहे, क्योंकि हर यात्री के अपने समय और यात्रा साधन के अनुसार निकाल रहे थे, कुछ आरक्षण न मिलने के कारण अभी भी एक आध दिन यहीं बिताने को मज़बूर थे। केएमवीएन की टीम भी वहाँ उपस्थित थी उनके द्वारा एक यात्रा प्रमाण पत्र जारी किया जो की यात्री अपने अपने राज्य द्वारा प्राप्त होने वाली सब्सिडि की लिए उपयोग कर सकते थे। केएमवीएन दल को केंद्र सरकार दी जाने वाली सहायता के लिए अपने अपने खाते के विवरण दे दिये गए थे। हम भी हसीन यादों को समेटे रात्री की ट्रेन से भोपाल के लिए निकल गए।
सभी यात्रियों का एक WhatsApp ग्रुप बना दिया गया था, जिससे हम आज भी सक्रिय रूप से जुड़े हुए है एक वृहुद परिवार की तरह जुड़े हुए हैं।
इति श्री, पाठकों आप सुधि जन किसी भी सहायता या जानकारी हेतु हमसे संपर्क कर सकते हैं। आपको यह जानकारी ब्लॉग कैसा लगा अपने विचार प्रकट कर प्रोत्साहित करेंगे तो आभारी रहेंगे, कोई सुझाव हों तो स्वागत है ।






















































































सन्तनी जी अती सुदंर प्रस्तुती।मन प्रसन्न हो गया ।
ReplyDeleteप्रोत्साहन पाकर मन प्रसन्न हुआ, धन्यवाद
Deleteअति सुंदर यात्रा और ऐसी यात्रा का सजीव चित्रण एवम् विवरण । ऐसा लगा जैसे कि यात्रा के हर छोटे बड़े पहलू और हर उतार चढ़ाव को आपके शब्दों के माध्यम से आपने बड़े ही सहजता से और खूबसूरती से एहसास कराया । समूचा लेख काबिले तारीफ़ है और इस प्रयास के लिए आप बधाई एवं साधुवाद के पात्र हैं। ओम् नम: शिवाय 🙏
ReplyDeleteप्रोत्साहन पाकर मन प्रसन्न हुआ, धन्यवाद
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