हेमकुण्ड बद्रीनाथ केदारनाथ यात्रा वृतान्त
भाग ४
जून 9, 2019
quick रिकैप - हम निकले है 9 दिनी बद्रीनाथ हेमकुण्ड यात्रा पर आज यात्रा का तीसरा दिन है, हम केदारबाबा ट्रेक के आरम्भिक पॉइंट गौरी कुण्ड पर पहुँच चुके हैं और कैसे कैसे पापड़ बेल यहाँ तक पहुंचे हैं यह जानने के लिए पिछले तीन भाग इसी ब्लॉग पेज पर पढ़ सकते हैं
खैर दिन के २.३० बज चुके है और हमारे सामने चौदह किलोमीटर का विकट ट्रेक सुरसा के मुख की तरह मुंह बांये था, और चूँकि हम यहाँ बिलकुल ही unplanned पहुंचे थे और हमारे आगे के प्लान्स गड़बड़ न हो इसलिए हमें किसी भी हाल में अगले दिन 174 kms की ड्राइविंग कर पीपलकोटी तक तो पहुँचाना ही था. अतः आज रात्रि तक बाबा केदार के चरणों में पहुँचाना ही है, और ये मुझे बगैर घुड़सवारी के असंभव लग रहा था , सो घोड़ो की ऑफिसियल बुकिंग काउंटर पहुंचा, लेकिन वो बन्द हो चुका था, किसी ने बताया आप आगे बढ़ चलो कुछ दूरी पर घोड़े मिल जायेंगे सो चल दिए, सचमुच आगे जगहजगह पर खचर वाले खड़े थे परन्तु भाव आसमान पर थे जहाँ सरकारी रेट १४०० था ये लोग ३५०० बोल रहे थे, हम पैदल आगे बढ़ते रहे, घोड़े वाले पीछे पीछे आते मोलभाव चलता रहा पर हमें लगने लगा कि घुड़सवारी नहीं की तो पहुँचने में बहुत देर हो जाएगी और हमारी gmvn की बुकिंग भी भर जाएगी तो मुश्किल में फँस जायेंगे, आखिर मोलभावकर २५०० प्रति घोड़े के हिसाब से तीन घोड़े ले लिए. जैसे ही मैंने झटके से घोड़े पर चढ़ने की कोशिश की मेरे पिठू बैग की स्ट्रिप टूटे गई, अब इसे आगे गोद में लेकर चलना पड़ रहा था.
रास्ते में मैंने देखा लोग किस तरह छोटे छोटे बचों को, बड़े बुजुर्गो को लेकर यात्रा पर ले आये है और कितने कष्ट में है, अब सामान उठाये या बच्चे को उठाये, सामान भी ऐसा की उठाने में तकलीफ, कई लोग ट्राली बैग लिए हुए थे, मतलब ऐसे की मुहँ उठाये और चल दिए इतनी कठिन यात्रा पर बिना सोचे समझे. बिचारे बच्चे रोते गाते घिसटते हुए चल रहे थे, बड़ा ह्रदय विदारक दृश्य था. पिछली त्रासदी से कोई सबक नहीं लिया था सरकार ने uncontrolled influx था यात्रियों का.
हम लोग सुबह से कुछ नहीं खाए थे, समय के against दौड़ जो थी, बस किसी तरह गौरी कुण्ड की गेट से आगे बढ़ने को मिल जाये, सो एक जगह रुक कर पहाड़ो में सर्व सुलभ प्यारी मैगी खाई और चाय पी. रास्ते में यूटिलिटी व्यवस्थाएं बहुत ही अच्छी थी. रास्ता बड़ा ही मनोहारी था, ठण्ड भी बढ़ने लगी थी.
यद्यपि आप घोड़े से जल्दी पहुँच तो जाते है पर सवारी कतई आरामदायक नहीं आपकी कमर दुःख जाएगी. पर ये समय भी कट जायेगा की भावना मन में रख चलते रहे और लगभग 7.15 पर केदार बाबा मंदिर परिसर की लाइट्स दिखने लगी और मन प्रसन हो गया. और लगभग ८ बजे हम gmvn की कैंप में मेनेजर के सामने थे, बन्दे ने वादे के अनुसार सुमेरु टेंट कॉलोनी के एक टेंट में तीन बेड दे दिए, हमने सामान अन्दर रखा, उस टेंट में १० बिस्तर थे, पत्नी को इतने सारे लोगों के साथ शेयरिंग रास नहीं आ रही थी, परन्तु कोई और चारा नहीं था, सर छुपाने की लिए छत थी ये ही काफी थे वर्ना जितना unplanned तरीके से हम आये थे आज कुछ भी हो सकता था. पता पड़ा कि मंदिर के पट आज १० बजे तक खुले रहेंगे सो हमने निर्णय किया की सुबह चूँकि हमें जल्दी निकलना है दर्शन अभी कर लिए जाएँ और हम मंदिर की और चल दिए, पूरा रास्ते पर अच्छी प्रकाश व्यवस्था थी, मंदिर परिसर भी प्रकाश से जगमग हो रहा था, चारो तरफ उत्साह का माहौल था. २०१३ की त्रासदी के बाद मंदिर के आस पास बहुत ही सुन्दर निर्माण और विकास कार्य किये गए दिख रहे थे, रात्रि के इस समय भी, हाँ 9 बज चुके थे, श्रधालुओं की अच्छी खासी लाइन लगी थी. परन्तु लाइन अच्छी स्पीड के साथ बढ़ रही ठी और लगभग 9.30 हम दर्शन कर चुके थे, भूख के मारे पेट में चूहे कूद रहे थे, लेकिन आसपास स्थित भोजनालय फुल थे एक दो जगह से उठ के आ गए, एक छोटी सी जगह पर जम गए और चाय के साथ गर्मागर्म आलू के पराठे का आर्डर दिया पर पराठे पकने की स्पीड कम थी और ग्राहक ज्यादा सो अर्थशास्त्र में ग्यारवीं कक्षा में पढ़े सीमांत उपयोगिता (मार्जिनल utility) के सिधान्त के अपवाद और उदारहरण सामनेआने लगे, सिधांत यह है की प्रत्येक अतिरक्त रोटी के साथ उसकी उपयोगिता कम होने लगती है बशर्ते सभी रोटियों की साइज़ बराबर हो, रोटी के स्वाद और गुण में को अंतर न हो, रोटियों की आपूर्ति निर्बाध हो. सो यहाँ सारे अपवाद सच हो रहे थे प्रत्येक पराठे के बाद हमारे लिए उसकी उपयोगिता सिधांत के विरुद्ध बढती जा रही थी और हम, और लाओ और लाओ करते जा रहे थे.
भोजन उपरांत हमसे चला भी नहीं जा रहा थे, मंदिर परिसर से टेंट कॉलोनी थोड़ी दूरी पर थी, किसी तरह गिरते पड़ते हम ११ बजे तक बिस्तर में थे, आस पास में सात और प्राणियों खराटो की मधुर स्वर लहरियों के बीच हम सोने की कोशिश करने लगे और मैं मन ही मन कल के सफ़र के बारे में सोच रहा था.
तो अगले भाग में हम देखेंगे कि अगले दिन का १७५ km का सफ़र सुहाना सफ़र है या अंग्रेजी का suffer. देखेंगे हम लोग (दादा मुनि की जय हो)
— with Meena Santani and Bhavesh Santani.

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