हेमकुण्ड बद्रीनाथ केदारनाथ यात्रा वृतान्त
भाग 7 - जून 12 व 13, 2019

कुइक रिकैप - हम निकले है 9 दिनी बद्रीनाथ हेमकुण्ड यात्रा पर आज जून १२, २०१९ है आज हमारी यात्रा का छठवां  दिन है,  कल रात हम बद्रीनाथ दर्शन और माना भ्रमण कर हमारे अगली मंज़िल हेमकुण्ड साहिब का लिए स्टार्टिंग पॉइंट गोबिन्द्घाट पहुँच रात्रि विश्राम किया. यहाँ तक पहुँचने के लिए किन मंजिलो से होकर गुजरे जानने के लिए इस पेज https://chandersantani.blogspot.com/?m=1 पर विसिट कर पढ़ सकते हैं.
हेमकुंट साहिब चमोली जिला, उत्तराखंड, भारत में स्थित सिखों का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान है। यह हिमालय में चार सात पहाड़ों पर निशान साहिब झूलते हैं। इस तक ऋषिकेश-बद्रीनाथ साँस-रास्ता पर पड़ते गोबिन्दघाट से केवल पैदल चढ़ाई ( २१ km ) के द्वारा ही पहुँचा जा सकता है।
यहाँ गुरुद्वारा श्री हेमकुंट साहिब सुशोभित है। इस स्थान का उल्लेख गुरु गोबिंद सिंह द्वारा रचित दसम ग्रंथ में आता है। इस कारण यह उन लोगों के लिए विशेष महत्व रखता है जो दसम ग्रंथ में विश्वास रखते हैं। ये इक्कीस किलोमीटर का ट्रेक दो चरणों में, गोबिंदघाट से गोविन्दधाम(घांघरिया) १५ km और घांघरिया से हेमकुण्ड ६ किम किया जाता है. २०१४ से पहिले पहला चरण १९ किम था, २०१४ में पुलना गाँव तक सड़क बन जाने से ये दुरी 15 किम की रह गई.  सो पाहिले चरण के लिए हम अपनी पान्दुकेश्वर स्थित होटल से सुबह छह बजे ही निकल लिए और गोविन्दघाट की पार्किग में कार लगायी, चूँकि कार की चाबी पार्किंग मेनेजर के पास छोडनी होती है हमारे तीन पिठू बैग के अलावा अतिरिक्त सामान गुरद्वारे के क्लॉक रूम में जमा करने के लिए काफी पापड़ बेलने पड़े क्योंकि अत्यंत ज्यादा भीड़ के कारण क्लॉक रूम के बाहर काफी लम्बी लाइन लगी थी, फिर किसी ने बताया कि धर्मशाला के अन्दर एक और गठड़ी घर है मैं दौड़ा दौड़ा वहां पहुंचा और वाहेगुर की कृपा से मैं अंतिम व्यक्ति था जो वहां सामान रख पाया क्योंकि यहाँ जगह फुल हो गयी थी.
आगे एक और संघर्ष था, पुलना गाँव तक जो जीप चलती हैं, वो गुरूद्वारे से सटे अलकनंदा नदी पर बने एक पुल को क्रॉस करके जाती है और उसीसे वापिस लौटती भी है, चूँकि लोग ज्यादा थे जीप कम तो भारी अव्यवस्था थी, जब कोई जीप वहां से आती लोग दौड़ के पुल के बीच में ही उसमें लटक जाते या उसको वहीँ खाली कर उसमे सवार हो जाते, हम काफी देर रुके रह पर आखिर हमें भी भी वही करना पड़ा. दूसरा विकल्प ये था कि यहीं से ट्रेकिंग करें. सो ये जंग भी जीत ली बकौल वंदना नामदेव
माना कि हर रास्ते होते हैं कठिन,
 पर मंजिल पाना भी है मुमकिन।

 हर रास्ते में होते नहीं कांटे कम,
 ईश्वर के करिश्में भी नही होते कम।

 वो मंजिल ही क्या,
 जिसमें अड़चन न आये।
वो सफलता ही क्या,
 जिसमें असफलता न आये।

 गर सफलता देती है,
 खुशी पाने का एहसास।

 हर मुश्किल देगी,
 आगे बढ़ने की आस।
सुबह ८.०० बजे हम पुलना पहुँच चुके थे और वहीँ पर स्थित एक छोटी से टपरी पर नाश्ता कर ८.15 बजे हम चौदह किलोमीटर की चढाई को फतेह करने के लिए ‘वाहेगुरु जी का खालसा वाहेगुरु जी की फतेह’ का नारा लगा निकल पड़े. करीब ५ किलोमीटर चढ़ने के बाद हम भ्युंडर नामक गाँव पे पहुंचे यहाँ पर लक्षमण गंगा नदी एक झरने जैसा स्वरुप लेकर बह रही थी अत्यंत ही खुबसूरत नज़ारा था, कई लोग यहाँ नहाने का आनंद उठा रहे थे, हम थोडा विश्राम कर आगे चल दिए. लक्ष्मनगंगा दरअसल ऊपर हेमकुण्ड झील से निकली एक धारा है जो आगे जाके गोविन्दघाट पर अलकनंदा नदी में मिल जाती है.  यहाँ से चढ़ाई और तीखी हो गई थी, जहाँ केदार ट्रेक पर जगह पानी की व्यवस्था थी यहाँ उसका आभाव था, इसलिए आप गोविन्दघाट से ही पर्याप्त पानी लेकर चलें. लक्षमण गंगा के साथ साथ चलता रास्ता बहुत ही हराभरा और रमणीक था और आपकी थकावट को dileute करता चलता है. हम वरिष्ठ नागरिकों की स्पीड खास कर मेरी स्पीड कम हो चली थी तो मैंने बेटे से कहा तुम अपनी माँ के साथ आगे चलो और गुरूद्वारे में जगह सुरक्षित कर पाओ तो हम फंड्स की कमी जो की एटीएम बन्द होने के कारण हो रही है उसकी पूर्ति हो जाएगी सो वो लोग आगे निकल लिए और लगभग तीन बजे गोविन्दधाम पहुँच गए और तीसरी मंजिल पर स्थित एक बंक बेड का ब्लाक सुरक्षित कर पाए, मैं भी कुछ देर बाद वहां पहुँच गया,   बंक बेड पर अपना सामान रख हम कॉमन बाथरूम्स में फ्रेश होके आ गए,  बेड की साइड राड्स से सामान को चेन से लॉक किया और नीचे आकर गुरूद्वारे के लंगर हॉल के बाहर चाय पी, गुरूद्वारे में जाकर शांति से ध्यान मुद्रा में आधा घंटा बैठ गए. इतने में लंगर हॉल का दरवाज़ा खुल गया और हम लंगर छक के,  गुरूद्वारे के बाहर मार्किट में  थोड़ा टहले और ऊपर चले गए सुबह के पहनने के कपड़े आदि निकाल के रख  लिए और और आठ बजते न बजते हम बिस्तर में थे क्योंकि हमें तीन बजे उठ हेमकुण्ड साहिब की यात्रा पे निकलना था, लेकिन चूँकि ये कामन हॉल था लोगों की आवाजाही से नींद में व्याधान आता रहा, और तीन क्या मैं तो २.३० बजे ही उठ  फ्रेश होकर तैयार हो गया और फ्रेश  बाकी परिवार भी उठ गया और हमने सामान पैक कर सामान लाकर रूम में रख दिया, कम्बल गुरूद्वारे को वापिस किये और चार बजते न बजते हम सड़क पर थे, बाहर अभी अँधेरा ही था सर पर हेड टॉर्च लगाये, जो पिछले साल हमने कैलाश यात्रा के दौरान लिए थे, क्योंकि वहां भी हम इंडिया साइड लास्ट लेग जो कि ॐ पर्वत से लिपुलेख पास (चाइना बॉर्डर) के ट्रेक लिए रात २ बजे ही निकल लिए थे.
लक्ष्मण गंगा का पुल पार करते न करते हमारी साँस फूलने लगी अँधेरे में हमें मालूम ही नहीं पड़ा की हम चढ़ाई चढ़ रहे हैं, धीरे धीरे अँधेरा छंटने लगा और ४.४५ बजे नीम अँधेरे में हमने सफ़ेद बर्फ की चमकती चोटी दिखाई दी और ५ बजे अँधेरा पूरी तारा छंट गया और हम आस पास के नज़ारे देखते चढ़ाई चढ़ते रहे, हर एक मोड़ पर हम एक नयी ऊंचाई को छू रहे थे, ८.२० के करीब अब चारो और अब बर्फ ही बर्फ थी ठण्ड के मारे हाथ सुन हुए जा रहे थे बावजूद इसके के हम दस्ताने टोपे इनर और दो दो जैकेट पहने थे. पर जब मैं आस पास देख रहा थे लोग बगैर तैयारी के इतनी कठिन यात्रा को हलवा समझ के चले आये थे और मैंने कई लोगो को आधे में ही वापस लौटते देखा कुछ तो स्लीपर और कुछ कपडे/कैनवास के शूज में दिखे. अब तो पैरो में बर्फ आ गयी थे और थैंक्स to हमारे waterproof ट्रेकिंग शूज  कि हम फिसल नहीं रहे थे करीब पौने दास बजे हमें गुरूद्वारे के निशान साहिब दिखाई देने लगे और यहाँ से रास्ते के दो विकल्प सामने थे एक तो एकदम खड़ी बरफ  से ढकी सीढियां और एक सीधा रास्ता, हालांकि थक के पस्त थे लेकिन

हमारे संघर्ष का साक्षी ये प्रकृति बन बैठी हैं
 देखो ना मेरी ख़्वाब के तरह ऊंचे ये पेड़, ये पहाड़,
संघर्ष पथ पर अडिग हमारे कदम... नयी उमंग लिए पड़े हैं चल

हमने  सीढ़ी  वाला  रास्ता पकड़ा लेकिन मुझे तो दो ही सीढ़ी के बाद ही साँस लेने के लिए रुकना पड़ रहा था किसी तरह वाहेगुरु वाहेगुरु करते 10.30 बजे हम गुरूद्वारे के सामने थे, हमने बिना देर किये हेमकुंड
 कुण्ड पवित्र झील में नहाने के लिए तैयार होने लगे, झील अभी भी जमी हुई थी, किनारे किनारे बर्फ तोड़ नहाने लायक थोड़ी जगह थी, हिम्मत कर अन्दर घुसे एक डुबकी लगाई सारा बदन सुन्न, लगा की साँस थम जाएगी, बाहर निकलके हाथो से बॉडी की मालिश की कपडे पहन दर्शन के लिए तैयार हो गए। यहाँ गुरुद्वारा का मुख्य हाल पहली मंज़िल पर बना है और नीचे एक बेसमेंट है और इसी बेसमेंट के अंदर से दर्शन के ऊपर जाने की व्यवस्था थी,  मैं   बेसमेंट में बेटे के साथ सामान की रक्षा के लिए बैठ गया  और पत्नी को बोला आप दर्शन कर माथा टेक आओ हम बाद में जायेंगे, वो गयीं तो गयीं, बहुत देर तक वापिस नहीं आयीं हम चिंतित हो उठे, मैं उन्हें ढूँढने के लिए बाहर निक्ला तो देखा चारों तरफ अफरातफरी थी, गुरुद्वारे के सामने एक संकरा सा रास्ता था, गुरुद्वारे से दर्शन कर बाहर निकलने वाले श्रुद्धालु के लिए, नीचे से चढ़ाई कर आने वाले श्रद्धालु और जोडघर से बाहर आने वाले, लंगर मेँ  आने जाने वाले,  सबके लिए यही एक संकरा रास्ता जो बरफ के कारण फिसलन भरा था, यहाँ पर  बुरी तरह से जाम था लोग एक दूसरे के ऊपर गिर रहे थे, एक भगदड़ सी मची थी, पत्नी कहीं दिख नहीं रही थी, मैं वापस बेसमेंट मेँ जाके बेटे को ऊपर भेजा दर्शन के लिए, थोड़ी  देर मेँ वो भी वापस आ गया, फिर मैं गया और उस समय अंतिम अरदास हो रही थी मैं दर्शन कर प्रसाद ग्रहण कर बाहर निक्ला तो सामने पत्नी दिखाई दी हम बड़ी मुश्किल से बाहर और फिर नीचे जाने के रास्ते तक पहुँच पाये, प्रशासन और गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी को एक निश्चित संख्या मेँ ही यात्रियों को ऊपर चढ़ने की अनुमति देनी चाहिए, यहाँ कितने यात्री ऊपर है कोई हिसाब नहीं 2013 से कोई सबक प्रशासन ने नहीं लिया है, आज वहाँ के स्थिति चिंतनीय लगी, वापसी मेँ हमने देखा  लोग जगह जगह गीले मौजे, फटी हुऐ रैन कोट फेंकके गये थे, कुल मिला के एक स्वर्ग सी जगह की यह हालत देख दुख हुआ। रास्ते मेँ हमने विचार विमर्श किया की आज 1३ जून हो चुकी है हमको 16 जून को दिल्ली से भोपाल के लिए सुबह ट्रेन पकडनी है और अगर हम कल सुबह ही गोविंदघाट पहुँच जाए तो हम औली भी कवर करें या शाम तक ऋषिकेश पहुंचे लेकिन सुबह तक गोविंदघाट 14 किमी पैदल चल कर तो संभव नहीं था क्योंकि रात मे ट्रेक किया नहीं जा सकता, और सुबह कितना भी जल्दी निकले तो भी 11-12 बजे से पहिले तो पहुंचा नहीं जा सकता, तो दूसरा विकल्प घोड़े थे जो की नीचे उतरते हुए बड़े कष्टकारी होते है सो तय हुआ की हेलीकाप्टर से चला जाए, जेब चेक करी तो लगभग हेलीकाप्टर के किराए के ही पैसे बचे थे जेब में। लक्षमन गंगा से पहिले एक रास्ता फूलों कि घाटी के लिए जा रहा था, परंतु हम वहाँ नहीं जा रहे थे क्योंकि अभी जुलाई के दूसरे हफ्ते से पहिले फूल नही । करीब 5 बजे हम नीचे पहुंचे।
गुरुद्वारे में जगह तलाशी पर वहाँ  सब कुछ फुल था, कंबल ले गलियारे में सोने की हिम्मत न थी, होटल के पैसे खर्च करें तो हेलीकाप्टर के कम पड़ रहे थे, एक होटल वाला 1500 किराया बैंक ट्रान्सफर कर  लेने को तैयार हुआ पर नेटवर्क नदारद था, सो बेटे ने वहाँ पर एकमात्र टेलीफ़ोन बूथ से मित्र को फोन कर UPI से होटल वाले के खाते में ट्रान्सफर करवाए और बात बन गयी। अब हम बढ़िया गरम पानी से पैरों की सिकाई कर नहा धो गोविंधाम गुरुद्वारे में माथा टेक यात्रा की सफलता के लिए गुरु महाराज को धन्यवाद दिया, लंगर में दाल रोटी खाई, एक गिलास गर्म कढ़ाई वाले ढुध में हल्दी घोल के पी और सोने से पहिले यह तय किया कि अगर हेलीकाप्टर मिल जाता है, क्योंकि बुकिंग पहिले आओ पहिले पाओ आधार पर थी,  तो हम कल औली होते ऋषिकेश की और जितना सफर शाम तक तय कर पाएंगे करेंगे। यह संकल्प ले हम आरामदायक कंबल ले सो रहे
आगे क्या क्या गुल खिलते है अगली कड़ी मेँ






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